कोना'धारी वर्सेस रोना'धारी
तो ऐसा है कि झूठ के धारा प्रवाह में वाह वाह करना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन 'सच' से इंस्पायर होकर कोई ऐसा सवाल न करे जिसका जवाब आपको खुद भी पता हो लेकिन उसका जवाब किसी दूसरे के मुंह से सुनना हो। ऐसा करना तो बेशक आत्मघाती होने जैसा है। जब भी सामने वाले को लगेगा कि आप उड़ते हुए तीर के शौकीन हो, तब आपको कोई अदृश्य मालदार खिलाड़ी कैसे चुपके से कब खरीद के अपनी जेब में रख लेगा पता नही चलेगा। आजकल तो विश्व गुरु के खुफिया चेले कब अपना खेल कर जाते है पता ही नहीं चलने देते। वो तो सीधे रिजल्ट से ही पता चलता है। हालांकि उक्त सारी बातें पूर्णतः काल्पनिक जैसी है, वास्तविकता से इसका कोई लेना देना नही है। खैर! सवाल-जवाब से ज्यादा मजा तो 'मन की बात' में आता है, मन में भले ही कुछ और रखो, लेकिन मुंह से कुछ और कहो। हम तो "बेमन की बात" में भी जन, गण और वतन की बात का इंतजार करते रहते हैं। मन और बेमन कि इसी दुविधा में आज का समाज दो फटे टुकड़ों में डिवाइड हो गया है। जिसके हाथ में जितना भी फटा टुकड़ा आ रहा है उसी को सील कर अपने पक्ष का तंबू खड़ा करना चाहता है वो भी बिना ब...