ज़िंदगी आ रहा हूं मैं
अगर व्यक्ति के जीवन में उत्साह या उमंग ना हो तो समझ लिया जाना चाहिए की ऐसे व्यक्तियों से बना समाज एक अदृश्य खतरे की ओर बढ़ता जा रहा है। निरुत्साहित जीवन का कोई जीवन मूल्य या सारतत्व नही होता है। समाज ने आज के समय में "उत्साह" के घोड़े को लंगड़ा कर दिया है, और "निरुत्साह" के गधे की पीठ पर जा बैठा है। व्यक्ति के मन में कुंठाओं और कुढ़न ने घर बना लिया है और स्वयं को नाकारा बनाकर रख दिया। एक सीमित सोच के दायरे में समाज, स्वयं ही बंधता चला जा रहा है क्योंकि व्यक्ति का दिमाग मारता जा रहा है। व्यक्ति का भौतिक या तकनीकी विकास हो रहा है, संसाधनों का विकास हो रहा है लेकिन सामाजिक मानसिक विकास अवरूद्ध होता जा रहा है। व्यक्ति के जीवन में चेतना का अभाव और चिंता से उत्पन्न निराशा की बढ़ोत्तरी होती जा रही है। "उत्साह व्यक्ति के मन की वह वृत्ति या स्थिति है जिसके फलस्वरूप मनुष्य प्रसन्न होकर और तत्परतापूर्वक सकारात्मक ऊर्जा और विचारों से युक्त कोई कार्य संपन्न करने या कोई उद्देश्य सिद्ध करने लिए अग्रसर होता है।" उत्साह व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा के ...