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मैं भाषण हूं

 मैं वो हूं जो घर से लेकर सारे विश्व में सार्वजनिक संवाद का चहेता यंत्र हूं। ना ना, मै लाउडस्पीकर नहीं हूं। अदृश्य हूं लेकिन जीवित हूं। मै कहने वाले, और सुनने वाले के बीच की अति आवश्यक कड़ी हूं। उपयोगिता की दृष्टि से देखें तो कहने को उपदेश, सलाह या मुंह से चलने वाला औजार हूं। मैं किसी भी ब्रेकिंग न्यूज़ से कम सनसनीखेज नहीं हूँ। मेरे लिए हर श्रोता अपनी दीवानगी जाहिर करता है। चाहे न चाहे हर कोई गाहे-बगाहे मेरा इस्तेमाल करता रहता है। मैं किसी को कुछ दूं या ना दूं लेकिन, मुझसे ले लेकर हर कोई किसी न किसी को बहुत कुछ देता रहता है। इस तरह विचारों का भाषा के माध्यम से संप्रेषण के दौरान मेरी उत्पत्ति होती है और मैं "भाषण" के शुभनाम से जाना जाता हूं।         वैसे तो मैं अपने आपमें कुछ भी नहीं हूं लेकिन जहां बोलने और सुनने वाले दो तत्व होंगे वहां मेरा अस्तित्व स्वयं ही दिखाई पड़ता है। इस विश्व में कइयों लोग मुझे अपने बोलने या कहने के बेहतरीन हुनर के तौर पर पेश करते है। जहां कहीं, किसी भी भाषा में संबोधन होगा मतलब मेरा इस्तेमाल होगा। मेरे इस्तेमाल से कितने ही लोग सड़क से सं...