दल-बदल: नहीं आसान
तो भईया ऐसा है कि मौसम बदल चुका है, मानसून जा चूका है लेकिन चुनाव का मौसम फिर से झमाझम बरसने को तैयार बैठा है। सारे राजनीतिक दलों के मेनिफेस्टो भी तैयार हो चुके है। सभी दल अपनी-अपनी डफ़ली, अपना-अपना राग गा चुके है। जनता के लिए सबकी अपनी-अपनी रेवड़ी, जलेबी, मिठाई, हलवा, रसगुल्ला, पूड़ी पकवान सबकुछ देने के लिए घोषणाएं हो चुकी है। जाति-धर्म, अमीर-गरीब, अगले-पिछड़े, मिले-बिछड़े सबका हिसाब लगा लिया है। अब आगे जनता की बारी है कि वो इनमे से क्या-क्या पसंद करती है, किसे स्वीकारती है या किसे नकारती है और किसे सत्ता के सुख तक पहुंचाएगी। राजनीतिको के लिए तो 'सत्ता' वह स्वर्ग सुंदरी है जिससे हर कोई लिपटना चाहता है। सत्ता में ही वह शक्ति है जो किसी सड़कछाप को भी भगवान से ऊंचा दर्जा दिला सकती हैं। राजनीति में जब यही सत्ता की शक्ति, पुराने दल से मिलने की उम्मीद कम दिखे, लगने लगे कि टिकिट मिलने की संभावना बिलकुल भी नहीं है। तब एक सबसे प्रिय हथियार का प्रयोग किया जाता है जिसको 'दल बदलना' कहा जाता हैं। दल बदलना, मतलब...