ये तोहफ़ा तो कुबूल नही होगा
अगर आप किसी लोकतांत्रिक देश के नागरिक हो, देश के ईमानदार करदाता हो तो आपको तोहफा या मुफ्त का जैसे जुमलो से नाराजगी जरूर होनी चाहिए। आमतौर पर चुनाव का ढोल बजते ही ये तोहफ़ा वो तोहफ़ा, ये भी मुफ्त वो भी मुफ्त का गाना गाते हुए सारे तांत्रिक बाहर आकर अपने मंत्र मारने लगते है। चुनावी आगाज़ से लोकतंत्र में अचानक ही आत्मविश्वास पैदा होने लगता हैं। लोकतंत्र का सीना अचानक ही फूलने लगता है। क्या किसी भी राजनेता या राजनीतिक दल ने अपने पैसों के दम पर जनता को कुछ भी मुफ्त में दिया है? बिना करदाताओं के पैसों से मुफ्त में कुछ दिया हो? जब जनता का पैसा ही जनता के लिए खर्च किया जाए तो वह तोहफा या मुफ्त का कैसे हुआ? अगर सरकारें जनता के हितों को ध्यान में रख कर काम करती हैं तो यह उनकी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है। क्या आम जनता सरकार को इसीलिए विभिन्न करों या जीएसटी का भुगतान करती हैं कि उन्हें तोहफा, सौगात, मुफ्त में वैक्सीन जैसी बाते सुनने को मिलेगी। यह एक नागरिक का उपहास उड़ाने के अलावा क्या हो सकता है। कोई भी नेता इतना दानवीर कब से हो गया कि वह तोहफे बांटने लग गया? क्या भारत में ...