मैं समर्पित दल बदलू
जी हां, मैं हूं एकदम कट्टर बिना भरोसे का दल बदलू। न मेरी जाति देखो ना मेरा धर्म देखो क्योंकि इन दोनो से भी मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता है। और विचारधारा तो मेरी कुछ विशेष बची नही है। अपना तो है बस यही सपना साम दाम जपना, पराया दल अपना। अरे भाई हम दल बदलू चुनाव लड़ते ही किस लिए है? कई का लालच `जन सेवा` करना होता है मेरा लालच "जेब सेवा" करना है। मेरा ईमान धरम मुझे खरीदने वाले दल के ऑफर पर निर्भर रहता है क्योंकि वैसे भी मुझे जनता(भीड़) वोट देती है जिनमे नागरिक तो शायद कोई भी नही होता है। अगर जनता में नागरिक होते तो मुझ जैसे दल बदलू को भला कौन वोट देता? आज के सुसुप्त होते जा रहे लोकतंत्र के जमाने में नागरिक और नागरिकत्व दोनो ही वेंटीलेटर पर अंतिम सांसे ले रहे हैं। बेचारा लोकतंत्र भी भीडतंत्र का पर्यायवाची बनता जा रहा है। आज लोकतंत्र में बेचारे नागरिक के लिए वैसे भी अच्छे विकल्प बचे ही नही है, मेरे जैसे दल बदलूओं को ही थक हार कर वोट देना पड़ता है। नागरिक की भी अपनी-अपनी ढेरों मूलभूत समस्याएं है। बेचारा भ्रष्टाचार, घटती आमदनी, बीमारी, बढ़ती महंगाई-बेरोजगारी...