ज़िंदगी आ रहा हूं मैं

अगर व्यक्ति के जीवन में उत्साह या उमंग ना हो तो समझ लिया जाना चाहिए की ऐसे व्यक्तियों से बना समाज एक अदृश्य खतरे की ओर बढ़ता जा रहा है। निरुत्साहित जीवन का कोई जीवन मूल्य या सारतत्व नही होता है। समाज ने आज के समय में "उत्साह" के घोड़े को लंगड़ा कर दिया है, और "निरुत्साह" के गधे की पीठ पर जा बैठा है। व्यक्ति के मन में कुंठाओं और कुढ़न ने घर बना लिया है और स्वयं को नाकारा बनाकर रख दिया। एक सीमित सोच के दायरे में समाज, स्वयं ही बंधता चला जा रहा है क्योंकि व्यक्ति का दिमाग मारता जा रहा है। व्यक्ति का भौतिक या तकनीकी विकास हो रहा है, संसाधनों का विकास हो रहा है लेकिन सामाजिक मानसिक विकास अवरूद्ध होता जा रहा है। व्यक्ति के जीवन में चेतना का अभाव और चिंता से उत्पन्न निराशा की बढ़ोत्तरी होती जा रही है।
          "उत्साह व्यक्ति के मन की वह वृत्ति या स्थिति है जिसके फलस्वरूप मनुष्य प्रसन्न होकर और तत्परतापूर्वक सकारात्मक ऊर्जा और विचारों से युक्त कोई कार्य संपन्न करने या कोई उद्देश्य सिद्ध करने लिए अग्रसर होता है।" उत्साह व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा के सतत प्रवाह को बनाए रखता है, साथ में नकारात्मकता से भी बचाए रखता है। उत्साही मन में नए विचारों, आकांक्षाओं और नवीन अवधारणाओं का सतत विकास होते रहता है। उत्साह होने से व्यक्ति में चेतना का विकास होता है जो आत्मबल प्रदान करती है। वैसे भी किसी निराश व्यक्ति से क्या उम्मीद भी क्या कर सकते है? अतीत से लेकर वर्तमान स्थिति तक के तमाम साहसिक कार्यो, उद्यमों, अनुसंधान और विकास, नवाचारों और निर्माणों के लिए स्फूर्त उत्साही विचारो से युक्त व्यक्तित्वों का ही योगदान रहा है। लेकिन समस्या यह है कि हम उन्हीं उत्साही लोगो के द्वारा अन्वेषित तकनीकी साधनों और उपकरणों का अति उपभोग करते हुए निराशा की ओर बढ़ते जा रहे हैं।
           आज दौड़ती भागती जीवन पद्धति के दौर में हर कोई सब कुछ पा लेने की दौड़ में दौड़ रहा है। हम किसी भी कीमत पर सबकुछ समेट लेना चाहते है। घोषित और अघोषित दोनो प्रकार से प्रतिस्पर्धा आज के समाज में जन्म ले चुकी है। इस प्रतिस्पर्धा में व्यक्ति कुछ समय तक तो दौड़ लेता है लेकिन एक समय बाद उससे ऊब कर, परेशान होकर दूर भागने को भी तत्पर हो जाता है। इसके मूल में उत्साह की कमी के चलते या सही प्रकार नियोजन के अभाव से मन मस्तिष्क पर निराशा की स्पष्ट छाप है। हालांकि प्रकृति ने कुछेक जीवों को छोड़कर सारे जीवों में ऊब जाने का गुण दे रखा है। मनुष्य भी उन्ही ऊबने वाले जीवों में से एक है। इसके अतिरिक्त भी प्रयत्नों का वांछित परिणाम और सफलता नही मिलना, धैर्य की कमीं, दूरदर्शिता का अभाव और हमारे आसपास के लोगो का नकारात्मक व्यवहार, नियतिवादी होने जैसे अन्य तत्व भी काफी हद तक ज़िम्मेदार रहते है। समाज व्यक्ति कि आर्थिक स्थिति के हिसाब से उसकी बाकी की हैसियत देखने लगा है। आर्थिक आधार को प्रमुख मानक बनाना मानसिक रूप से दिवालिया होने की निशानी है। वैसे भी इस बात की क्या गारंटी है कि जिसके हाथो में ज्यादा पैसा होगा वह ज्यादा सुखी होगा? क्या धन के अभाव में अच्छा सामाजिक चारित्रिक जीवन नही किया जा सकता। ज्यादा सुविधाएं तो व्यक्ति और ज्यादा कमजोर किए जा रही है इस बात को हम नजरंदाज किए हुए हैं। जीवन के दुखो से निपटने या उनकी तीव्रता को कम करने के लिए हमारा सामाजिक निवेश या तो कम होते जा रहा है या लगभग खत्म सा होते जा रहा है जिसके नकारात्मक परिणाम सामने आने लगे है।
           जब भी व्यक्ति स्वयं को ही समय नहीं दे पाता है, लंबे समय तक एक निश्चित प्रकार की जीवनचर्या में जीते रहता है, दुनिया की उलझनों में उलझा रहता है, उस स्थिति में भी निराशा जन्म लेने लगती हैं। हम इतने स्वार्थी हो चुके हैं कि हमारे पास अपने ही परिवार तक के लिए समय नहीं रहता है। परोपकार की भावनाओं का गला, लगभग घोंटा जा चुका है। धन के बल पर मित्र, रिश्तेदार, परिवार बनाने का चलन बढ़ने लगा है। आज के तकनीकी रूप से समृद्ध समाज में मोबाइल फोन, टेलीविजन और इंटरनेट, कार, बंगले, लक्जरी और महंगी सुख सुविधाओं के साथ ही विलासिता युक्त जीवन जीने के बावजूद भी लोगो में एकाकीपन बढ़ता जा रहा है। व्यक्ति समाज में अपना विलासिता के मानक (स्टैण्डर्ड) स्थापित करने के चक्कर में अकेला होता जा रहा है जो व्यक्ति को मानसिक अवसाद(अहंवाद) की तरफ ले जा रहा है। समाज में व्यक्ति के अवसाद ग्रस्त होने से मानसिक तनाव में वृद्धि, अलगाव, आत्महत्या जैसी प्रवृत्ति, बच्चो और युवाओं द्वारा कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल और इंटरनेट के अत्यधिक उपभोग के कारण कई विकृतियां पैदा हो रही है जिनमे साइबर अपराध, पोर्नोग्राफी की लत, मोटापा, मानसिक तनाव, अनिद्रा प्रमुख है। मुर्दा मस्तिष्क के दम पर हम जीने के प्रयास करेंगे तो कहां सही जीवन जी पाएंगे? इन समस्याओं के पैदा होने में दूसरा एक और कारण यह भी हो सकता है कि हम भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में स्वयं को किस प्रकार से विकसित कर रहे है।
           व्यक्ति में उत्साह का संचार करने के कई उपाय हो सकते है। कुछ उपायों का हम सभी अनुसरण कर सकते है बशर्ते हम और हमारा समाज कुछ मूलभूत बदलाव हेतु स्वयं को मानसिक रूप से तैयार रखें। हम स्वयं को शारीरिक और मानसिक मेहनत करने के लिए तत्पर रहें। दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति को करने के लिए कुछ न कुछ काम तो जरूर मिल जायेंगे लेकिन कई बार योग्यता के अनुसार काम का ना मिलना भी एक मुख्य समस्या होती है। सबसे पहले तो व्यर्थ कि स्वार्थी, झूठे आत्मसम्मान में झोंकने वाली प्रतिस्पर्धाओं से खुद को दूर रखें। किंतु ये प्रतिस्पर्धाएं अगर शिक्षा, नवाचारों, अनुसंधानों, अनुप्रयोगों, प्रौद्योगिकी खोज, इत्यादि से संबंधित हो तो इनमें बढ़-चढ़कर शामिल हो क्योंकि इससे समाज का सर्वांगीण विकास होगा। साथ ही समाज में सकारात्मक प्रतिस्पर्द्धा से नवाचार और रोजगार, उद्यम इत्यादि को बढ़ावा मिलेगा। हमें सब कुछ अकेले ही समेट लेने या अति संचय वाली मानसिकता छोड़नी पड़ेगी। दैनिक जीवन में तमाम व्यस्तताओं के बावजूद भी घर परिवार करीबी दोस्त और शुभचिंतको के लिए समय निकालकर उनसे संवाद और संपर्क स्थापित करें। समय-समय पर प्रेरक व्यक्तित्वों की जीवनी, पुस्तकें, फिल्में इत्यादि का लाभ उठाएं। अगर संभव हो तो दूरस्थ प्राकृतिक, ऐतिहासिक, और धार्मिक स्थानों पर परिवार या मित्रो के साथ घूमने फिरने जाए एवं कुछ समय व्यतीत करें। खाली वक्त का सकारात्मक कार्यों, खेलकूद, कसरत, योग इत्यादि में उपयोग किया जा सकता है। घर में बड़े बुजुर्गो के साथ समय बिताना उनकी सेवा करना, घरेलू कार्यों में हाथ बंटाने जैसे कार्य भी किए जा सकते है।
           जीवन में मस्त रहने के लिए व्यस्त होना भी अत्यंत आवश्यक है। हालांकि यह भी सत्य है की बिना चिंता के जीवन संभव नहीं हो सकता, लेकिन चिंता इतनी भी ना हो कि वह चिता तक ले जाए। हकीकत तो यही है कि हम जबतक भविष्य के बारे में नहीं सोचेंगे, वर्तमान में सक्रिय नहीं हो पाएंगे। बिना भविष्य की चिंता किए कौन हाथ पैर मारेगा? खाली पेट और खाली दिमाग में शैतान कभी भी जाग जाता हैं ऐसे व्यक्ति के पास भोजन और कार्य इन दोनों का होना अत्यंत आवश्यक है। व्यक्ति के पास कुछ तो खाली समय होना आवश्यक है लेकिन खाली समय इतना अधिक भी न हो कि व्यक्ति निठल्ला बनकर रह जाए। इसके लिए सबको कामकाज़, व्यवसाय, कार्यस्थल और दैनिक दिनचर्या में व्यवस्थित सामंजस्य स्थापित करने वाले तंत्र हेतु मंथन करना चाहिए। समाज में व्यक्ति की सभी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति आसानी से हो लेकिन कुछ भी मुफ्त में न हो। समाज में सक्रिय भूमिका निभाने हेतु प्रत्येक व्यक्ति को कृतसंकल्पित होना होगा। कुएं के मेंढक जैसी छोटी सोच से बाहर निकल कर स्वयं को विश्व में विस्तारित करना होगा। 
              हर व्यक्ति को लगता है उसकी अपनी समस्या ही दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है। ऐसी छोटी-मोटी व्यक्तिगत समस्याओं के चलते ज्यादा तनाव से खुद को दूर रहना होगा। हो सके तो दूसरों के दुख सुख में भी खुद को शामिल करते हुए समानुभूति के भाव को बढ़ावा दे। नकारात्मक प्रवृत्तियों वाले व्यक्तियों से जितना हो सकें दूर ही रहें तो बेहतर है। तो कुल मिलाकर ऐसा है की चिंता तनाव और हताशा से परेशान होकर जीवन को निराशा के नर्क में झोंकने के बजाय उत्साह का हाथ पकड़ उमंगों, खुशियों और आनंद की खुशहाल दुनिया में पदार्पण करें। निरुत्साह तो जीवन की रही सही खुशियों को भी खत्म कर देता है। अपने कल के भविष्य के लिए आज को खतरे में ना डालें आज का अधिकतम उपयोग आनंद सहित सुनिश्चित हो। धीरे धीरे ही सही परमानंद को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए। जीवन में उचित उत्साह बनाए रखें और जीवन को अपने उच्चतम विकास की ओर अग्रसर करने हेतु प्रयत्नशील रहे। फिर भी अगर किसी को यह लगता है कि उत्साह और उमंग के बिना ही उसका जीवन ज्यादा बेहतर है तो वह हताशा, निराशा, कुंठाओं और व्यर्थ चिंताओं का लबादा ओढ़कर अपना जीवन यापन करें, इसके लिए उन्हें अग्रिम बधाइयां। और अगर लगता है कि जीवन में नई उमंगों, नई स्फूर्ति, नई ऊर्जा से युक्त जीवन ज्यादा बेहतर है तो कहना ही पड़ेगा कि जिंदगी आ रहा हूं मैं।
                                जय भारत!

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