मैं समर्पित दल बदलू

जी हां, मैं हूं एकदम कट्टर बिना भरोसे का दल बदलू। न मेरी जाति देखो ना मेरा धर्म देखो क्योंकि इन दोनो से भी मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता है। और विचारधारा तो मेरी कुछ विशेष बची नही है। अपना तो है बस यही सपना साम दाम जपना, पराया दल अपना। अरे भाई हम दल बदलू चुनाव लड़ते ही किस लिए है? कई का लालच `जन सेवा` करना होता है मेरा लालच "जेब सेवा" करना है। मेरा ईमान धरम मुझे खरीदने वाले दल के ऑफर पर निर्भर रहता है क्योंकि वैसे भी मुझे जनता(भीड़) वोट देती है जिनमे नागरिक तो शायद कोई भी नही होता है। अगर जनता में नागरिक होते तो मुझ जैसे दल बदलू को भला कौन वोट देता?
           आज के सुसुप्त होते जा रहे लोकतंत्र के जमाने में नागरिक और नागरिकत्व दोनो ही वेंटीलेटर पर अंतिम सांसे ले रहे हैं। बेचारा लोकतंत्र भी भीडतंत्र का पर्यायवाची बनता जा रहा है। आज लोकतंत्र में बेचारे नागरिक के लिए वैसे भी अच्छे विकल्प बचे ही नही है, मेरे जैसे दल बदलूओं को ही थक हार कर वोट देना पड़ता है। नागरिक की भी अपनी-अपनी ढेरों मूलभूत समस्याएं है। बेचारा भ्रष्टाचार, घटती आमदनी, बीमारी, बढ़ती महंगाई-बेरोजगारी, प्रदूषण इन सब से लड़ते हुए थकता जा रहा है और आत्मसमर्पण की ओर बढ़ता जा रहा है। लेकिन मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि मैं कब किस सरकार में शामिल हो जाऊं या कौन सी सरकार कब मुझ में शामिल हो जाए यह कोई नहीं जानता, मैं भी नहीं। इसीलिए सारी सुख सुविधाएं तो मेरे जैसे दलबदलू ले लेते हैं। जनता बेचारी मारी मारी फिरती रहे इसमें मेरे जैसे दल बदलू को क्या लेना देना।
           आज के दौर में मेरे जैसे दल बदलूओं का स्वर्णिम दौर चल रहा है। नेशनल से लेकर इंटरनेशनल तक हमारी बखत है। और होगी भी क्यूं नहीं? आज के अमृत युग में दल बदलने का फैशन बढ़ता जा रहा है। दल बदल कर कल का गंगू पकोड़ा आज का शाही पकवान बन बैठा है। मैं और मेरे जैसे दल बदलूओं को भी मंत्री, मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री या प्रधानमंत्री जैसे बड़े बड़े पदों का ऑफर मिलता है। स्वयं की तरक्की करने के लिए और जांच एजेंसियों से बचने के लिए ये सभी ऑफर को मैं सहर्ष शत प्रतिशत बेशर्मी के साथ स्वीकार कर लेता हूं। क्या फर्क पड़ेगा कि किस पार्टी से मैने क्या वादा किया था या किस पार्टी ने मेरा कैरियर बनाया। दल बदल कर दूसरे पार्टी में शामिल होकर ऐसा लगता है जैसे बरसो से बिछड़े हुए सौतेले बाप से मिलना हो गया हो। मैं अपनी पुरानी पार्टी के बारे में सोचना भी पसंद नही करता हूं। जनता ने जो करना था कर दिया, अब मेरे द्वारा कुछ करने का मौका है वो मैं जरूर करूंगा, अपनी और अपने परिवार की तिजोरियां भरूंगा और "जेब सेवा" करूंगा। क्योंकि मैं हूं अंध दल बदलू।
           आज दल बदलना बारहों महीने कुंभ स्नान करने जैसा हो गया है। पहले चाहे कितने भी पाप किए हो, दल बदल लो, सारे पाप साफ हो जाते है और नये पाप करने का लीगल लाइसेंस मिल जाता है। भविष्य के दल बदलूओं से मेरा एक बेशर्म निवेदन रहेगा कि की उसी पार्टी में शामिल होना जो सत्ता में हो या जिसकी सत्ता में आने की प्रबल संभावना हो। कौन सी लहर चल रही है, किसकी लहर चल रही है, किसका झंडा बुलंद होगा किसका तंबू उखड़ेगा, इन सभी प्रकार के समसामयिक मौसम की जानकारी रखना भी जरूरी है। राजनीति में पहले भी कई धुरंधर मौसम वैज्ञानिक हुए हैं। हालांकि थोड़े बहुत मौसम के जानकार मैं और मेरे जैसे कई टुच्चे दल बदलू भी है।
           बेचारे लोकतंत्र को क्या पता था कि उसकी जवानी में ही हम दल बदलू उसे बुढ़ापे का मजा चखा देंगे। इतिहास गवाह है कि हम दल बदलूओं को राजा महाराजाओं के जमाने से लेकर आज के प्रजातंत्रीय युग तक जब भी, जहां भी, जैसे भी मौका मिला, दल बदले हैं और भविष्य में भी भविष्य को उज्जवल करने के लिए दल बदलते रहेंगे। जब तक राष्ट्र का नागरिक नाकाम रहेगा हम विश्व व्यापी दल बदलुओं का सम्मान बना रहेगा। मैं इस बात से आश्वस्त हूं की इस देश का नागरिक जागरूक नहीं होने वाला। बाकी जो मूर्ख भीड़ है उसे जाति धर्म का लॉलीपॉप थमाकर काम चलता रहेगा। मुझे मेरी उन्नति में कुछ अंध मूर्ख, धार्मिक कट्टर और गंवार लोग भी मदद करते आ रहे हैं। अब इन मूर्खों को अगर मैं मूर्ख कह दूंगा तो बेचारो को बुरा तो लगेगा ही। किसी भी उन्मादी मूर्ख को मैं, मूर्ख कहकर उसके दो कौड़ी के स्वाभिमान को ठेस थोड़े ही पहुचाऊंगा।
          कुल मिलाकर अगर ईमानदारी से कहूं तो मैं स्वार्थ को समर्पित दल बदलू जरूर हूं, मेरे जैसे और भी है, लेकिन मुझे ईमानदार नागरिक के साथ-साथ ईमानदार दल का भी इंतजार रहेगा जो बेईमान दल बदलूओं को बहिष्कृत करें और स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र के लिए सच्चे जनसेवको को चुनकर राष्ट्र सेवा का मौका दे।
                              जय भारत!

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