दल-बदल: नहीं आसान
तो भईया ऐसा है कि मौसम बदल चुका है, मानसून जा चूका है लेकिन चुनाव का मौसम फिर से झमाझम बरसने को तैयार बैठा है। सारे राजनीतिक दलों के मेनिफेस्टो भी तैयार हो चुके है। सभी दल अपनी-अपनी डफ़ली, अपना-अपना राग गा चुके है। जनता के लिए सबकी अपनी-अपनी रेवड़ी, जलेबी, मिठाई, हलवा, रसगुल्ला, पूड़ी पकवान सबकुछ देने के लिए घोषणाएं हो चुकी है। जाति-धर्म, अमीर-गरीब, अगले-पिछड़े, मिले-बिछड़े सबका हिसाब लगा लिया है। अब आगे जनता की बारी है कि वो इनमे से क्या-क्या पसंद करती है, किसे स्वीकारती है या किसे नकारती है और किसे सत्ता के सुख तक पहुंचाएगी।
राजनीतिको के लिए तो 'सत्ता' वह स्वर्ग सुंदरी है जिससे हर कोई लिपटना चाहता है। सत्ता में ही वह शक्ति है जो किसी सड़कछाप को भी भगवान से ऊंचा दर्जा दिला सकती हैं। राजनीति में जब यही सत्ता की शक्ति, पुराने दल से मिलने की उम्मीद कम दिखे, लगने लगे कि टिकिट मिलने की संभावना बिलकुल भी नहीं है। तब एक सबसे प्रिय हथियार का प्रयोग किया जाता है जिसको 'दल बदलना' कहा जाता हैं। दल बदलना, मतलब लोकतंत्र के गले पर चाकू रखना और जनमत को अपना निजी मत बना कर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को अनैतिक तरीके से पूरा करना। कई बार यह दल बदलना लाभदायक होता है और कई बार घाटे का सौदा भी साबित होता है। हालांकि दल बदलने के लिए अच्छा कूटनीतिक मौसम वैज्ञानिक होना एक जरूरी योग्यता है।
बाहर से देखने पर ऐसा लगता है कि दल बदलना बहुत शानदार काम है लेकिन कभी दल बदलू की मजबूरियों पर ध्यान देना बहुत ही आवश्यक है। बेचारे कि दल-बदलने की स्थिति में न तो अपनी पार्टी में और ना दूसरी पार्टी में इज्जत बाकी रहती है भले ही देखने में लगे कि नेताजी का बहुत सम्मान किया गया है। जिस पार्टी के लोगों को कल तक पानी पी पीकर गालियां दे रहे थे आज उनकी तारीफ में नए-नए महाकाव्यों का गायन करना पड़ता है। जो थूका वही चाटना पड़ता है। जिनके विरोध में तलवारे लिए घूमते थे उन्ही के गले में माला डालनी पड़ती है। जिनसे हाथ मिलाना भी पसंद नहीं था उनको गले से लगाना पड़ता हैं। जिस दल में शामिल हो उस दल के पुराने नेता कार्यकर्ता सभी किरकिरी आंखों से देखने लगते है। कई पुराने नेता जो टिकट मिलने के प्रबल दावेदार होते है एकाएक नए दल बदलूओं के आने से उनके टिकट कटने की संभावना बढ़ जाती है। यह तो पुराने नेता कार्यकर्ता के साथ वैसा ही होता है जैसे कल कि आई सौतन को अचानक ही घर की सारी बागडोर दे दी हो और पुरानी मुंह ताकते रह गई। पुराने नेता कार्यकर्ता की, जबरन ही दल बदलू की जयकार करने की अलग मजबूरी, आधे अधूरे मन से, मन की पीड़ा दबाते हुए जबरन का स्वागत करना सो अलग। कई बार बेचारे पुराने नेता कार्यकर्ता के मन में आता होगा कि क्यों न फूलों के बजाय बम ही दे मारे। फिर भी अंततोगत्वा सार्वजनिक मंचों पर मन के सारे छल कपट को एकतरफ रख गले मिलना होता है। शायद दल बदलू को भी शिवाजी महाराज और अफजल खान के गले मिलने की घटना याद आती हो कि कहीं से कोई भावी विधायक सांसद नेता टिकट कटने की खुन्नस में, बाघनख से अंतड़िया न निकाल ले।
लेकिन जो भी हो दल बदलने को राजनैतिक रूप से या नैतिक रूप से कोई अच्छा आचरण तो नहीं कहा जा सकता। दल बदलने का एक सीधा सा मतलब यह भी है कि आप अपने पुराने दल को धोखा दे रहे हो और नए दल से धोखा करने की तैयारी में हो। राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि वे दल बदलुओं को अपने दलों में शामिल न करें, उनका बहिष्कार करते हुए अच्छे आदर्श स्थापित करें। राजनीतिक लाभ-हानि तो जीवन भर चलता रहेगा लेकिन इन्हीं दल बदलुओ के चलते जनता को कई बार अवांछित व्यक्ति को अपना मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री स्वीकार करना पड़ता है। सभी राजनीतिक दलों को यह बात समझनी चाहिए कि जो व्यक्ति अपने दल का नही हुआ वो आपके दल का क्या होगा? क्या पता अपना स्वार्थ पूरा होने के बाद वह फिर से कोई दूसरे दल में शामिल हो जाए। इन सभी बातों से दो निष्कर्ष आसानी से निकलते है, पहला दल बदलने से राजनीतिक अविश्वास बढ़ेगा। दूसरा, चुने हुए नेता के दल बदलने से जनता के वोट देने का कोई अर्थ नहीं बचेगा, चुनाव एक छलावा बनकर रह जायेगा।
जनता अपने नेताओं को इसलिए वोट नहीं देती है कि वे अपने सत्ता स्वार्थ के लिए अपनी पार्टी बदल ले और अपनी तिजोरियां भरने का काम करे। बल्कि जन प्रतिनिधियों को इसलिए चुना जाता है कि वे जनता के हित मे अच्छे कार्य कर सकें। किसी भी नेता ने आजतक जनता की भलाई के लिए कम बल्कि खुद के स्वार्थ के लिए ज्यादा दल-बदल किए हैं। नेताओं को अगर दल बदलना ही हो तो कम से कम चुनाव हारने के बाद दल बदले। जनता के वोट से कुर्सी हासिल करने के बाद दल बदलना जनता को जनार्दन के पद से पददलित करने के कुकृत्य जैसा है। जनता का समर्थन रहेगा तो सत्ता का कई बार सुख मिलेगा वरना गलती से एकबार चुने जाने के बाद दूसरी बार सत्ता के लिए सारे रास्ते बंद होना तय है।
जय भारत!
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