मैं भाषण हूं

 मैं वो हूं जो घर से लेकर सारे विश्व में सार्वजनिक संवाद का चहेता यंत्र हूं। ना ना, मै लाउडस्पीकर नहीं हूं। अदृश्य हूं लेकिन जीवित हूं। मै कहने वाले, और सुनने वाले के बीच की अति आवश्यक कड़ी हूं। उपयोगिता की दृष्टि से देखें तो कहने को उपदेश, सलाह या मुंह से चलने वाला औजार हूं। मैं किसी भी ब्रेकिंग न्यूज़ से कम सनसनीखेज नहीं हूँ। मेरे लिए हर श्रोता अपनी दीवानगी जाहिर करता है। चाहे न चाहे हर कोई गाहे-बगाहे मेरा इस्तेमाल करता रहता है। मैं किसी को कुछ दूं या ना दूं लेकिन, मुझसे ले लेकर हर कोई किसी न किसी को बहुत कुछ देता रहता है। इस तरह विचारों का भाषा के माध्यम से संप्रेषण के दौरान मेरी उत्पत्ति होती है और मैं "भाषण" के शुभनाम से जाना जाता हूं।

        वैसे तो मैं अपने आपमें कुछ भी नहीं हूं लेकिन जहां बोलने और सुनने वाले दो तत्व होंगे वहां मेरा अस्तित्व स्वयं ही दिखाई पड़ता है। इस विश्व में कइयों लोग मुझे अपने बोलने या कहने के बेहतरीन हुनर के तौर पर पेश करते है। जहां कहीं, किसी भी भाषा में संबोधन होगा मतलब मेरा इस्तेमाल होगा। मेरे इस्तेमाल से कितने ही लोग सड़क से संसद तक पहुंच जाते है। और कई तो वैश्विक नेता भी बन जाते है। जो भी जितना अधिक अनाप-शनाप फेंकेगा वह उतना ही प्रभावशाली वक्ता माना जाता है। ऐसे ही फेंकुओ की लपेटने वाले भक्त कहलाते है जो आंख बंद करके लपेटते रहते है, वे अंधभक्त की विशेष श्रेणी में आते है।

         मेरी उपयोगिता घर से लेकर गली मुहल्ले तक, सड़क से लेकर संसद तक विभिन्न प्रकार से बनी हुई है। घर में मां का भाषण, गली में चाचा ताऊ, पड़ोसियों का भाषण, स्कूल कॉलेज में टीचरों का भाषण। वरिष्ठ का कनिष्ठ को भाषण, अधिकारी का कर्मचारी को भाषण, सेनापति का सेना को भाषण, लेनदार का देनदार को भाषण। और चुनाव से पहले नेताओं के रंग बिरंगे भाषण सुनने को मिलते ही है। ये सब देशकाल और समय की विशेष मांग का नतीजा हैं।

        मेरा सबसे बेसिक कार्य लोगों में संबोधन के कार्य को जीवंत करना है। मैं वह जिन्न हूं जो अगर किसी के अंदर घुस गया तो समझो उसकी नैया पार है। वैसे तो मेरे सक्रिय होने के कुछ खास मौके ही होते है। घर में माता-पिता के अंदर तो मैं हरदम रहता हूं। शादियों के दिनों में फूफाओं, मामाओं और मौसाओं में मेरा विशेष वैरिएंट का वायरस घुस जाता हैं। कोई बात हुई नहीं कि मेरी कैसेट बजना चालू। बेटा ऐसा मत करना, बेटा वैसा मत करना। अरे! हमसे तो पूछा तक नहीं। ऐसा क्यों किया? वैसा क्यों नहीं किया, इत्यादि। जबतक मैं वक्ताओं की गोद में हूं तबतक तो सुरक्षित हूं किंतु प्रवक्ताओं के हत्थे चढ़ा तो मेरा गला घोंटना तय है।

              अगर मैं कहूं कि राजनीति में मेरा बेजा इस्तेमाल किया जाता है। अगर मैं कहूं कि, नेताओं ने मेरा अति दोहन किया है तो यह बात एकदम सच है। मेरा इस्तेमाल कर करके नेता रात-दिन भर भरके झूठ परोसते हैं। मैं वह तोप हूं जिसे झूठ के कंधे पर रखकर, फर्जी वादों के मनमर्जी गोले दागे जाते है। वे गोले अंधी-बहरी, अनजान अशिक्षित जनता के बीच में जाकर गिरते है और उनके विस्फोट से पैदा होते रहते है, कालजयी अंधभक्त। जिनमें शून्य से लेकर दशमलव स्तर का तर्क सदैव विद्यमान रहता है। उनका बस चले तो बातों बातों में ही बबूल पर आम उगा देंगे। कौन माई का लाल नेता है जो बिना भाषण दिए राजनीति कर सकें? जबतक जनता के बीच भाषण नही होगा तब तक कोई भी व्यक्ति नेता नही कहलाएगा। और अच्छे भाषण के हुनर के बिना जनता भी नेता को अच्छा नेता नहीं मानती। वैसे भी अच्छे काम करने वाले ईमानदार नेताओं को कोई नहीं पूछता।

          'बार' में बार-बार जाने वाले लोग बार-बार मेरा इस्तेमाल "झूठे रिश्ते" बनाने में करते है। कब किसको भाई या बाप घोषित कर दें बताया नहीं जा सकता। और बार का कमाल तो देखो, जो सही तरीके की हिंदी भी नहीं बोल पाता है उसके अंदर से यकायक अंग्रेजी का ज्वालामुखी फट जाता है। हालांकि इसमें ग्रामर की गारंटी बिल्कुल भी नहीं होती।

          मेरी खूबियों में सलाह, मशविरा, नसीहत, उपदेश शामिल है। मुझे उपजने में न्यूनतम दो लोगों की आवश्यकता पड़ती है, अधिकतम की कोई सीमा निर्धारित नहीं हैं। एक वक्ता दूसरा श्रोता ही पर्याप्त है। वह तो भला हो कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण के पास माइक नहीं था वरना उनके गीता उपदेश को भी आज के दौर में भगवान का भाषण कहा जाता। माता-पिता और गुरुजनों की डाँट और नसीहत को दुनिया का सबसे ज्यादा फलदायी भाषण का खिताब तो जरूर मिलना चाहिए।

         बदलते राजनीतिक, सामाजिक परिदृश्यों को देखते हुए मेरी उपयोगिता बढ़ते ही जा रही है। वैसे भी मेरा मूल तत्व संबोधन है। वर्तमान विश्व में अगर भाषणवीरों का स्वर्णकाल चल रहा है तो मेरा अमृतकाल चल रहा है। झूठ का प्रचार हो या सच का शोषण हो मेरी उपयोगिता में कोई कमी नहीं आने वाली। मैं तो नसीहतों से लेकर फजीहतों तक हमेशा अमर रहूंगा। जबतक मानव झुंड में रहेगा मेरा अस्तित्व बना रहेगा। 

इसीलिए कहता हूं 

किसी के घर की रोटी हूं,

किसी के घर का राशन हूं

मैं भाषण हूं, मैं भाषण हूं।

                             जय भारत

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