ये तोहफ़ा तो कुबूल नही होगा
अगर आप किसी लोकतांत्रिक देश के नागरिक हो, देश के ईमानदार करदाता हो तो आपको तोहफा या मुफ्त का जैसे जुमलो से नाराजगी जरूर होनी चाहिए। आमतौर पर चुनाव का ढोल बजते ही ये तोहफ़ा वो तोहफ़ा, ये भी मुफ्त वो भी मुफ्त का गाना गाते हुए सारे तांत्रिक बाहर आकर अपने मंत्र मारने लगते है। चुनावी आगाज़ से लोकतंत्र में अचानक ही आत्मविश्वास पैदा होने लगता हैं। लोकतंत्र का सीना अचानक ही फूलने लगता है। क्या किसी भी राजनेता या राजनीतिक दल ने अपने पैसों के दम पर जनता को कुछ भी मुफ्त में दिया है? बिना करदाताओं के पैसों से मुफ्त में कुछ दिया हो? जब जनता का पैसा ही जनता के लिए खर्च किया जाए तो वह तोहफा या मुफ्त का कैसे हुआ? अगर सरकारें जनता के हितों को ध्यान में रख कर काम करती हैं तो यह उनकी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है।
क्या आम जनता सरकार को इसीलिए विभिन्न करों या जीएसटी का भुगतान करती हैं कि उन्हें तोहफा, सौगात, मुफ्त में वैक्सीन जैसी बाते सुनने को मिलेगी। यह एक नागरिक का उपहास उड़ाने के अलावा क्या हो सकता है। कोई भी नेता इतना दानवीर कब से हो गया कि वह तोहफे बांटने लग गया? क्या भारत में पहली बार मुफ्त वैक्सीन लगी है जो जनता को बार-बार यही है बताया जा रहा है की मुफ्त की वैक्सीन है। वे यह क्यों नहीं बताया जा रहा कि यह महंगे पेट्रोल-डीजल और महंगी रसोई गैस का परिणाम है जो सबको मुफ्त बताकर लगाई जा रही है। अगर पेट्रोल डीजल रसोई गैस और महंगाई दर फिर से 2014 से पूर्व वाली स्तिथि पर भी पहुंच जाए तो भी जनता खुद ही अपनी अपनी बचतों से ही लगवा लेती। जनता का पैसा जनता के लिए खर्च होना चाहिए ना कि उन पैसों से ढिंढोरा पीटे और फालतू के विज्ञापनों पर खर्च करें।
प्रिय नेताओ कृपया ध्यान दे कि मासूम जनता को जनता के ही पैसों से तोहफा देने का ढोंग बंद करे। जनता यह मानकर चलती है कि उनके नेता, मंत्री, मुखिया इत्यादि लोकतंत्र की स्थाई व्यवस्था के अस्थाई किंतु अच्छे चरित्र है। लोकतन्त्र में ये चरित्र कभी भी बदलने कि शक्ति जनता जनार्दन के ही हाथों में है। सेस तो शेष है।
जय भारत!
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