समझौते और हम
हमें समझौते करना और उन्हें व्यवहार में उतारना आना चाहिए। समझौते हमेशा बुरे भी नहीं होते। इसमें किसी एक पक्ष की ओर आंशिक झुकाव जरूर हो सकता है अथवा दूसरे पक्ष के लिए थोड़ा अधिक लाभ का सौदा हो सकता है। वैसे भी लाभ तो दोनो ही पक्षों को होता है। लेकिन समझौते में सावधानी भी बरतनी चाहिए। समझौते का आदर्श नैतिक मूल्यों और अच्छे आदर्श होने चाहिए।वैसे समझौते का दूसरा तत्व "Give and take" होता है। समझौते हमारे लिए नए विकल्प प्रदान करते हैं, कई नई संभावनाओं को, नए संबंधों, नई शुरुआत, नवीन संवादों, नए राष्ट्र राज्यों, नए वाणिज्य-व्यापार को जन्म देता है और साथ ही एक नए युग के निर्माण में भी मदद करता है।
हम चाहे या ना चाहे, हमें समझौते तो करने ही पड़ते हैं। हमें कभी न कभी अपनी महत्वाकांक्षाओं को एक तरफ रखते हुए समझौतारूपी मध्य मार्ग को अपनाना पड़ता है।समझौते कई प्रकार के होते हैं जैसे समाज का समाज से, भावनाओं का संवेदनाओं से, व्यक्ति का व्यक्ति से, राज्य का राज्य से, देश का देश से। हम लोग अपने दैनिक जीवन में भी न जाने कितने ही समझौते किए रहते है। समझौते को स्वाभिमान के ऊपर नही होना चाहिए इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। समझौते मानव व्यवहार को नियंत्रित करने में मदद करते है। साथ में प्रचलित परंपराओं को संचालित करते है। मनुष्य में मानवता के प्रति निष्ठा बनाए रखते है। इस तरह हम स्वतंत्र होते हुए भी समझौतों के जरिए आपसी संबंधों में बंधे रहते हैं और यही बंधन हमारी एकता और अखंडता को बनाएं रखता है।
जय भारत!
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