रूस यूक्रेन युद्ध :- सामरिक एवं मानवीय पक्ष
डर के आगे जीत है या नहीं यह तो कोई नहीं जानता लेकिन किसी ना किसी की हार जरूर है। इसी प्रकार के डर के माहौल में फिलहाल रूस के आगे यूक्रेन की हार लगभग तय है। यूक्रेन भी कभी सोवियत रूस का हिस्सा रहा है वर्ष 1991 में सोवियत रूस के विघटन के बाद रूस के अलावा यूक्रेन सहित 14 देश अस्तित्व में आए। तब से शीत युद्ध की समाप्ति और रूस की सामरिक शाख में गिरावट आई। रूस की आर्थिक स्थिति में भी गिरावट आई लेकिन धीरे-धीरे रूस इससे उबर कर बाहर आ गया। रूस का आज भी पुराने सोवियत रूसी संघ के देशों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दबाव बना रहता है लेकिन इस दबाव को कम करने के लिए यूक्रेन भी नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) में शामिल होना चाहता है जिससे रूस को सख्त आपत्ति रही है। जिसके जवाब में रूस ने यूक्रेन के 2014 में क्रीमिया पर अधिकार कर लिया।
यह सर्वविदित है कि अमेरिका भी येन केन प्रकार से रूस पर दबाव बनाए रखना चाहता है और नाटो के माध्यम से रूस कि सीमा तक अपनी पहुंच बनाना उसका एक उद्देश्य रहा है। नाटो के प्रमुख सदस्य देशों में अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, इटली जैसे शक्तिशाली देश शामिल है। रूस यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि नाटो की सेना किसी भी बहाने से उसकी भौगोलिक सीमा तक पहुंचे। रूस भी नाटो का अपनी सीमा कि तरफ प्रसार नही होने देना चाहता था तो स्वाभाविक था कि वह यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के नाटो में शामिल होने के प्रयास को भी सहन नहीं करने वाला था। यूक्रेन के नाटो में शामिल होने कि अपनी वजहें है, रूस भी उसे नाटो में शामिल नहीं होने देना चाहता जिसमें पुतिन कि अपनी वजहें है। हालांकि दोनों का एक ही उद्देश्य रहा है और वह है अपने-अपने राष्ट्र की सामरिक सुरक्षा।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की कई चेतावनियों के बावजूद भी यूक्रेन, नाटो में अपने शामिल होने की जिद पर अड़ा रहा। इस प्रकार दोनों देशों कि अपनी-अपनी ज़िद और पुतिन की महत्वाकांक्षाओं का परिणाम यह रूस-यूक्रेन युद्ध के रूप में देखने को मिल रहा है। रूस का अपना तर्क है कि शांति की तमाम प्रयासों के विफल होने के बाद ही उसने यूक्रेन पर हमला किया है जो कि एक सैन्य ऑपरेशन है। लेकिन इससे पहले पुतिन ने पूर्वी यूक्रेन के डोनेत्स्क और लुहांस्क को आजाद देश की मान्यता दिए जाने के बाद विवाद भड़का। इससे विश्व में एक तरफ शेयर बाजारों में भारी गिरावट देखने को मिली दूसरी तरफ क्रूड आयल के दामों में उछाल, रूसी मुद्रा रूबल में भी भारी गिरावट जैसे प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। साथ ही यूक्रेन और रूस की जनता सहित वैश्विक जनमानस में भय का माहौल है सो अलग है। रूस के नागरिक भी इस युद्ध को लेकर पुतिन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। यूक्रेन में भारत के 20 हजार के लगभग छात्र फंसे हुए हैं उनको लेकर भी सभी भारतीय चिंतित है।
विश्व ने दो-दो विश्व युद्धों की विभीषिका को देखा है और घातक परिणामों को झेला। दोनों विश्वयुद्ध तत्कालीन समय में अलग-अलग घटनाओं से शुरू हुए और विश्व युद्ध में तब्दील हो गए। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा अगर किसी राष्ट्र को युद्ध में झोंक दें तो यह किसी भी नजरिये से सही नहीं है। किसी स्वयं उत्पन्न भय या भय की आशंका को लेकर कोई भी देश किसी संप्रभु देश पर युद्ध तो नहीं थोप सकता। यह कहां तक सही है कि कोई शक्तिशाली देश किसी कमजोर या छोटे देश को झुकाने के लिए अनचाहा युद्ध थोपे। युद्ध में जान माल का नुकसान तो होता है लेकिन मानवता की हत्या भी होती है। राजनीति विज्ञान में भी यह कहा जाता है कि "शक्तिशाली ही शांति स्थापित कर सकते हैं" या "युद्ध के बाद ही शांति स्थापित होती है" यह दोनों कथन अपनी जगह सत्य हो सकते हैं। लेकिन अमेरिका वियतनाम युद्ध और अफगान युद्ध में हार का मुंह देख चुका है वहीं रूस भी अफगानिस्तान से हार कर ही घर लौटा है। यह भी सत्य है की युद्ध मानव की मानवता को भी नष्ट कर देता है। क्या हमने हिटलर जैसे तानाशाह की सनक का परिणाम नहीं देखा? किसी भी युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों के अलावा आम नागरिक भी बेवजह ही मारे जाते हैं इसमें उनका क्या दोष है? पर्यावरण का नुकसान होता है उसका तो हिसाब ही नहीं है।
शक्तिशाली राष्ट्रों को चाहिए कि वे विश्वशांति को बनाए रखने में मुखिया कि भूमिका निभाए। लेकिन इन सभी शक्तिशाली राष्ट्रों के भी अपने तय एजेंडे है। उन्हें विश्व शांति से कोई खास मतलब नहीं है। आज यह भी सवाल उठाया जाना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र संघ क्या कर रहा है? उसकी विश्व शांति स्थापित करने में भूमिका क्या है? संयुक्त राष्ट्र संघ ने क्या अपनी शक्तियां क्या केवल अमेरिकी हित साधने के लिए ही ही बचा कर रखी है। जब किसी देश के साथ रूस खड़ा होता है तो अमेरिका उसके विपक्ष में खड़ा होता है, वहीं अमेरिका जिस देश के साथ खड़ा होता है रूस उसके विपक्ष में खड़ा होता जाता है। इससे तो यही समझ में आता है कि जहां शक्तिशाली देश अपने अहंकार कि संतुष्टि को बिना किसी युद्ध या रक्तपात के पूरा कर ले वही विश्व शांति है अन्यथा विश्व शांति एक सुनहरा सपना मात्र है। बाकि तो आने वाला समय ही बताएगा किस शर्त पर, किसकी बलि लेकर, किस नफा नुकसान के बाद शांति स्थापित होती है।
जय भारत!
nice one
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