स्वीकारे

 व्यक्ति अथवा समाज को "यथार्थ" को अपने जीवन मूल्यों में आवश्यक रूप से सम्मिलित करना चाहिए। हमें यथार्थ को भलीभांति स्वीकार करना आना चाहिए। यथार्थ चाहे दुख हो खुशी हो, या सफलता-विफलता हो, सबको बिना शर्त स्वीकार करना चाहिए। यहां स्वीकार करने का आशय यह नहीं है कि हम हताशा से घिर जाएं। स्वीकारने का तात्पर्य है कि हम अपनी कमजोरियों और नकारात्मकता को अपने सफल और सटीक प्रयासों से सकारात्मकता में परिवर्तित करने के लिए दृढ़ संकल्प लिए है। यथार्थ हमें सहज, सरल और सत्य के निकट रखता है। यथार्थ, समाज में हमारी स्वीकार्यता को भी बढ़ाता है। यथार्थ से हमारी जीवन दर्शन ही नही अपितु वर्तमान दशा में भी परिवर्तन हेतु सकारात्मक शक्ति प्राप्त होती है और यही सकारात्मक शक्ति भविष्य में व्यक्ति और समाज का उत्थान करती हैं। 

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