रिश्तो की डोर

 किसी भी व्यक्ति के जीवन में ढेरों रिश्ते जुड़े होते हैं। रिश्तो में जुड़ना, रिश्तो में बंधना तो बहुत आसान है लेकिन उन्हें उनके अंजाम तक पहुंचाना चुनौती भरा कार्य है। सामान्यतः हम जिन रिश्तो से जुड़े होते हैं उनके प्रति हमारे मन में श्रद्धा और ईमानदारी तो जरूर होती है लेकिन अब वक्त करवट लेते जा रहा है और रिश्तो में कृत्रिमता और अघोषित स्वार्थ ने प्रवेश कर लिया है। जिससे रिश्तो में गहराई, लगाव एवम जुड़ाव कम होता जा रहा है। रिश्तो में अलगाव का आलम यह है कि अब नवविवाहित दंपतियों में भी तलाक सामान्य सी प्रक्रिया हो गई है।

व्यक्ति का आधुनिक होना और तकनीकी परिपूर्णता भी समाज में रिश्तो के अलगाव का प्रमुख कारण है। आज के दौर में हम कृत्रिम उपकरणों और संसाधनों से जुड़ रहे हैं जबकि मानवीय रिश्तो से दूरी बनाने लगे हैं। समाज में दिखावे का आलम यह है कि हम हमारे घर में कुत्ते पालना पसंद कर रहे हैं और उन्हें समय देते हैं जबकि बच्चों में संस्कार डालने और वृद्ध माता-पिता की सेवा करने के लिए हमारे पास समय नहीं है। बच्चों को स्कूल में भेज कर माता पिता के कर्तव्य से पल्ला झाड़ लेते हैं जबकि वृद्ध माता-पिता को वृद्ध आश्रम में भेजकर बेटा या बेटी होने का दायित्व खत्म कर लेते हैं। जैसे संस्कार हम हमारी आने वाली पीढ़ियों को देंगे वे उसी का अनुसरण करेंगे। और उस समय हम भी उपेक्षा का शिकार होंगे।

इसलिए अब वक्त है रिश्तो के प्रति संवेदनशील होने और सामाजिक सुधार का। हम हमारे जीवन मूल्यों में रिश्तो के प्रति ईमानदार और सजग रहे। रिश्तो को समय दे और कोशिश यह करें कि हम सभी रिश्तो को जी भर जीये, रिश्तो का सम्मान करें। और घर परिवार समाज में सभी का सम्मान करें।

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