उनके आने की खबर
उनके आने का, हमारे तमाम नगर को और खासतौर से नगर में वाशिंगटन की सड़कों को जैसे कई दशकों से इंतजार था। वाशिंगटन की सड़कें अपने प्रियवर को देखने के लिए तड़प रही थी, प्रियवर भी तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख का खेल खेले जा रहे थे। तभी उनको अपनी तमाम भूलों के बावजूद जनता से झूठे वादे करने का वादा याद आ गया। हमारे नगर की भुलक्कड़ जनता बहुत ही भोली भाली है। उनसे कोई भी, कुछ भी, कैसे भी झूठ बोल जाए वो सब कुछ भुला देती है। वैसे भी झूठे वादों को याद रख कर क्या फायदा? हम भी अपने लोगों से ही कई बार कई वादे करते उन्हें भी कौन सा पूरा करते हैं?
खैर! वाशिंगटन की सड़कों से याद आया कि नगर की जनता और हमने इन वाशिंगटन की सड़कों से बहुत कुछ पाया है, फ्री में खाना पचाया है, फ्री में चेहरा चमकाया है। फ्री का पाउडर, फ्री का पॉलिश, सब कुछ फ्री में। कहीं इतने जिम्मेदार मुखिया मिलते हैं जो रंगभेद से कुंठित लोगों के आत्मविश्वास को बढ़ाने का काम करें, काले सांवलों को गोरा करने का फ्री में इलाज करें। और सही बताये तो हमने भी बहुत मेकअप किया है इन सड़कों पर। और अधिक जानना चाहो तो सड़कों का भ्रमण करके देखो कई जगह ऐसा लगता है वाशिंगटन वाले अपने हिस्से की सड़क उखाड़ ले गए है। जहां से मुखिया जाना है उन सड़कों के तो भाग्य खुल गए छोटे मुखिया वाशिंगटन जाकर फिर से नगर की सड़कों का हिस्सा वापस ले आये है, तभी तो कुछ विशेष सड़कें चमक रही है।
हमने भी अपने नगर के कुछ छुटभइयों से विचार विमर्श कर यह निष्कर्ष निकाला कि भाई साहब अब हमें विकास नहीं चाहिए। हमें तो सिर्फ मुखिया चाहिए क्योंकि मुखिया जहां से गुजर जाए वहां विकास अपने आप दौड़ा चला आता है, इसलिए विकास को बुला कर कोई फायदा नहीं होना। कुछ विपक्ष वालों ने भी मुखिया का विरोध करने का निश्चय किया हमने उनसे भी कहा कि भैया मुखिया का विरोध करना छोड़ो उनको तो बस अपने गली, मोहल्लों में बुला लिया करो अपने-अपने फायदे का विकास अपने आप हो जाएगा। विरोध करने की कोई जरूरत ही नहीं है वैसे भी विरोधियों की पहले से बहुत मोटी चमड़ी हो चुकी है जनता के मामले में उनको क्या फर्क पड़ता है। हमने भी बहुत दिन हो गए कभी सरकार का विरोध नहीं किया बस कभी कभार बहादुरी दिखाने के लिए फेसबुक या ट्विटर पर अपनी लाठी भांजी है बस। हालांकि यह तकनीक भी हमने हमारे हताश, बेरोजगार, कमजोर और मजबूर युवाओं से ही सीखी थी। वैसे भी अब विरोध करना या विद्रोह करना एक ही श्रेणी में आने लगा है तो कौन मूर्ख है जो विद्रोही बनना चाहेगा।
तो कुल मिलाकर बात यहां आकर समाप्त होने को है कि हमने भी सड़क किनारे खड़े होकर मुखिया जी जिंदाबाद के नारे लगाने के लिए तैयारी करनी है। स्वर्गीय सुख प्रदान करने वाली असीम महंगाई के बावजूद भी अगर कहीं से कुछ फूल मिल जाए सस्ते में तो, मुखिया जी पर बरसा भी देंगे। भैया हमें तो वैसे भी फोटो चिपका झोला मिल गया है कुछ अनाज के साथ, इतने में तो जीवन यापन कर ही लेंगे। आगे की हलचल देखकर कुछ और सोचेंगे।
जय भारत।
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