मैं भी मूर्ख
तो तुर्रम भाई बात ऐसी है कि, आज के समय में मूर्ख होना बड़ी इज्जत की बात है। वैसे भी मूर्ख होने में कोई बुराई नहीं है, होशियार होकर भी कौन सा तीर मारते? समस्या बस इतनी है जो मूर्ख होता है वह खुद को मूर्ख मानने को तैयार नहीं रहता। जब भी किसी मूर्ख व्यक्ति को लगता है कि वह होशियार हो गया है, उसके हजार दुश्मन बनने लगते हैं। लोग जलने लगते हैं जिसे देखो वही कहने लगता है देखो, कैसे होशियारी मार रहा है। मूर्ख होने के कारण तुगलक या रंगीला की उपाधि अनायास ही मिल जाती है। कितना अच्छा होता कि श्रेष्ठतम मूर्खो को कुछ पुरस्कार वितरित किए जाते। मूर्खता वह विशेष गुण है जो कईयों लोगो में कूट कूटकर भरा होता है जो समय समय पर फूट-फूटकर बाहर निकलता है। मूर्ख अपने आप में बिना पद के बादशाह से कम भी नहीं होता।
मूर्ख होने के कई फायदे हैं। पहला, मूर्ख को कोई मूर्ख नहीं बना सकता। दूसरा, कोई भी मूर्ख को होशियार नहीं बोल सकता। तीसरा, कोई जिम्मेदारी नहीं मिलती। चौथा, मूर्ख की बेइज्जती नहीं और इज्जत मिलती नहीं, वगैरा-वगैरा। तुर्रम भाई को तो बचपन से ऐसे ही चंदा मामा, शेर, भालू, बंदर, भूत चुड़ैल इन सब के नाम पर असीमित मूर्ख बनाया गया। बड़े होने पर भी लोगो ने नाना प्रकार से मूर्ख बनाया गया सो अलग। वह तो अपने मूर्ख होने में ही गर्व करता है, वैसे भी बाप ने कौन सा कलेक्टर बनाने की सोची थी। आज भी तुर्रम भाई की गलती पर कोई उन्हें डांटता है क्यों रे मूर्ख है क्या? तो तुर्रम भाई का सीना छप्पन इंच फूल जाता है और बहुत गर्व के साथ में घमंड भी महसूस होता है। वह सोचते हैं बिना बताए इसे मेरी इतनी असलियत और खासियत कैसे पता चली?
मूर्खता का भी अपना बहुत बड़ा इतिहास रहा है। मूर्ख होने में कितनी मशक्कत करनी पड़ती है यह तो मूर्ख ही जानता है। अच्छे-अच्छे लोग, राजे महाराजे, मुखिया, मंत्री, संत्री, उनकी जनता तक भी इस महानतम गुण से परिपूर्ण रही है। तुर्रम ने खाली पीली रोजगार का इंतजार करने वाले नौजवानों से कहा भाई रोजगार पा कर भी क्या करोगे? क्या करोगे होनहार, होशियार डॉक्टर, इंजीनियर, बाबू, कलेक्टर, पटवारी बन कर? अगर बनना ही है तो मूर्ख बनो, या मूर्खपति बनो। क्या पता किसी दिन मूर्खता के विशेष गुण संपन्न होने के चलते चुनाव में टिकिट ही मिल जाए। निरे मूर्ख बनकर आप होशियार लोगों की तरह किसी को मूर्ख तो नहीं बना पाओगे। देश और देश के राजनेताओं को भी सच्चे मूर्खों की एक मूकदर्शक सेना चाहिए जो बिना सोचे समझे कुछ भी करने को तैयार हो, पढ़े लिखे लोगों के द्वारा जिसे आजकल जनता के नाम से पुकारा जाने लगा है। इसी जनता को छिन्न भिन्न करने से नागरिक की प्राप्ति होती हैं। उन्हीं नागरिकों में से एक हमारा तुर्रम भाई।
खुदा भी मूर्खों का कभी भी साथ नहीं छोड़ता सच्चे मूर्ख को जीवन भर मूर्ख बने रहने की, हम्माली, चापलूसी, चाटुकारी और गुलामी करने की असीम शक्ति प्रदान करता है। तुर्रम के गांव के सरपंच ने एक बार आम सभा बुलाई और कहा कि भाई लोग सब सुन लो अब अच्छे दिन आने वाले हैं, ऐसा बड़े वाले मुखिया ने कहा है। ऐसा सुनकर जनता भी फूलकर कुप्पा, गुब्बारा, ट्यूब टायर इत्यादि हो गई। तुर्रम भाई ने भी जंग लगे दिए में सालों पुराना मुफ्त का घासलेट डालकर उजाला किया, पुराने चीथड़े वाले कपड़ो पर रफू कर गांव के चौराहे पर अच्छे दिन के स्वागत हेतु बैठ गया, तब से अबतक बैठा है। पर अच्छे दिन भी ऐसे कैसे आ जाएंगे? आए भी नहीं। हां सरपंच ने एकदिन तुर्रम भाई पर तरस खा कर कहा भाई अभी तो मूर्ख निर्माण, अंधभक्त निर्माण, चाटुकार निर्माण के कार्य चल रहे है। शायद इन सब के बाद अच्छे दिन का नंबर आयेगा। इन सब के बावजूद भी बहुत सारा विचार करने के बाद सवाल उठ खड़ा हुआ कि भाई अगर सभी लोग मूर्ख बन जाए तो होशियार कौन बचेगा? तभी एक कट्टर मूर्ख बोला, भाई जिन्होंने संविधान की कसम खाई है वे।
मूर्खता और होशियारी में वैसे तो एक एहसास मात्र का अंतर है, दोनों स्थिति में होने का, और नहीं होने का एहसास मात्र होता है। दोनो ही को अपने-अपने पर गर्व है अगर कोई होशियार है तो उसे यह साबित करना होता है। लेकिन मूर्ख होने में मूर्खता साबित नहीं करनी पड़ती, अपने आप झलक जाती हैं। कई मूर्ख, होशियार होने का दिखावा करते फिरते है, फिर भी रहेंगे तो मूर्ख के मूर्ख। तुर्रम भाई को अनुभवशील मूर्ख बनने में कितनी मेहनत लगी है इसका किसी को अंदाजा थोड़े ही है। कितनी ही बार भक्त बना, कितनी ही बार अपने घोषणावीर सरपंच के जयकारे लगाए, बैनर लगाए, खूब धूल धक्के खाए। सरकारी महकमों में भी मूर्ख होना वरदान प्राप्त होने जैसा है। "बने रहो पगला काम करते रहेगा अगला" यह आरामप्रिय नारा बुलंद रहता है, कुर्सियां तो खाना पचाने में ही टूटने लगती हैं।
कैमरे और माइक का धंधा करने वालो ने खुद को सर्टिफाइड, समर्पित मूर्ख घोषित कर रखा है। कसम बेईमान की खाते हैं असलियत नही दिखाएंगे, अगर सवाल करे कोई सरकार से, उसी पर सवाल उठायेंगे। अगर ये लोग तोता पालन केंद्र खोलते तो और ज्यादा सफल हो सकते थे। अपने तुर्रम भाई ने भी फूल वाली टोपी पहन कर "मैं भी चौकीदार" का गाना खूब गाया, हाथ कुछ न लगा, अलग बात है। तो थक हार कर तुर्रम भाई का अब आखरी में यही कहना है कि दुनिया के तमाम मूर्खों अब एक हो जाओ और मेरी नई नई खुली, पकौड़े कि दुकान पर आओ मुफ्त में झुठीली चाय के साथ मूर्खिले पकौड़े खाओ और गर्व से कहो "मैं भी मूर्ख"।
जय भारत!
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