तपस्या: कैसी होती हैं?

थोड़ा ही सही उतर तो आए आंखों में पानी
उनका का तमाम पानी उतर जाने के बाद।
न जाने किन मजबूरियों में माने है जनाब
कई बेकसूर चरागो के, बूझ जाने के बाद।

जब इंद्र के सिंहासन तक को हिलाकर रख देने वाली कठोर तपस्या और हठयोग से मुखिया जी को विश्व झूठलर होने का वरदान प्राप्त हुआ। मुरझाए लोकतंत्र कि असहाय जनता में हाहाकार मच गया। जो मुखिया और उनकी सहयोगी मीडिया अब तक जिन काले कानूनों को किसान हितैषी बता रहे थे, घड़ी थी उनको वापस लेने कि घोषणा करने की। सो मुखिया जी ने अपने ही हाथों से अपनी पीठ थपथपाई, अपनी कठोर तपस्या और झूठी मानवता का हवाला दिया, जिसकी सनसनीखेज दबी गर्मी से मुखिया जी के जबड़े की जकड़न दूर हुई, अंदर के घमंड की बर्फ पिघली। फिर बड़े बेआबरू हो कर, बेमन से काले कानूनों को वापस लेने कि घोषणा की, सो मुरझाए मन से मंत्री संत्री ने भी आदतन हां में हां मिला ही दी। अगर आदमी चाह ले तो खुद ही रायता फैला भी सकता है और खुद समेट कर पी भी सकता है, यह महान हुनर कम ही लोगों में पाया जाता है। लेकिन इत्तेफाक तो इत्तेफ़ाक है, हर कोई चौकीदार थोड़े ही बन सकता है। पिछले एक साल से किसानों से दूरी बनाए रखने वाले मुखिया जी ने किसानों पर प्रेम का टैंकर ऐसे उड़ेल दिया जैसे जवानी के दिनों की महबूबा वापस मिल गई हो। और शायद उन्हें भी डर तो है कहीं फिर से खेला न हो जाए। किसान भी जानते है यह छिपा हुआ प्रेम चुनाव के लिए बचा के रखा था।
       किसान आंदोलन की जितनी भी तारीफ करे वो कम है। उनके इस आंदोलन में कुशल नेतृत्व, कुशल प्रबंधन, धैर्य, अनुशासन, साहस, अहिंसा, भाईचारा, मेहनत लगन सबकुछ देखने को मिला। वास्तव मे यह कठोर तपस्या मुखिया जी की नही बल्कि अन्नदाताओं की है जिन्होंने साल भर से सर्दी, गर्मी, बरसात सभी मौसमों को अपने सिर झेला। मुखिया जी ने किसानों को आंदोलनजीवी, परजीवी, वामपंथी, खालिस्तानी, देशद्रोही न जाने क्या क्या कह कर लांछन लगाए। तब मुखियाजी का किसान प्रेम कहां था? टीवी वालो ने तो अपनी सारी हदें ही पार कर दी थी किसान आंदोलन को बदनाम करने में। देश को पहली बार पता चला कि कंटीले तार की फेंसिंग और नुकीले कीलों का उपयोग दुश्मनों को रोकने के लिए ही नही बल्कि देश के अन्नदाताओं को रोकने के लिए भी किया जाता है। दिल में किसानों के लिए इतनी घोर नफरत और झूठे मुंह किसान प्रेम का दिखावा, ऐसे कैसे? नज़रों के सामने दोगलेपन का बाजार अपनी चरम स्थिति पर पहुंच गया। पर माटी के लालो ने सरकार के घमंड को मिट्टी में मिला कर रख दिया। छप्पन इंच का सीना सिकुड़ रहा है या फूल रहा है कुछ पता नहीं चला। जिन काले कानूनों को अच्छा बताने में टीवी एंकर ऐंकराओ की जीभ साढ़े तीन फीट बाहर निकल रही थी, वो सभी जाने कहां दुबक गए, सबकी सांसे फूलने लगी। उन्होंने अपने खोजी पत्रकार होने का परिचय देना ही था तो दो चार खालिस्तानी आतंकी भी ढूंढ निकालना था। अरे भाई जिन किसानों कि मेहनत से पैदा हुआ अनाज खाने से अगर आपको तकलीफ़ नहीं है तो उन किसानों के लिए इतनी जलन और नफरत क्यों? अगर एक भ्रष्ट नेता से लेकर नौकरशाह, पूंजीपति वर्ग सहित सभी लोग अच्छे स्तर का जीवन जी सकते है तो किसान क्यूं नहीं? क्या हमारे देश के किसान ने हमेशा लाचार, गरीब, फटेहाल और दूसरो पर ही निर्भर रहना चाहिए? देश के कई किसान कर्ज मे डूबे हुए है और आत्महत्या कर रहे है वहां किसी मीडिया की नजर क्यों नही पड़ती है? कई अंधभक्त मीडिया वाले को किसानों ने आंदोलन कि जगह से खदेड़ दिया, अच्छा ही किया। चौथे स्तंभ का सत्यानाश ऐसे ही लोगों ने कर रखा है।
                किसान आंदोलन को हार जीत की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए, फिर भी अगर इसमें हार हुई है तो सरकार के घमंड की और जीत हुई है तो देश के सच्चे, मेहनती और अपने-अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किसानों की। अगर मुखिया जी को लगता हैं की उन्होंने छह हजार रूपए कुछ किसानो के खातों में डाल कर किसानों पर बहुत बड़ा उपकार किया है तो किसानों का भी कहना है की छह हजार रूपए में मुखिया जी एक साल भर अपनी चाय का खर्चा ही चलाकर बता दें खेती करना तो दूर कि कौड़ी है। हमारे देश के सोए हुए बेकार, बेरोजगार, नागरिकों को अगर लगता है के उन्हें घर बैठे फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्वीटर पर समर्थन या विरोध मात्र करने से सबकुछ हासिल हो जायेगा तो यह बेमानी है अगर कुछ हासिल होगा भी तो महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी और हिन्दू-मुसलमान से ज्यादा कुछ नहीं होगा। जो मुखिया जी घड़ियाली आंसू बहा कर स्वयं को तपस्वी घोषित करने में लगे हैं क्या उन्होंने किसान आंदोलन में सात सौ से अधिक किसानों की दुखद मृत्यु पर एक शब्द भी कहा? कभी नहीं। तो फिर किस मुंह से अपने आप को किसान हितैषी बताने में लगे हैं? क्या मुखिया जी अपने पूंजीपति मित्रों से किए वादों के तले दबे हुए हैं? अगर मुखिया जी को सच्ची तपस्या करनी ही है तो किसानों के लिए समुचित एमएसपी का कानून ले आए। सरकारी देखरेख में देश के किसान संगठनों के सदस्यों कि एक समिति बनाए जो सालाना फसलों का न्यूनतम मूल्य वार्षिक वास्तविक खर्चे के हिसाब से सही बैठे निर्धारित करें। सरकारी गोदामों और कृषि उपज मंडियों के प्रबंधन और नियमन को मजबूत करें। सालो से अनाज खरीदी केंद्रों पर बारदानो कि किल्लत हमेशा बनी रहती है उसे दूर करें, अनाज खरीदी में धांधली करने वालो और भ्रष्टाचार करने वाले बेकाबू बाबुओं, अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करने से भी ना चूके। ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा का गाना खूब गा रहे थे अब समय रहते उसे अमली जामा पहनाओ। बिजली सब्सिडी बिल का प्रस्तावित विधेयक भी यही बता रहा है कि जो गैस सब्सिडी का हस्र हुआ है वही बिजली सब्सिडी का होना है। आज बात सिर्फ किसानों के हक कि ही नही है बल्कि देश गरीब और मध्यम वर्ग के हक की भी है। अगर किसानों का अनाज सस्ते दामों पर खरीदा जा रहा है ठीक है, लेकिन उसी अनाज को जब अलग अलग ब्रांड में पैकिंग कर के दुगुने या उससे अधिक दामों पर बेचा जा रहा है यह तो किसानों, गरीबों और मध्यम वर्ग दोनो के पेट पर लात मारना है। न्यूनतम समर्थन मूल्य और अधिकतम विक्रय मूल्य में दोगुना अंतर। यह आर्थिक अन्याय क्यूं? देश का मध्यम वर्ग और गरीब क्या इस बात को भूल गया है कि 2014 के चुनाव में महंगाई और बेरोजगारी के नाम पर वोट मांगने वालो ने उन्हें फिर से महंगाई, बेरोजगारी के दलदल में धंसा कर रख दिया है। क्या मुखिया जी यह बात भूल गए हैं की देश की गरीब जनता के हाथों उन्होंने जो थैला थमाया था उसमें भी किसान के खून पसीने का हिस्सा ही था।
                किसानों के लिए नेता, मीडिया और भक्तों ने जो भला बुरा कहा उससे उतनी पीड़ा नहीं हुई लेकिन जब इन्ही सब लोगो ने कहा कि आंदोलन कि जगह किसान दूध, दही, पनीर, घी, पराठे, खीर सबकुछ बड़े मजे से खा रहे है, कइयों ने दुहाई दी के भाई आंदोलन में शामिल किसान तो मजे करने आये हैं। तो कहना है के भाई अगर किसान दूध, दही, घी, पनीर, सब्जी, अनाज सब का उत्पादन कर सकता है तो वह अपनी ही उत्पादित वस्तुओ को मजे से खाए भी तो उसमे बुरा क्या है? इसमें लोगो को परेशानी क्या है? क्या किसान भूखा मर जाए तब तसल्ली मिलेगी? जिस किसान कि मेहनत से पैदा कृषि उत्पादों को नेता, अभिनेता, साधू, शैतान, मुखिया, भक्त सभी खाते हैं, किसान ने तो कुछ नहीं कहा। जिन मीडिया वालों ने गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, चरमराती स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था, लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था, विदेश नीति जैसे विषयों पर सरकार से सवाल करने चाहिए तो वो उल्टे उन लोगों को गलत साबित करने में लगे हुए हैं जो अपने अधिकारो की मांग कर रहे है। अरे भाई मीडिया वालों क्या आप ताली-थाली बजाने, दीया मोमबत्ती जलाने, हिंदू-मुसलमान का ढोल पीटने और चार चाटुकारों के साथ टीवी पर बहस कराने मात्र के लिए हो क्या? इन्हीं कारणों से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी झूठ, चापलूसी, चाटुकारी के दलदल में धंसता जा रहा है। अगर कुछ खुददारी बची हो तो सच के साथ खड़े होकर दिखाओ। असल पत्रकारिता में सच और स्वाभिमान कब शामिल होगा पूछता है भारत।
                तो आखिरी में यही कहना है कि मुखिया जी आप एकबार फिर से, अच्छे और सच्चे मन से देश हित में तपस्या करें। रेडियो पर ना आते हुए मीडिया और जनता के सामने आए और जनता के सवालों का सामना करें। मन कि बात जैसे बकवास काम में समय न गंवाते हुए सीधे परेशान किसानों से संवाद स्थापित करें, और उनकी मांगों का समुचित निराकरण करें। नही तो अगर आपको लगता कि आप विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के मुखिया हो, सब तरफ आपकी ही हवा है तो यह ध्यान रहे कि अगर देश में दस करोड़ किसान भी होंगे और हर एक किसान पर तीन लोग भी आश्रित होंगे तो कुल मिलाकर चालीस करोड़ लोग हो जायेंगे और इतनी बड़ी आबादी के फूंकने मात्र से  जाने कितने ही तंबू उखड़ जायेंगे पता ही नही चलेगा। तो अबकी बार मन कि बात नही, जन कि बात करें।
                          जय भारत!

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