नाकारा, कामचोरी को निहारता
हम में से कितने ही लोग कर्मठ है जो काम करना चाहते है लेकिन कई सारे लोग ऐसे भी हैं जो कामचोरी को ही अपना काम समझते हैं। कामचोरी करने मे भी मेहनत करने जितनी ही ऊर्जा खर्च करनी पड़ती हैं। क्योंकि काम करने वाला तो काम करके थक हार कर एक तरफ हो जाता है लेकिन नकारा कामचोर काम न करने के लिए तमाम जुगत भिड़ाने में लगा हुआ रहता हैं। अतः काम करने और कामचोरी करने में थकान तो कॉमन बात है। मेहनती व्यक्ति काम करना या काम करते रहना, ज्यादा पसंद करता है। जबकि आलसी व्यक्ति कामचोरी करने में स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है। इस प्रकार के कामचोरों का एक बड़ा समूह समाज में दिन-रात आलस्य के बीज बो रहा है, यह लोग अपनी आने वाली पीढ़ी के रक्त में आलस्य को मिश्रित करने का कार्य कर रहे हैं। उसी का नतीजा है कि आज हम अच्छे दिनों कि आस में, सरकारी खाद-पानी पर परजीवी जैसे जीवित रहने लगे है।
आज वर्तमान परिदृश्य में सरकारी योजनाएं और सरकारी नीतियां कामचोरों कि पोषणकर्ता बन गई हैं। भले हीं ये योजनाएं और नीतियां अच्छे उद्देश्यों को लेकर लायी गई हो लेकिन एक मसला और है कि इन सभी सरकारी योजनाओ का क्रियान्वयन भी अधिकतर कामचोर लोगो के हाथो में ही रहा है। वे सरकारी योजनाएं और नीतियां ही सफल हो पाती हैं जिनमे भ्रष्टाचार हेतु पर्याप्त मौके मिलते है, अगर नहीं तो फिर किसी भी सरकारी योजना का सफल होना लगभग नामुमकिन है। मनरेगा, स्वच्छ भारत मिशन, खाद्य सुरक्षा मिशन, गंगा सफाई अभियान, आयुष्मान भारत जैसी कई योजनाएं है जिनसे भ्रष्ट लोगो ने अपनी तिजोरियां भरने का काम किया है। ना भुखमरी घटी, ना गंगा साफ हुई, आयुष्मान से जुड़े अस्पतालों के वारे न्यारे हो गए, पंचायतो के सरपंच और सचिवों ने अपनी अपनी जेबें भरी। हालांकि बहुत सारे मामलों मे देखा जाए तो जनता में जागरूकता का सवाल भी है। भारतीय जनता, जो लोकतंत्रीय भीड़ से कम नहीं है। अगर कहीं से भी कुछ भी मुफ्त का मिला तो चल पड़ते है भेड़ चाल में, उसे लूटने। इसी महान जनता का लोटाछाप और झोलाछाप रवैया भी बहुत बड़े स्तर तक ज़िम्मेदार हैं। हमारे जनमानस के व्यवहार में कहीं भी कचरा फेंकना, गुटखा-पान खाकर कहीं भी थूकना, सार्वजनिक शौचालयों का सही इस्तेमाल न करना जैसे हूनर तो कूट कूटकर भरे हैं। अगर इनमे दैनिक जरूरतों के उपयोग में आने वाली सुविधाओ के इस्तेमाल जैसी जरूरी और मूलभूत जागरूकता भी नहीं है तो पुलिस या प्रशासन कहां तक इन लोटाछप लोगो को सुधारते फिरेंगे? क्या जनता की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित नही होनी चाहिए? क्या हम सबने व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं उठानी चाहिए कि कम से कम अपने आसपास एक साफसूथरा माहौल बनाए रखें?
निष्क्रियता अथवा कामचोरी हम लोगो पर इस कदर हावी है कि हम अपने ही अधिकारो के प्रति जागरूक नहीं है। हमे नागरिक होने के नाते नागरिकों के मूलभूत कर्तव्य तक नहीं पता। जहां हमने कमज़ोर तंत्र, भ्रष्ट नेता, भ्रष्ट अधिकारी कर्मचारियों का विरोध करना चाहिए उसके उलट हम अपना बेशकीमती समय बचाने के चक्कर में मामूली घूस देकर अपने नागरिकत्व से पीछा छुड़ाने में ही भला समझते हैं। यही मामूली सी घूस कब बड़ी लूट मेंं तब्दील हो जाती है पता ही नही चलता। क्या हमने कभी अपने आप से प्रश्न किया है की हम करना क्या चाहते है? या तो हम कुछ भी नहीं करना चाहते है। तो क्या हम मरे नहीं इसीलिए जिंदा हैं? क्या हम बस खाने पीने सोने और आखिर में स्वर्गलोक कि अभिलाषा लिए मर जाने के लिए भर पैदा हुए है? आज कई सारे परिवार है जो पर्याप्त उन्नति नहीं कर पा रहे है। जैसे तैसे जीवन यापन करने को मजबूर हैं क्यों? क्योंकि ऐसे परिवारों में परिवार का मुखिया अकेला कमाता है बाकी सदस्य उस कमाई का उपभोग करने में लगे हुए हैं। अगर इन्ही परिवारों के सदस्यों में उद्यमिता होती तो वे भी कुछ न कुछ आय अर्जित कर ही लेते और परिवार को सहयोग कर सकते थे। लेकिन फिर से वही सवाल, कि काम करेगा कौन?
हमारे देश या समाज में एक बहुत बड़ा तबका ऐसा भी है जो मेहनती, ऊर्जावान उद्यमी भी है जो कोई भी छोटा बड़ा काम करने में परहेज नही करता है। कइयों लोग ऐसे भी भी है जो कामचोरी को पाप समझते है और सतत परिश्रम करने को अपना स्वाभिमान। इन्हीं स्वाभिमानी परश्रमियों और उद्यमियों ने ही देश में समाज, व्यवस्था, अर्थव्यवस्था को संभाले रखा है, देश और समाज में कइयों नए-नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। सरकारी प्रयासों के अलावा यही वह उद्यमी वर्ग है जिसने लाखो बेरोजगारों को रोजगार भी प्रदान किया है। लेकिन मानवीय स्वभाव कि कमीं ही कहे कि जैसे ही हमारी जरुरतें पूरी होने लगती हैं हमारे अंदर दो स्थितियों का जन्म होता है, कामचोरी या भ्रष्टाचार। ये दोनो ही स्तिथियां व्यक्ति को सामाजिक और आर्थिक पतन तथा नैतिक मूल्यों के पतन की ओर ले जाती है। इस प्रकार का पतनशील समाज में अच्छी से अच्छी व्यवस्थाएं, सुख-सुविधायें ले आओ, ये पतनशील लोग उन सब का सत्यानाश करने में जी जान से जुट जाएंगे। आप हम इस सन्दर्भ मे कई उदाहरण रोजमर्रा के जीवन में देखते जरूर है। दुख कि बात तो यह भी है कि हम बस देखते हैं।
तो फिर से कहना है कि, दुनिया में रहना है तो अच्छे काम कर प्यारे। खुद भी मेहनती बनो और कम से कम अपने-अपने परिवार के लोगो को भी मेहनती बनने हेतु प्रेरित करें। कामचोर और भ्रष्ट व्यक्ति अगर धन सम्पत्ति कमा भी ले, अपना प्रभूत्व जमा भी ले तो भी उनको समाज में सम्मान भरी नज़रों से नही देखा जाता हैं। जबकि एक ईमानदार मेहनती व्यक्ति को समाज में हमेशा सम्मान प्राप्त होता है और ऐसे व्यक्तियों को कई लोगो के आदर्श बनते है। बाकि तो सबकी अपनी अपनी पसंद है। सार्थक जीवन तो उन्नति में है, पतन में नहीं। फिर भी मन न माने तो कामचोरी को मौलिक अधिकार का दर्जा दिलाने हेतु संघर्ष करने के मार्ग खुले हुए है।
जय भारत!
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