आशा निराशा के बीच नववर्ष का आगमन- स्वागत

आज कैलेंडर के आखिरी पृष्ठ का आखिरी दिन है, जाहिर सी बात है वर्ष का अंतिम दिन। आज हमें यह चिंतन अवश्य करना चाहिए कि, की पिछले एक साल में हमने क्या खोया क्या पाया? उपलब्धियों के कितने  पायदान नीचे हुए या कितने ऊंचे? क्या हम में कुछ बदलाव आया है या वैसे के वैसे ही पुराने जैसे। अगर पुराने जैसे ही है तो कल से फिर एक नया कैलेंडर पुराने जैसा ही तारीखों के हेर फेर के साथ दीवार पर लटक जायेगा। इस प्रकार अगर पुराने कैलेंडर की जगह नया कैलेंडर लटकाना ही नए साल का आगाज़ है तो फिर बेवजह के दिखावे क्यों नए साल को उत्सव जैसे मनाने के? जो भी हो, हो-हल्ला, कूदा फांदी, मौज मस्ती अगर करनी ही है तो नए साल के नाम पर ही क्यूं? बाकि दिनो में भी कर सकते है, किसने रोका है?
      वैसे तो इस साल में बहुतों ने अपने करीबियों को खोया है चाहे वें घर परिवार रिश्तेदार या दोस्त यार ही क्यों ना रहे हो, लगभग सभी ने कुछ ना कुछ तो खोया जरूर है। अब जिन्हें खो दिया है उन्हें वापस ला पाना तो नामुमकिन है। इस साल में भी बहुत कुछ सीखने को मिला है। तमाम तरह की पाबंदियों में जीवन को जीने की सीख मिली है। एक तरफ किसानों का सुसंगठित आंदोलन देखने को मिला है। दूसरी तरफ कुछ राज्यों में रातों-रात मुख्यमंत्रियों के बनने और हटने की घटनाएं भी सामने आई। कोरोना जैसी महामारी ने हम सबको ऑक्सीजन की कीमत क्या होती है यह भी बताया। हमें यह भी सीखने को मिला की चुनाव के आगे जनता का जीवन कोई मायने नहीं रखता चाहे कोरोना हो या और कुछ हो। हां एक चीज नहीं समझ पाए वह यह है कि कोरोना वायरस बेचारा राजनीतिक रैलियों में क्यों नहीं असर नहीं करता। क्या कोरोना नेताओं से डरता है? सब्र का फल मीठा होता है लेकिन कोरोना का फल फेल नहीं, पास होता है जैसे कि हमारे शिक्षा तंत्र में हुआ।
      उपलब्धियों के नाम पर भी हमने बहुत कुछ हासिल किया। हमारी जीडीपी ऋणात्मक से धनात्मक वृद्धि में आ गई। किसान आंदोलन वापस ले लिया गया। सारे बाजार खुल गए। घोटालों का दौर  शुरू हो गया। धर्म को संरक्षण मिलने लगा। आरक्षण होगा या नहीं होगा चर्चा शुरू हो गई। जाति धर्म का पता चलने लगा तो बेरोजगारी, महंगाई से कोई खास मतलब नहीं रहा। चुनाव का मौसम आ रहा है सो घोषणाएं होती रहेगी। मन कि बात में सिर्फ मन की बात ही रहेगी, जन कि बात नहीं। तपस्या से कोई लाभ नहीं होना यह भी पता चलता है। संरक्षित चाटुकार मीडिया का बहुत बड़ा वर्ग खड़ा हुआ। भक्तो की संख्या में अच्छी खासी मात्रा में बढ़ोत्तरी हुई। भगवान श्रीराम का मंदिर भी निर्माणाधीन है। देश की सुरक्षा के लिए राफेल लड़ाकू विमान और एस-400 खरीदे और तैनात किए। कोरोना से बचने के लिए वैक्सीन उपलब्ध है। इस तरह से ढेरों उपलब्धियां गिनाई जा सकती है जो हमारे देश ने प्राप्त की है। व्यक्तिगत उपलब्धियों कि अपनी-अपनी गणनाएं अलग है। व्यक्तिगत रूप से क्या हम अपने समाज और राष्ट्र के लिए खुद को कितना समर्पित किए, सोचने का विषय होगा। क्या हम एक स्वच्छ, स्वस्थ और सभ्य समाज के निर्माण में नींव कि ईंट बनने के लिए तैयार है? अगर हां तो ये हमारी महानतम उपल्बधियां है, वरना कैलेंडर को बदलना कौनसा मुश्किल काम है।
      तो कहना है कि अच्छे और सच्चे उद्देश्यों के साथ साथ नेक इरादों को लेकर, हम सभी नववर्ष की नई भोर का सहर्ष स्वागत करें। समाज और राष्ट्र के विकास के साथ साथ हमें स्वयं का भी सर्वांगीण विकास करना हमारा लक्ष्य रहे। अपनी और अपने आसपास कि बुराईयों को यथासंभव दूर करने का प्रयास करें। हमसे जाने अनजाने किसी भी कार्य से किसी को कोई पीड़ा न पहुंचे। ईश्वर हम सभी को कोरोना महामारी से बचने कि शक्ति प्रदान करें। बाकि सुख दुख, खुशी गम, सफलता विफलता, आना जाना तो चलता ही रहेगा। नववर्ष की ढेरों शुभकामनाओं सहित सबको नमस्कार।
                      जय भारत!
      
      

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

आपके प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मैं भाषण हूं

मैं समर्पित दल बदलू

रूस यूक्रेन युद्ध :- सामरिक एवं मानवीय पक्ष