बाजारवाद: उन्नति, विकास और विनाश
दुनिया की तमाम मानवीय सभ्यताओं के आतित्व में आने के बाद राज्य, राजनीति, समाजीकरण और आर्थिक विकास में गुणोंत्तर बदलाव आते गए। जब से मनुष्य ने अधिशेष उत्पादन करना आरंभ किया तब से वस्तु विनिमय अथवा क्रय विक्रय की आवश्यकता को पूरा करने हेतु एक स्थान की आवश्यकता पड़ी जहां जहां आर्थिक गतिविधियां पूरी की जा सके, उस स्थान को बाजार कहा गया। धीरे धीरे मानव ने सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी विकास करने की गति को तीव्र किया। तकनीक और प्रौद्योगिकी के विकास से उद्योग-व्यापार, उत्पादन और सेवाओं में प्रसार हुआ, जिसके लिए बाजारों की आवश्यता पड़ी, जिससे नए-नए बाजार भी विकसित हुए।
उपनिवेशीकरण और साम्राज्यवाद ने जब पैर पसारे तो इन्हीं साम्राज्यवादी देशों को अपने अधिकृत देशों से कच्चा माल प्राप्त हुआ और अपने यहां निर्मित माल को बेचने के लिए बहुत बड़े बाज़ार भी। जरूरत थी तो औद्योगिकरण की, जो सबसे पहले यूरोपीय देशों से आरंभ हुआ। इन देशों ने अपने यहां निर्मित माल को विश्व भर में फैले अपने उपनिवेशों में बेंचा तथा इसी से वैश्वीकरण या वैश्विक बाज़ार जैसी व्यवस्था का जन्म हुआ। वाणिज्य और व्यापार में विकास से अब वृहद स्तर पर वैश्विक व्यापार में वृद्धि होने लगी। कंप्यूटर एवं इंटरनेट जैसी तकनीको के आने के बाद तो वैश्वीकरण ने अपने सही स्वरूप को प्राप्त किया। अब दुनिया के सभी बाजार एक दूसरे से इंटरनेट के माध्यम से जुड़ गए। बड़ी-बड़ी ऑनलाइन और ऑफलाइन व्यापार करने वाली कंपनियों का उद्भव हुआ। प्रतिस्पर्धी बाजार व्यवस्था से निवेशकों और उपभोक्ताओं दोनो को लाभ हुआ। उपभोक्ताओं को सस्ती सुलभ और तीव्र गति से वस्तु एवं सेवाएं प्राप्त होने लगी हैं। साथ ही व्यापार जल, थल, एवं वायु तीनों मार्गो से होने लगा। वैज्ञानिक खोजों ने इन सब को संभव बनाया। इस प्रकार देखते हैं कि वस्तुओं के उत्पादन और सेवाओं के विस्तार ने कई पुरातन व्यवस्था को ध्वस्त करते हुए नया स्वरूप प्रदान किया।
जैसे ही उत्पादन में नई तकनीकों नई मशीनरी और प्रशिक्षित इंजीनियर, कामगारों का इस्तेमाल आरंभ हुआ तो उससे वृहद उत्पादन होने लगा। प्रत्येक बहुराष्ट्रीय कंपनी अपना अपना माल बेचना चाहती थी अतः उन्होंने बाजार के प्रारूप में परिवर्तन करने पर भी ध्यान दिया। उत्पाद और विज्ञापन को आकर्षक बनाने के लिए तरह-तरह के प्रयोग किए जाने लगे। इस प्रकार से उपभोक्ताओं के मन में प्रत्येक उत्पाद के उपभोग करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया गया। इस प्रकार जीवन से संबंधित प्रत्येक वस्तु का मूल्यांकन केवल व्यक्तिगत लाभ या मुनाफे को लेकर किए जाने एवं उसका उपभोग करने कि प्रवृत्ति से युक्त विचारधारा को बाजारवाद कहा गया। बाजारवाद के तहत कंपनियां अपने-अपने उत्पादों पर अधिकतम मुनाफा कमाने हेतु उत्पादों को येनकेन प्रकारेण बाजारों के माध्यम से खपाना चाहती है चाहे उस उत्पाद की उपयोगिता हो या ना हो। अनेक प्रकार के प्रलोभनो को आजकल ऑफर कहते हैं, जिसे टीवी मीडिया, समाचार पत्रों एवं विभिन्न वेबसाइटों के माध्यम से प्रचारित किया जाने लगा। जब एक ही झूठ को हजार बार बोला जाए तो वह सत्य कहलाने लगता है। उपभोक्ता अपनी आय का एक मोटा हिस्सा इन्हीं बाजारवादी ऑफर के जाल में फंस कर खर्च करने लगा। बाजारवाद की बड़ी सफलताओं की अगर बात करें तो वस्तु उत्पादन एवं सेवाओं का तीव्र विस्तार, गैर जरूरी वस्तुओं की भी खपत में वृद्धि, सस्ती सेवाएं उपलब्ध कराना, परिवहन में तीव्रता इत्यादि है। लेकिन बाजारवाद ने कई प्रकार के निर्माण के साथ-साथ विनाश को भी जन्म दिया है जिसके विध्वंसक परिणाम अब आने लगे है और कुछ आने बाकी है।
बाजारवाद ने अधिकतम उत्पादन को प्रोत्साहित किया जिसके चलते ही प्राकृतिक संसाधनों, मानव श्रम एवं पूंजी का निवेश किया जाने लगा। प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन किया जाने लगा जिससे विश्व के सम्मुख वैश्विक तापन, प्रदूषण(जल, वायु, भूमि) बाढ़ और सूखे जैसी कई घातक समस्याओं से सामना करना पड़ रहा है। विभिन्न प्रकार कि शारीरिक मानसिक बीमारियों ने जन्म लिया और मानव शरीर के अंदर घर बनाना आरंभ कर दिया। व्यक्ति में उपभोग वाली प्रवृत्ति में अभूतपूर्व वृद्धि हुई जिससे गरीबी अमीरी का अंतर भी बढ़ा। रोजगार भी बढ़े, प्रतिव्यक्ति आय भी बढ़ी लेकिन धीरे-धीरे बचत में कमी आने लगी। व्यक्ति अपनी बचत का एक बड़ा हिस्सा दिखावटी एवं गैरजरूरी वस्तुओं के उपभोग में खर्च करने लगा। समाज का एक बड़ा वर्ग अच्छी सुख सुविधाओ युक्त जीवन जी रहा है वहीं एक बड़ा वर्ग मूलभूत सुविधाओं के लिए भी संघर्ष कर रहा है। बाजारवाद ने एक ओर जीवन स्तर को उन्नत करने में योगदान दिया है। उसके विपरीत अति शहरीकरण के कारण आवास, जल और झुग्गियों की समस्याएं भी उठ खड़ी हुई है इनके मूल में अच्छी स्वास्थ्य सेवाओं में विस्तार से जनसंख्या वृद्धि और बेरोजगारी (ग्रामीण एवं शहरी दोनो) प्रमुख रूप से शामिल है।
बाजारवाद के कारण प्रत्येक वस्तु के उपभोग करने को जो बढ़ावा मिला उसके कारण की सामाजिक समस्याओं का भी उदय हुआ। व्यक्ति में उपभोगवादी प्रवृत्तियां उसे कहीं ना कहीं स्वार्थी जरूर बनाने लगती है। व्यक्ति में उत्पन्न स्वार्थ कई प्रकार की कुरीतियों को आवश्यक रूप से बढ़ावा देने लगता हैं। अत्यधिक स्वार्थ से समाज में चोरी, डकैती, लूट-खसोट, भ्रष्टाचार जैसी विकृत प्रवृत्तियां बढ़ने लगती है। इस प्रकार कि विकृतियों से संभव है कि समाज में अपराध वृहद स्तर पर होगें जो किसी भी सभ्य समाज के लिए तो अच्छे संकेत बिल्कुल नहीं है। मानव समाज ने विकास इसीलिए किया कि वह सभ्य, उन्नत और सुख सुविधाओं युक्त जीवन जी सकें, समाज में अच्छे आदर्श स्थापित कर सकें। बाजारवाद के कारण व्यक्तिगत संबंधों में अपनापन भाईचारा और सहयोग की भावना कम ही रह गई है। पारिवारिक संबंधों में व्यक्तिगत स्वार्थों ने पुरानी स्थापित सामाजिक परंपराओं को ध्वस्त करने का कार्य बखूबी किया है। आज समाज में अनाथालय, बालसुधार गृह एवं वृद्धाश्रमों कि संख्या में जो वृद्धि हो रही है वह सामाजिक परंपराओं के पतन को इंगित करती है। हमारा स्वार्थी और सुसुप्त समाज आज इन अनैतिक परिवर्तनों को मौन स्वीकृति दे चुका है। संयुक्त परिवारों की संख्या में कमी और एकल परिवारों में जो वृद्धि देखी जा रही है वह सामाजिक बिखराव का स्पष्ट संकेत है।
आज के आधुनिक मनुष्य के पास समस्त सुख सुविधाओं की वस्तुएं होने के बावजूद वह एकाकी जीवन जी रहा है। मोबाइल, टेलीफोन, इंटरनेट, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों जैसे कृत्रिम संसाधनो का उपयोग तो मानव को मानव से जोड़ने के लिए किया गया किंतु दुख की बात यह है कि मानव में जुड़ाव के बजाय अलगाव और बढ़ने लगा है। आज का व्यक्ति अपनेआप में व्यस्त हैं, दूसरी बातों के लिए समय भी नही हैं। बाजारवाद और आधुनिकता कि आड़ में समाज में खुलापन बढ़ता जा रहा है। जिसका परिणाम यह हुआ कि स्त्रियों के कपड़े दिनों दिन छोटे होते जा रहे हैं। यही नंगापन आजकल बलात्कार जैसे अपराधो को बढ़ावा दे रहा है। व्यक्ति कि सांस्कृतिक सहभागिता में भी तेजी से कमी आ रही हैं। उपभोगवादी प्रवृत्तियों के चलते, व्यक्ति अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए स्वार्थी, धन-लोलुप भीड़ का हिस्सा मात्र बनकर रह गया है। धन और सुख सुविधाओं के चक्कर में व्यक्ति का नैतिक पतन किसी शेयर बाजार में गिरावट कि तुलना में कहीं अधिक तेजी से हो रहा है। अब आखिर में सवाल उठता है कि हम अपने समाज और आगामी पीढ़ियों को क्या देना चाहेंगे? एकल परिवार, एकाकी जीवन, सामाजिक कृत्रिमता या सर्वोपरि स्वार्थ? क्यों न अच्छी आस में सच्चे मन से सामूहिक प्रयास करें और एक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गुणो से युक्त समाज का पुनरुद्धार करके उसे नवजीवन प्रदान कर आधुनिक और पारंपरिक दोनो में सामंजस्य स्थापित किया जाए।
जय भारत!
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