सत्य मीठा होता है
कौन कहता है सत्य कड़वा होता है? सत्य ना तो करेले का हलवा है ना नीम का काढ़ा जो कड़वा लगेगा । अगर सत्य कड़वा होता है तो क्या झूठ मीठा होता है? अगर झूठ मीठा है तो फिर गन्ना, गुड़ और शक्कर का क्या? बेचारी मधुमक्खियों की तो मेहनत ही बेकार गई। और अगर झूठ मीठा होता है तो चाय वाले ने 2014 में चाय में क्या पिलाया जो अबतक किसी को कड़वापन महसूस ही नही हो रहा है? वैसे भी हम बापू थोड़े ही है जो सत्य के प्रयोग करेंगे। भाई हम तो झूठलर हैं, जी भर के झूठ बोलेंगे और झूठ की झूठी मिठास में सबको डूबोएंगे। आज जो जितना झूठ के साथ है उतना दौलत, शोहरत, कुर्सी सब कुछ पा रहा है। सच बोलने वाला तो बेचारा कहीं गुलामी कर रहा होता है या सड़को पर ख़ाक छान रहा होता है। हम तो झूठ का भरपूर उपयोग करते है। सुबह उठते ही झूठ से शुरुआत होती है जो रात में सोने तक बदस्तूर जारी रहता है। झूठ के भी कुछ सिद्धान्त है। पहला, झूठ बोलने का साहस रखना। दूसरा, पूरी सच्चाई से झूठ बोलना। तीसरा, कितना भी झूठ बोलो लेकिन दिखावा सच का ही करना, चाहे कनपटी पर तमंचा ही अड़ा रखा हो। चौथा, बोले हुए सारे झूठ की सूची कंठस्थ रखना, इत्यादि।
युग बदल चुके है। एक युग सतयुग था, आज का युग, झूठलरयुग है। झूठ ही सच्चाई है, सत्य तो दिखावा भर है। आज अगर झूठ डायनासोर है तो सत्य एक दबी कुचली सी छिपकली। किसी ने कहा है सत्य कि अंत में जीत होती है। क्यों भाई सत्य क्या लाइन की आख़िरी में खड़ा रहता हैं क्या? सत्य के लिए लड़ने वाला अगर खुद दुनिया से निपट ले तो फिर काहे की जीत? पता नही क्यूं सत्य पाषाण सा कठोर और झूठ रेशम सा मखमली प्रतीत होता है। आप हजारों झूठ बोल जाओ बोलने में कभी भी जुबान नहीं लड़खड़ाएगी, जबकि सत्य बोलने में डर लगता है। अगर मेरी बात पर यकीन ना हो तो थोड़ा घर से बाहर निकलो और देखो किन के कपड़े एकदम सफेदी लिए हुए है, और किसके मटमैले? फिर भी यकीन ना हो तो किसी संसद भवन या विधानसभा भवन से घूम आओ पता चल ही जाएगा। हमसे तो जिन जिन लोगों ने कहा कि हमेशा सच का साथ देना, पता चला वें तो सबसे बड़े झूठे निकले। हमारे यहां तो सार्वजनिक रूप से झूठ को गोद लिया जा चुका है। इसी का विकसित अपभ्रंशीय स्वरूप गोदी मीडिया है। टीवी चैनल वाले भी तरह तरह के झूठ नामों जैसे सामना सच का, सत्य की खोज, सच पर पैनी नज़र, गारंटी सच की, जैसे झूठे कार्यक्रम दिखाते हुए हमारे जैसी जनता को मूर्ख बनाते हैं। ये लोग दिन भर अपने अपने चैंनल पर बकबक करेंगे लेकिन सत्य को सामने नहीं आने देंगे और झूठ पर दिन रात पॉलिश करके चमकाते रहते है।
हमसे अगर कोई पूछता है कि आप किसके साथ हो तो हम अपनी जेब से टेप निकाल कर छप्पन इंच सीना नपवाकर कहते है, सत्य के साथ है क्योंकि पिछे वाले रास्ते हमें झूठ का साथ देने से कौन रोक सकेगा? कौन है जो हमें झूठलर गैंग में शामिल होने से मना करेगा? किसी में दम हो तो हमारे चुपके से दल बदलने पर सवालिया निशान लगाए। झूठ का सहारा लेकर आप दुनिया घूम कर आ सकते हो लेकिन सत्य बोल कर किसी कि मजाल है जो घर से बाहर भी निकल पाए। राजनीति वाले तो अपने झूठ बोलने कि कला को शराफत भरा नाम "जुमला" कहते है। अगर किसी नेताजी से कहो के आपने चुनाव के वक्त फलां फलां वादा किया था तो वो साफ मुकर जाते है, कहते है वो तो बस चुनावी जुमला था। सत्य के साथ तो आप गांव के पंच भी नही बन सकते। मुखिया बनने के लिए न जाने कितनी सत्य की कब्रें खोदनी पड़ती होगी। ना जाने कितने ही जुमलेबाज चेलों कि गैंग रखनी पड़ती होगी। अब तो जुमलेबाज़ लेखकों कवियों को बेरोजगारी का डर नहीं रहा। कहीं न कहीं जुमला भजन, जुमले नारे, जुमले भाषण इत्यादि लिखने का काम मिल ही जाता हैं। जनता के बीच अगर कोई नेता सत्य के साथ पहुंच भी गया तो, बेचारे को अपनी इज्जत से हाथ धोना ही पड़ेगा।
हम लोग भी दैनिक जीवन में झूठे होकर रह गए हैं। आज के नए-नए प्रेमी अपनी प्रेमिकाओं से चांद तारे तोड़कर ले आने का वादा कर आते है। प्रेमिकाएं भी बहुत जागरूक हो चुकी हैं। सीधा चांद तारे वाले शॉपिंग मॉल लेकर जाती है और दस बीस हजार कि खरीददारी करवा कर ले आती है। ऐसे ही जुमलो कि फांस में बेचारे कई पति भी फंस जाते है। मां बाप भी अपने बच्चो के साथ झूठ की जुगलबंदी कर ही लेते हैं। अब एक समय वह भी आएगा जब विश्वगुरु, विश्व को जुमलामयी झूठ का हुनर, ज्ञान और प्रशिक्षण भी देगा। हमारे समाज में सत्य को बीमारी की तरह देखा जाने लगा है। हमारे लीवर में सत्य को पचाने कि क्षमता लगभग खत्म हो चुकी है। हम लोग चाहते है कि सत्य हमारा साथ दे, लेकिन हम कभी सत्य का साथ नही देना चाहते। तो कुल मिलाकर बात ये है कि झूठ बहुत सीधा, सरल और आसानी से अपनाया जा सकने वाला असीम संसाधन है। रही बात सत्य के कड़वा होने की, तो ऐसा है कि बस बात कहने का अंदाज मीठा या कड़वा होता है सत्य तो सत्य होता है। इसलिये सत्य कड़वा नही मीठा होता है जो कहने वाले और सुनने वाले दोनो को मिठास का अनुभव ही कराएगा, हां इसमें थोड़ा समय जरूर लगता हैं।
जय भारत!
Kya bat h bahut badiya likhte ho aap👏👏👏
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