दूर की सोचों, आज तो बर्बाद है......
किसी भी एक वित्तीय वर्ष का सम्पूर्ण लेनदेन "बजट" कहलाता हैं। लेकिन अर्थतंत्री जी का कहना है कि यह तो अमृतकाल का बजट है। हम, आम और खास सभी बजट को उम्मीद की नजरो से ही देखते हैं। और देखे भी क्यों न? यह हमारी जेब और जेब के भविष्य पर असर जो डालने वाला होता है। जेब अगर खाली हो तो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना हुए फिरने के अलावा कर क्या सकता है। जेब में खाने खुजाने और खर्च खैरात लायक पैसा होना बहुत जरूरी है। तभी तो विकास किया जा सकता है वरना खाली पेट और खाली जेब आदमी को कहीं का नही छोड़ती। ख़ैर, जो सरकार आम आदमी का तेल निकालने पर अमादा हो वह बजट के माध्यम से भी तेल निकालने का ही काम करेगी। ऐसा ही कुछ इस साल के बजट में भी देखने को मिलता है।
अगर आप वर्तमान में ज्यादा कुछ करने का दम ना रखते हो या इस प्रकार की कोई इच्छाशक्ति न रखते हो तो लोगो को भविष्य के सपने दिखाओ। वैसे भी हम भारतीय लोगो में आशावाद का ठीकठाक स्तर है। हम सभी ने एक डायलॉग तो कहीं न कहीं जरूर सुना होगा "देख लूंगा" लेकिन कोई देखता नही। वैसे ही इस बजट में भी आगामी 25 वर्षों के विजन की बात कही है। क्या इस विजन को देखने के लिए अर्थतंत्री और मुखिया जी या आप हम तबतक कुछ देखने लायक रहेंगे भी या नहीं? मुखिया जी ने तो जुमलेबाजी में पीएचडी कर रखी है। मौजूदा वर्ष में कई सवाल उनका पीछा कर रहे हैं। क्या किसानों की आय दुगुनी हुई? क्या दो करोड़ रोजगार सालाना दिए गए? क्या महंगाई दर कम हुई? क्या पेट्रोल डीजल सस्ते हुए? फ्री वाईफाई और सस्ते इंटरनेट से कितने रोजगार पैदा हुए?सरकारी विभागों में खाली पद कब भरे जायेंगे? भ्रष्टाचार पर लगाम कब तक लगेगी? अगर इन सभी सवालों का उत्तर अगर ना में है तो यह नाकामी भी जवाबदारो की ही है। इनसे पुराना भारत ही संभल नहीं रहा और नए भारत बनाने का दावा ठोकने लगे। एक वर्ष की प्लानिंग नहीं और पच्चीस वर्षों का विजन देना। अगर इतने लंबे चौड़े विजन देना ही था तो योजना आयोग को क्यों खत्म किया? क्यों पंचवर्षीय योजनाओं को बंद कर दिया?
अगर अर्थव्यवस्था मांग में कमी से जूझ रही है तो इसका एक मतलब यह भी है कि प्रतिव्यक्ति आय में कमी आई है। थोक और खुदरा महंगाई अपने उच्चतम स्तर पर है। व्यक्ति कि क्रयशक्ति क्षमता कमजोर हुई है। किसानों कि फसलों की निगरानी ड्रोन से किए जाने का वादा है। क्या अस्सी प्रतिशत जो छोटे किसान है ड्रोन का इस्तेमाल भी कर पायेंगे? अरे भाई अगर ड्रोन से निगरानी करनी ही है तो सीमाओं पर दुश्मन पर नजर रखने के लिए कर लो। अभी किसान तो महंगे डीज़ल, महंगे उर्वरक और दवाइयों से निपटने में लगा है। उर्वरक सब्सिडी में कटौती का तोहफा जो मिला है उम्मीद के मुताबिक है। रोजगार के नाम पर मनरेगा के बजट में कटौती किस खुशी में की, पता नहीं। कोरोनाकाल में स्वास्थ्य पर बजट में कटौती करना भी समझदारी भरा कदम कतई नहीं हो सकता। गंगा सफाई, स्मार्ट सिटी का बजट साफ। महंगाई, बेरोजगारी मध्यम वर्ग, वेतनभोगी कर्मचारी वर्ग को तत्कालिक राहत ना मिलना भी बड़ा मुद्दा है। कल्याणकारी राज्य में सभी वर्गो के कल्याण का विशेष ध्यान रखना चाहिए था। सरकार ने बजट के माध्यम से लगता है कि मध्यम वर्ग से रिश्ता ही तोड़ लिया है। हां, इस बार विनिवेश का लक्ष्य जरूर कम किया गया है, लेकिन राजकोषीय घाटे में भी बढ़ोतरी है।
किसी भी बजट में दूरगामी लक्ष्यों को शामिल करना भी अत्यंत आवश्यक है, ऐसा करना भी चाहिए। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में जब आम जनता उच्चतम महंगाई बेरोजगारी जैसी भीषण समस्यों से जूझ रही हो तब फौरी राहत मिलना बहुत ही जरूरी है अन्यथा देश कि एक बहुत बड़ी आबादी का बेड़ा गर्क करने के बाद विकास का विज़न किसी काम नहीं रह जाएगा। बजट में क्रिप्टो करेंसी पर तीस फीसद कर, पहाड़ी राज्यों के विकास के लिए पर्वतमाला योजना, बैटरी स्वैपिंग पॉलिसी पर व्यय, रक्षा क्षेत्र पर व्यय में 10% वृद्धि, केन बेतवा प्रोजेक्ट की शुरुआत, 25 हजार किलोमीटर के राजमार्गों के निर्माण का प्रावधान के साथ-साथ डिजिटलीकरण पर जोर जैसे कई महत्त्वाकांक्षी और अच्छे लक्ष्य जरूर है। लेकिन फिर भी प्रश्न यह है कि अमृतकाल के इस बजट में महंगाई, बेरोजगारी, भूखमरी का जहर कौन पिएगा? मध्यम वर्ग की पंचर गाड़ी को धक्का कौन लगाएगा? यह तो वक्त ही बताएगा। बाकी तो सोचना क्या जो भी होगा देखा जाएगा..
जय भारत!
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