आस्था बनाम कट्टरता

हमारा आचरण, हमारे समाज, धर्म, आस्था, शिक्षा और संस्कृति से जुड़ा हुआ होता है। हर व्यक्ति या समुदाय की किसी न किसी धर्म विशेष के प्रति आस्था होती है और कई लोगो किसी भी धर्म में आस्था नहीं भी हो सकती है। हालांकि व्यक्ति की आस्तिक और नास्तिक होना दो स्थितियां हैं। यथासंभव हम सब में धर्मपरायणता के तत्व बना रहना चाहिए। कितना अच्छा हो कि हम धर्म के गूढ़ ज्ञान को प्राप्त करके जीवन को श्रेष्ठ बनाने हेतु उसका लाभ लें। लेकिन हम धर्म के बजाय धार्मिक आचरण के नाम पर होने वाले दिखावे या आडंबरों पर अधिक जोर देने लगते है। विभिन्न प्रकार के चिन्हों जैसे दाढ़ी मूंछ बाल या विशेष पहनावे के माध्यम से खुद के धार्मिक होने या किसी धर्म विशेष के होने के प्रमाण को पुख्ता करते है। हालांकि धर्म क्या है? या धर्म का प्रयोजन क्या है? या लोगो को धार्मिक क्यों होना चाहिए? इन सब सवालों  के उत्तर शायद कुछेक लोगो के पास ही होंगे। लेकिन क्या हमारे इस प्रकार के आचरण से हमे किसी भी तरह शारीरिक या मानसिक संतोष मिलता है? क्या हम अपने धार्मिक आचरणों से भौतिक या आध्यात्मिक श्रेष्ठता को प्राप्त हो रहे हैं? या हम खुद पर धार्मिकता का दबाव डाले हुए कहीं दिखावा मात्र तो नही कर रहे है। क्या हम सचमुच धार्मिक बचे है? जितनी हमारे धर्मो में व्यवस्थाएं दी गई है उनका कितना पालन करते हैं? अधिकांशतः तो हम धार्मिक होने दिखावा करते फिरते है जो अपने आपमें अधर्म है। 
            वर्तमान विश्व में मुनष्य के गलत आचरणों और दूषित कट्टर भावनाओं के चलते धर्म के नाम पर टकराव उत्पन्न होते रहते है। हमारा अपने-अपने धर्म में विश्वास करने के पीछे हमारे पारिवारिक परिवेश या माता पिता के संस्कारों से या स्वयं किसी धर्म विशेष को चुनना, शामिल होता है। इसके अलावा व्यक्ति में कर्मो के फल का अच्छा या बुरा होने का भय भी ईश्वर के साथ-साथ धर्म में आस्था को बनाएं रखता है। आडंबर करने बावजूद भी व्यक्ति का कहीं न कहीं धर्म में आस्था और ईश्वर के प्रति झुकाव बना रहता है। लेकिन कई सारे मामलों में किसी धर्म विशेष के प्रति निष्ठा में बलपूर्वक या छलपूर्वक परिवर्तन किए जाने का कार्य जोर शोर से किया जा रहा है जो कि अधार्मिक कृत्य है। देखने में आता है कि कई धार्मिक एजेंट अति सामान्य लोगो के दुख, गरीबी, अशिक्षा, शारीरिक व्याधि से परेशान लोगो को लालच देकर छलने में सक्रिय रूप से लगे होते है। वैसे तो किसी भी धर्म को बढ़ाने में सिर्फ जनसंख्या का होना ही जरूरी नहीं है बल्कि अच्छे मस्तिष्क वाले लोगो का होना ज्यादा जरूरी है। जब सभी धर्म या समुदाय आराम से, आसानी से फलफूल रहे हैं तो धर्म परिवर्तन कराने कि क्या जरूरत है। अगर आपको किसी की मदद करने की इच्छा है तो यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन मदद के बदले किसी का धर्म बदले ये तो आपके दूषित और दुष्ट होने की निशानी तो है। लोगो को यह बात समझनी चाहिए कि धर्म बदलने से स्थिति में सुधार नही होगा बल्कि परिश्रम और अच्छे कर्म करने से सही सकारात्मक परिणाम प्राप्त होंगे। कई मूर्ख ऐसे भी होते हैं जो लालच और अज्ञानता के चलते अपना भगवान बदल लेते हैं। एक बात तो तय है कि अगर व्यक्ति के जीवन में सुख समृद्धि और सफलता अपने आप आते रहे तो वह इन सबका श्रेय स्वयं को देता है। लेकिन हालात प्रतिकूल होते है और दुख से सामना होने लगे तो वह ईश्वर या धर्म की ओर देखने लगता है। वैसे भी देखा जाए तो यह समस्या धर्म की नही बल्कि कर्म की है।
         हमारे यहां कुछ जुमले हमेशा से ही चलते आए है कि फलां फलां कार्य या तौर तरीको के पालन करने का आदेश हमारे ईश्वर ने दिया है। लेकिन धर्म के नाम पर एक दूसरे के गले काटने का आदेश किस धर्म के ईश्वर ने दिया यह कोई भी बताने को तैयार नहीं है। अगर समाज में कुछ सकारात्मक परिवर्तनों की आवश्यकता है तो हमने उन परिवर्तनों का स्वागत करना चाहिए ना कि विरोध। ऐसे समय हम बेमतलब की घिसी पिटी रूढ़ियों को सामने ले कर क्यों आ जाते है? अगर समाज में कई रूढ़ियां है भी तो वे प्राचीन समय की जरूरतें रही होगी लेकिन वर्तमान समय में उनका बोझ उठाए रखना बेतुका ही होगा। लोगो में बदलाव के नाम पर "धर्मो में डर का अचानक पैदा हो जाना" भी आज की युगांतर घटना बनने लगी है। जैसे ही कुछ छोटे मोटे बदलाव की बात हो या समाज में थोड़े बहुत राजनीतिक बदलाव की बात होने लगे तो अचानक धर्म खतरे में पड़ने लग जाते है। अरे भाई ये धर्म है या खतरे की घंटी जो कभी भी टनटनाने लग जाती है। धर्म पर खतरे को भांपते ही हमारी मानवता के ग्राफ में अचानक गिरावट आने लगती है, और हम धर्म के दोराहे से अधर्म के चौराहे पर आकर खड़े हो जाते हैं। फिर हमारे धर्मो कि सभी अच्छी शिक्षाएं कहां घास चरने निकल जाती है पता ही नहीं चलता। अगर धर्म के नाम पर सारे कुकर्म ही करने है फिर अधर्म क्या है? मानवता, भाईचारे को जब नफरत के अंधे और गंदे जूतों तले रौंदना ही है तो धर्म के नाम का इस्तेमाल क्यों किया जाता है? इससे तो यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हम धर्म का पालन करने या उसे अपनाने में अपनी अपनी सहूलियतें ढूंढते हैं, वरना हमारा धार्मिक आचरण में दिखावे के अलावा कुछ भी नया नहीं कर रहे है।
        कोई भी धर्म हमारी आस्थाओं, मान्यताओं और व्यवहार में सकारात्मक परिणाम लाने का विषय होना चाहिए। सामान्य परिस्थितियों में हम सभी अपनी-अपनी आस्था के अनुसार अपने धर्म को मानते है। सभी लोग धर्म, जाति इत्यादि को एक तरफ छोड़ अपने-अपने दैनिक आर्थिक सामाजिक कार्यों और उद्यमों में मिलजुल कर व्यस्त रहते है। यह स्वस्थ और समावेशी समाज ले लिए अच्छा है कि सभी मिलजुल कर भाईचारे को बनाए रखे। लेकिन जब कहीं आडंबर से आडंबर का सामना होता है समाज में टकराव की स्थिति पैदा होती है। जैसे ही कहीं कोई छोटी मोटी घटना हो जाए तो हमारे अधर्म का ज्वालामुखी फटने लगता है यह तो गलत है ना? हमें चाहिए कि हम सारे धर्मो का सम्मान करे और सभी धर्मों से अच्छे तत्वों को ग्रहण कर शांति से रहें। 
            किसी भी धर्म की जड़े ऐतिहासिक रूप से बहुत गहरी होती है तो उन्हें उखाड़ना किसी के बस कि बात नहीं है। इसीलिए अगर कोई व्यक्ति  या समाज धर्मसंकट में है तो उसका निदान किया जा सकता है। लेकिन धर्म ही तथाकथित रूप से संकट में हो तो उसका निदान मुश्किल कार्य होगा। धर्म का उद्देश्य तो यही है कि मनुष्य अपना पशुत्व त्याग कर सामाजिक, धार्मिक और सुव्यवस्थित, सुनियोजित तरीके से अच्छा जीवन यापन करे। अपने दिल दिमाग में घृणित ईर्ष्या लेकर अपने धर्म को दूसरे धर्म से बड़ा दिखाने कि कोशिश करना मूर्खता से कम नहीं है। दुनिया का कोई भी धर्म हमें आपस लड़ना मरना नहीं सिखाता। अगर इसके बावजूद भी हमें जंगली ही बने रहना है तो कम से कम किसी धर्म या  ईश्वर के पवित्र नाम का इस्तेमाल अपने कुकर्मों को सही साबित करने के लिए कुतर्क तो न करे। धर्म की सफेद चादर में अधर्म की कालिख ज्यादा दिनों तक नहीं छिपाई जा सकती यह बात सभी को समझनी चाहिए।
                         जय भारत!

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