छह घंटो का मालिक
मैं अक्सर सुबह और शाम के समय जब लोगो को गलियों और सड़को पर अपने अपने कुत्तों को टहलाते हुए जब देखता था। सोचता था कि वे लोग कुत्ते को टहला रहे है या कुत्ते उनको। ख़ैर सवाल भी वाजिब ही था और खुद से ही था तो कुछ खास फर्क भी नही पड़ने वाला था। लेकिन मुझे क्या पता था कि एकदिन मुझे भी कुत्ता संभालना पड़ेगा। हमारे घर में तो देसी कुत्ते पालने का चलन है। बेचारे बिना किसी ज्यादा परवरिस के खुद ही पल जाते है। लेकिन संकर नस्ल के कुत्तों की तो बात ही कुछ और है। एकदम साफ सुथरे आज्ञाकारी, अच्छे प्रशिक्षित, उनके अलग अलग नाम, अलग रौब, उनकी अलग से दिखाई देने वाली अमीरी। गांव में तो एक सीटी बजाओ मुहल्ले के सारे कुत्ते लार टपकाते हुए अगल बगल आकर खड़े हो जाते है। फिर चाहे किसी को भी बुलाया हो। हालांकि मुझे तो बाल्यकाल से ही पालतू पशुओं से लगाव रहा है।
आज अचानक एक निर्देशात्मक फोन कॉल आया कहा गया की भाई तुम्हे आज जबलपुर जाना है, एक बच्चा डॉगी को ले के। मैंने भी जबलपुर में पांच साल से अधिक समय बिताया था और काफी दोस्त बन चुके थे तो उन्हीं से मिलने के लालच और पुरानी यादें ताजा करने के चक्कर में हां कर दी। वैसे भी काम के मामले में मैं व्यक्तिगत रूप से प्रशासन से नाराजगी मोल नहीं लेना चाहता। तो फोन कॉल से पूर्ण वार्ता होने के बाद तय समय और तय जगह पर मुझे बच्चा डॉगी सौंपा गया। ट्रेन में किसी भी पालतू जानवर को ले जाना वर्जित होने के बावजूद भी मैने अपने एक नए मित्र की सहायता से बच्चा डॉगी को बिठा ही लिया। हालांकि संकर नस्ल के कुत्तों के मिजाज के बारे में मुझे कुछ भी जानकारी नहीं थी, क्या पता कब गुस्सा आ जाए, या किसी अन्य यात्री को कांट ले या जोर से भौंकने लगे।आखिर तमाम संदेहो के बावजूद भी मैं बच्चा डॉगी को साथ में लेकर ट्रेन में साथ साथ सफर करने लगे। धीरे-धीरे मेरा संदेह और सफर का फासला कम होने लगा। बच्चा डॉगी ने भी शुरू शुरू में आक्रोश दिखाया लेकिन थोड़ी देर बाद शांति से बड़े आराम से बैठ गया। देसी कुत्ते तो इतनी देर में आसपास के चार गांव में दादागिरी, दोस्ती-यारी, मारा-पीटी सब कुछ करके घर वापस लौट आते। लेकिन ये बच्चा डॉगी बेचारा अपने अभूतपूर्व संयम और मासूमियत के साथ बैठा रहा।
सफर से पहले ही मुझे बच्चा डॉगी किसे सौपना है यह सब जानकारी भेज दी गई थी सो मैंने भी इटारसी स्टेशन से ट्रेन निकलने के बाद जबलपुर में बच्चा डॉगी के होने वाले मालिक को फोन कॉल कर अपने आने की और जिस ट्रेन में बैठा था उसकी जानकारी दी, उन्होंने ने भी जबलपुर स्टेशन पहुंचने से पहले सुचित करने को कहा, मैं भी हां कहा। थोड़ी देर बाद बच्चा डॉगी के श्रीमान पुराने मालिक जी के द्वारा फोन कॉल से उसका हालचाल पूछा गया मैंने भी बच्चा डॉगी कि खैरियत दी। इतने सफर में मुझे भी बच्चा डॉगी अच्छा लगने लगा, उसकी मासूमियत और अच्छा व्यवहार ने मेरे हृदय में उसके लिए अचानक प्यार पैदा कर दिया। मानव सभ्यता कि शुरुआत से ही मानव का कई जानवरो से लगाव रहा है। कुत्ता, घोड़ा और गाय को मानव ने शुरुआती दौर में पालतू बनाया था जो अबकतक बदस्तूर जारी है। कइयों रोचक कहानियां हैं जिनसे हमें यह पता चलता है कि कैसे पशुओं ने मानव कि आश्चर्यजनक रूप से सहायता की है। यह भी पशुओं का मानव के प्रति प्रेम और विश्वास को दर्शाता है। बच्चा डॉगी ने भी मेरी गंध को अपनी नाक में समा लिया था वह मुझसे चिपक कर अपनी आंखे बंद किए बैठा रहा, मैं भी उसे दुलारता रहा।बहुत ही मार्मिक दृश्य था।
खैर अब थोड़ी देर बाद जबलपुर पहुंचने ही वाले थे।मुझे मन ही मन बच्चा डॉगी से बिछड़ने का अहसास होने लगा था। एक तरफ दोस्तो से मिलने कि खुशी वहीं दूसरी तरफ बच्चा डॉगी से बिछड़ने का भी दुख था, भले ही अल्पकालिक दुख था। जैसे ही जबलपुर स्टेशन आया, स्टेशन के बाहर आए और बाहर ही बच्चा डॉगी के नए मालिक इंतजार करते हुए खड़े थे, उनसे फोन कॉल से जगह पता की जहां वे खड़े थे। वहीं जा कर उन्हे बच्चा डॉगी सौंपा। उसे उनकी कार में सवार किया और अलविदा कहा और मैं भी अपने दोस्त के साथ उसके निवास की ओर चल पड़ा। बच्चा डॉगी के नए मालिक ने इस काम के लिए मुझे कुछ रूपयो का इनाम भी दिया। इस तरह पूरे सफर में लगभग छह घंटो के लिए मैं बच्चा डॉगी का मालिक था।
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