हम "कड़े शब्दों में निंदा" करते हैं

आज तक यह समझ नही आया कि लोग कड़े शब्दो में ही निंदा क्यों करते हैं। इसके पीछे के निहित स्वार्थ क्या है? कटु शब्दों में भी निंदा होनी चाहिए। अच्छे कामों की तारीफ हो या ना हो लेकिन गलत कार्यों का विरोध जरूर होना चाहिए। विरोध करने के कुछ पारंपरिक तरीके और कुछ नए तरीके हैं जैसे- नारेबाजी चक्काजाम, धरना प्रदर्शन, ट्वीट, फेसबुक-इंस्टाग्राम पोस्ट या यूट्यूब पर वीडियो संदेशों और समाचार पत्रों के द्वारा या कड़े शब्दो मे निंदा करके। जब भी किसी व्यक्ति या व्यक्ति के समूहों द्वारा कोई भी अनैतिक या घृणित कार्य किया जाता हैं अथवा कोई भी अप्रिय, अमानवीय घटना घटती हैं तब हम उसमे कुछ भी न कर सकने कि स्थिति में हो तो क्या करना चाहिए? इसके अलावा ऐसे मामलो से हम दूर भी रहे और दूर भी न दिखे इसके लिए मध्यम मार्ग क्या होना चाहिए? ऐसे में दो सबसे आसान रास्तें है एक, कड़े शब्दों में निंदा करना, दूसरा सांत्वना देना। आप "कड़े शब्दों में निंदा" कर के अपने व्यक्तिगत और सामाजिक दायित्व से पीछा छुड़ाकर राहत की सांस लेते हुए दोस्तो के साथ बैठ टुन्न पार्टी कर सकते हो। 
       कड़े शब्दो में निंदा करना तो गाली-गलौज करने जैसी असभ्य आचरण का, सभ्य रूपांतरण है। कड़े शब्दों में कौन कौनसे कड़े शब्द शामिल होने चाहिए, यह शोध का विषय अवश्य होना चाहिए। आप और हम किसी कि कड़े शब्दो में निंदा कर के गाली देने वाले कुकृत्य से बच सकते है। वैसे तो कड़े शब्दों में न तो कुछ कड़ा होता है और ना ही कुछ कड़वा होता है। बुरा भी कह दो और बुरा भी न लगे यही कड़े शब्दो में निंदा की महिमा है। राजनैतिक दलों के भैया लोगो से इस मामले में हमें बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। जब भी किसी पार्टी के लोगो के द्वारा कहीं भी किसी प्रकार कि गुंडागिरी, बदजुबानी या गलत आचरण करने कि खबर मिलती है। या इसके अलावा जनता के दुर्व्यवहार वायरल होते है तो ये बड़े भैया लोग उन तमाम गलत बातों कि कड़े शब्दों में निंदा करते हुए उन सारे पापो को कड़ी निंदा के गंगाजल में डूबाकर पवित्र कर देते है। वैसे नेतागिरी में कड़े शब्दों में निंदा करना बायपास सर्जरी करने जैसा है, किसी भी स्थिति में गले कि फांस गले में ना फंसे और जान बचे बस। "कड़े शब्दों में निंदा" और निंदा करने में कुछ अंतर और कुछ समानता दोनो है। निंदा, खुद के टाइमपास करने के लिए और जलन कुढ़न को भभकाने के लिए की जाती है। जबकि कड़े शब्दो में निंदा सारे भभकते सवालों को ठंडा करने के लिए ग्लेशियर के रूप में किया जाता है। किसी की निंदा करके हम उसका दो रूपयो का भी नुकसान नहीं कर सकते जबकि कड़े शब्दो में निंदा करके लाखो रुपए नुकसान और सामाजिक ह्रास दोनो होने से बचा जा सकता है। निंदा का स्वरूप छोटा होता है जबकि कड़े शब्दो में निंदा का स्वरूप छोटे से लेकर वैश्विक भी हो सकता है। "कड़े शब्दों में निंदा" और निंदा दोनो असहाय भाव से की जाती है, यही इनमे एक मोटी सी समानता भी है।
    सार्वजनिक जीवन में अगर किसी घटना कि कड़े शब्दों में निंदा करते है तो आप उसके विरोध में हो अन्यथा आप किसी गलत घटना के समर्थन में हो यह अपने आप मान लिया जाता है। कड़े शब्दों में निंदा करने का एक विश्व रिकॉर्ड यह भी है कि इससे आज तक किसी का एक बाल भी नही उखाड़ा जा सका है। हालांकि मौजूदा परिदृश्यों में रूस यूक्रेन युद्ध के दौरान भी कड़े शब्दो में निंदा और युद्ध विराम के साथ शांति की अपील की गई। इस मामले में भी हम दोनो देशों से दोस्ती बनाए रखना चाहते है तो कड़े शब्दो में निंदा के अलावा कोई और बेहतर विकल्प नहीं है। वैसे भी दो लोगो के झगड़े में तीसरा क्यूं दुश्मनी मोल ले। लेकिन युद्ध से मानवता को बचाने के लिए हम भी कड़े और देशी खड़े शब्दो में युद्ध की निंदा करते हैं।
    घरेलू और वैश्विक स्तर पर भी कड़े शब्दों के दायरे में विस्तार होना अत्यंत आवश्यक है। कड़े शब्दों में कुछ आवश्यक और महत्वपूर्ण कड़वे शब्दो की शब्दमाला का जोड़ा जाना ज़रूरी है, जिससे कड़े शब्दों में कुछ कड़ा वजन पैदा हो। अंत में रही बात हमारी, हम तो झूठे वादे करने वालों, बकवास बातों का जबरन प्रोपेगेंडा बनाने वालो, अपने दायित्वों के सफल निर्वहन न कर पाने वालों, धार्मिक सौहार्द बिगाड़ने वालों, सड़क और समाज में कचरा फैलाने वालों, किसी गलत माप तौल के शिकार मासूम व्यक्ति को तारीफों के पहाड़ में दबाने वाले लोगो, ताली-थाली और दीए से कोरोना भगाने वालो, अपनी जीभ इस्तेमाल खाने का स्वाद लेने के बजाय तलवे चाटने का कार्य करने वालो, देश विरोधी षडयंत्र कार्य करने वालो और मूर्खो के मसीहा बनने वालो सहित इन सभी की, कड़े शब्दो के सिंहासन पर खड़े होकर, गहरी सांस लेकर, बाहर छोड़कर फिर शांति से बड़े-बड़े और गंदे से कड़े कड़कड़ाते शब्दों में निंदा करते हैं।
                           जय भारत!

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