रिश्तों को सहेजें
हमारे मानवीय समाज में जुड़ाव का सबसे महत्वपूर्ण और मूलभूत तत्व क्या है? यकीनन हमारे अपने अपनों से रिश्ते ही है। अगर रिश्ते न हो तो समाज महज मकानों का जंगल मात्र ही हो सकता है। लेकिन सुसंगठित समाज बिल्कुल नहीं। समाज कि बुनियाद में रिश्ते ना हो ऐसा बिल्कुल भी संभव नहीं है। भारतीय समाज तो वैसे भी कई रिश्ते नातों के ताने बाने में गूंथा हुआ है। यहां पारिवारिक श्रेणीक्रम के साथ-साथ सामाजिक धार्मिक श्रेणीक्रम भी समाज में व्यापक स्तर पर देखने को मिलते है। आज भी इस भयंकर आधुनिकता के बावजूद समाज में रिश्तों का प्रभाव स्वयं को जीवित रख रहा है, यह वाकई बहुत अच्छा लगता है। किसी भी समाज या राष्ट्र की स्वस्थ परंपराएं, उस समाज या राष्ट्र के एकजुट बने रहने में ऊर्जा प्रदान करते हैं। यह भी एक प्रकार का विकासशील रूढ़िवाद है।
किसी भी व्यक्ति को सुख और दुख दोनो ही परिस्थितियों में अपने-अपनो की जरूरत पड़ती है। अगर आप बहुत ज्यादा खुश हो तो आप खुशी किनसे जाहिर करोगे? अगर आप बहुत दुखी हो या दुख के पर्याप्त कारण भी हो तो वैसी स्थिति में भी किसके कंधे पर सिर रखकर रोओगें? दोनो ही स्थिति में जाहिर सी बात है कि हम सबसे पहले अपने घर के सदस्यों माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी, रिश्तेदार, दोस्त या परिचित के साथ ही सुख-दुख साझा करेंगे। ये करीबी लोग हमारे जीवन में न हो तो हम अपना नाम काम, धन दौलत, शोहरत किसे दिखाएंगे? दुख में तो यह संभव है कि व्यक्ति अकेले में आंसू बहाकर शांत हो भी जाए। लेकिन खुशी को जाहिर करने के लिए हमारे अपने करीबियों का होना आवश्यक है वरना हम किसी अनजान व्यक्ति खुशी जाहिर कर भी दे तो उसका क्या तुक निकलेगा। यह बिल्कुल भी संभव नहीं कि किसी व्यक्ति के जीवन में किसी भी प्रकार का उतार-चढ़ाव या अच्छे बुरे दिन देखने को ना मिले। प्रत्येक व्यक्ति के अपने जीवन में प्राकृतिक रूप से अच्छा और बुरा सब कुछ होते रहता है। इन सबके चलते व्यक्ति मानसिक रूप से कहीं न कहीं जरूर परेशान होता है। अगर कोई भावनात्मक कमजोरियों पर नियंत्रण पा ले तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा लेकिन यह सबकुछ सामान्य व्यक्ति से तो बिल्कुल संभव नहीं है।
आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपने ही परिवार रिश्ते और करीबियों से किसी ना किसी प्रकार की आपसी प्रतिस्पर्धा, लालच, घमंड या अपनी नौकरी व्यवसाय के कारण दूरियां बढ़ाने लगे है। हां यह भी सच है कि सबकी अपनी-अपनी जरूरतें और स्वार्थ भी है जरूरतों को पूरा करना भी अपने आप में बहुत बड़ा कार्य होता है। आज की इसी आधुनिकता के कई अभिशाप भी है। ज़मीन जायदाद को लेकर भाई- भाई के बीच विवाद और तनाव। व्यक्ति की व्यक्ति के प्रति घृणा, सामाजिक-पारिवारिक तनाव, भाव शून्यता, अलगाव, संकुचित-घृणित मानसिकता में वृद्धि, मनमुटाव इत्यादि। लेकिन क्या अपनी जरूरतों और स्वार्थ में अंधे होकर हम अपनो का ही गला काट दे या अपनो से ही मुंह फेरें, उनके खिलाफ विद्रोह करें, या ऐसे घृणित अपराधो, षडयंत्रों में शामिल हो जाए, ऐसा तो बिल्कुल नहीं कर सकते। सुलझाने बैठे तो सारे मामले सुलझ सकते है, बशर्ते हम अपने घमंड और स्वार्थ को आड़े ना आने दें।
हमें कहीं न कहीं किसी भी प्रकार से भावनात्मक रिश्तों को सहेजने के मनोभाव को जागृत करना ही पड़ेगा। व्यक्ति में नैतिक मूल्यों को प्रोत्साहित कर सामाजिक दबाव उत्पन्न करने वाले कारकों का पालन पोषण करना ही पड़ेगा। पारिवारिक एवं सामाजिक एकीकरण के बीज बोने ही पड़ेंगे रिश्तों के प्रति आस्था और विश्वास को लेकर सकारात्मक बदलाव लाने ही पड़ेंगे। भाव शून्यता की स्थिति को खत्म करने को लेकर कदम उठाने ही पड़ेंगे। सामाजिक सभागिता को लेकर खुद को और आने वाली पीढ़ी को संस्कारवान बनाने की जिम्मेदारी भी स्वयं ही उठानी पड़ेंगी। अन्यथा टूटा हुआ टूटा परिवार और टूटा समाज टूटे हुए शीशे जैसा हो जायेगा, जिसमें कोई भी तस्वीर अधूरी ही नजर आएगी। इसके लिए सबको विभिन्नता और अभिन्नता में अंतर को समझ कर उचित आचरण पर अमल करना भी जरूरी है।
जय भारत!
very nice
जवाब देंहटाएं👍"सुलझाने बैठे तो सारे मामले सुलझ सकते है, बशर्ते हम अपने घमंड और स्वार्थ को आड़े ना आने दें।"👍
bhau har cheez ka solution he jalan ka nahi
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