क्या मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम जीवन के सभी मूल्यों पर नैतिक थे? अपने विचार रखे।

यह सर्वविदित है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम हिंदुओ के आराध्य भगवान है। उन्होंने अपने युग में उच्चतम मर्यादाओं का पालन करके उच्च जीवन चरित्र और सर्वोच्च आदर्शों का प्रतिमान स्थापित किया। यह भी सत्य है कि श्री राम के बराबर मर्यादाओं का पालन शायद ही किसी ने किया हो, इसीलिए वे बहुत बड़े जन समूह के आराध्य है। मर्यादाओं का पालन करते हुए उन्होंने अपने आचरण को साफ स्वच्छ, आज्ञाकारी और दयालु जन उद्धारक ही बनाए रखा। उन्होंने एक पुत्र, पति, राजकुमार, राजा, मित्र, पिता जैसे दायित्वों का पालन एवं निर्वहन में तमाम उच्च आदर्शों का अनुसरण किया और स्वयं को इन मर्यादाओं में बांधे रखा इसलिए "मर्यादा पुरुषोत्तम" कहलाएं साथ में भगवत्ता को प्राप्त किया।
       व्यक्ति के सामाजिक आचरण की वे सीमाएं जो व्यक्ति को झूठा, अनैतिक या गलत आचरण करने से रोकती है, "सकारात्मक मूल्य" कहलाती है। मूल्यों का व्यक्ति के आचरण, व्यक्तित्व तथा कार्यों पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। अब मूल प्रश्न यह है कि क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जीवन के सभी मूल्यों पर नैतिक थे? इस प्रश्न का मूल्यांकन विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रख कर किया जा सकता है।
       एक पुत्र के रूप में:- एक पुत्र के रूप में वे बचपन से ही आज्ञाकारी पुत्र थे। उनके पिता राजा दशरथ ने जब उन्हें चौदह वर्ष का वनवास दिया तब भी उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया, जबकि दूसरे ही दिन में राजा बनने वाले थे। वे चाहते तो अपने पिता के विरोध में विद्रोह भी कर सकते थे जबकि राज्य का तमाम जनमत उनके के साथ था। इसके अलावा भी वे माता कैकेई पर भी तनिक भी क्रोधित नहीं हुए ना उनसे किसी भी प्रकार कि शिकायत की और अपने छोटे भाई भरत के लिए राज्य सिहासन का त्याग कर दिया और खुशी-खुशी वनवास को चुना।
       एक राजकुमार के रूप में:- मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जब अयोध्या के राजकुमार थे तब उनके आचरण, कर्मों और वाणी से संपूर्ण प्रजा उनसे अत्यधिक स्नेह रखती थी। राजकुमार रहते हुए उन्होंने अपनी जनता की भलाई के लिए कार्य किए। जब श्री राम वनवास जा रहे थे तब सारी अयोध्या की निवासी उनके लिए आंसू बहा रहे थे। यह जनता का उनके प्रति प्रेम को दर्शाता है। इसके अलावा अपने पिता राजा दशरथ के द्वारा उनको वनवास दिए जाने की घोषणा की गई तब भी वे सरल और सहज बने रहे। जबकि वे तो अपने पिता के राज्य के नैसर्गिक दावेदार थे।
       एक पति के रूप में:- सीता स्वयंवर में श्रीराम ने अपनी बल बुद्धि से स्वयंवर जीता और सीता जी को सम्मान पूर्वक अपनी पत्नी बनाई। सीता जी ने भी अपने पत्नी होने के दायित्व को भरपूर निभाया या यूं कहें कि उन्होंने श्रीराम के लिए संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया था। श्रीराम भी अपनी पत्नी का सम्मान एवं प्रेम करते थे। यही कारण है कि उन्होंने अपने जीवन में केवल एक ही विवाह किया था। वनवास के दौरान जब रावण के द्वारा सीता हरण किया गया तब उन्होंने वानरों एवं भालुओ की सेना तैयार की एवं सीता जी की खोज कर, लंका पर चढ़ाई कर संपूर्ण राक्षसों का वध करके सीता जी को सम्मान पूर्वक ले आए। यहां पर भी कई लोग श्री राम की आलोचना करते हैं कि, प्रथम उन्होंने सीता की अग्नि परीक्षा ली, दूसरा लोक निंदावश पत्नी को वनवास भेज दिया। लेकिन यहां आलोचक यह भूल जाते है की श्रीराम एक पति ही नहीं बल्कि किसी राज्य के होने वाले राजा भी थे। वनवास जाने के दौरान श्रीराम ने तो अपनी पत्नी से आग्रह नहीं किया की वे भी साथ चले। उनमें सीता जी के लिए प्रेम का मूल्य तो था ही इसके साथ में एक राजा में अपनी प्रजा को संतुष्ट रखने के भी मूल्य थे। अधिकतर परिस्थितियों मूल्य नैतिकता से ऊपर होते है। अतः उनके द्वारा उस समय में मूल्यों को प्राथमिकता दी गई। वे नहीं चाहते थे की कोई भी व्यक्ति मुंह उठाए और उनकी प्रिय पत्नी को संदेह के सवालों से घेरे। अगर राज्य की प्रजा उनके नैतिक मूल्यों पर सवाल करती तो फिर वे किस बात के मर्यादा पुरुषोत्तम रहे होते। यह तत्कालीन समय में न्याय व्यवस्था की पराकाष्ठा थी, जहां राज्य में सभी के लिए न्याय सर्व सुलभ था।  
         एक मित्र के रूप में:- वनवास के दौरान वन में भटकते हुए उनके कई मित्र भी बने सुग्रीव, हनुमान, अंगद, जामवंत, नल-नील, विभीषण, जटायु इत्यादि। उन्होंने इन सभी से समानता एवं सहयोगात्मक व्यवहार रखा। लेकिन बाली वध के लिए कई बार श्री राम की आलोचना की जाती है की उन्होंने छिपकर अनैतिक तरीके से बाली का वध किया। लेकिन एक तथ्य यह भी है की बाली श्री राम के मित्र नहीं थे उसने सुग्रीव की पत्नी को बलपूर्वक अपनी कैद में रखा था। जबकि सुग्रीव उनके मित्र थे। उन्होंने सुग्रीव को पत्नी और राजपाट सम्मान पूर्वक वापस दिलाने का वचन दिया था। और बाली को भी यह वरदान था की उसके सामने आने वाले शत्रु की आधी शक्ति उसके पास आ जाएगी। ऐसी स्थिति में अपने मित्र सुग्रीव की मदद करने हेतु बाली का वध करना आवश्यक था अगर वे ऐसा नहीं कर पाते तो फिर अपनी पत्नी को लंका से कैसे वापस लाते। अनैतिक दुश्मन के वध में नैतिकता का मूल्य हावी हो सकता है लेकिन मित्र की पत्नी को दुश्मन की कैद से मुक्त कराने में तो नैतिकता का मूल्य अवश्य कमजोर पड़ेगा।  इसी प्रकार विधर्मी रावण का समूल नाश कर के अपने मित्र विभीषण की मदद की।
         एक राजा के रूप में:- एक राजा के रूप में उन्होंने सर्वदा अपने कर्तव्यों और दायित्वों का इमानदारी पूर्वक निर्वहन किया। वे एक दयालु राजा थे, प्रजा ही उनके लिए सर्वोपरि थी। लोक निंदा के चलते पत्नी को वनवास भेजा ताकि कोई भी उनकी पत्नी और अयोध्या राज्य की रानी के चरित्र पर संदेह न कर सकें। गुरु वशिष्ठ के साथ में जब उनके दोनो पुत्र लव और कुश राजमहल में आकर कहते है कि वे उनके पुत्र है तब भी वे उन्हें स्वीकार नहीं करते है अगर उस समय वे ऐसा करते तो संभव था की लालचवश कई और लोग भी उनके पुत्र होने का दावा करते।
         एक पिता के रूप में:-एक पिता के रूप में उनका दायित्व था कि उनके पुत्रों में उच्च नैतिक मूल्य विकसित हो, जिसके है तो उन्होंने लव और कुश की उनके पुत्र होने की दावेदारी को नकारा और बाद में सही तथ्यों का परीक्षण करने बाद में सारी जनता के सामने उन्हें पुत्र स्वीकार किया। वानप्रस्थ जाने के समय अपने योग्य पुत्रों को राज कार्य सौंप दिया।
         इस प्रकार सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि श्री राम कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे बल्कि वे मानव के रूप में एक असाधारण पुरुष थे, जोकि पुत्र, राजकुमार, राजा, पति, पिता, मित्र और लोक उद्धारक के रूप में एक उच्च नैतिक मूल्य एवं उच्च जीवन आदर्शों से युक्त महामानव थे जिन्हें हम भगवान के रूप में पूजते हैं। उन्होंने हमेशा ही वंचितों को सहारा दिया। आज की परिस्थितियों से उन तत्कालीन परिस्थितियों की तुलना नहीं कर सकते। और अगर तुलना करे भी तो इतना तो मान सकते हैं की अगर हमारे किसी भी करीबी, मित्र, पिता, पुत्र पुत्री, पत्नी इत्यादि पर कोई आंच आए तो हम तमाम नैतिक मूल्यों को एक तरफ रखते हुए उनके रक्षण में लग जाएंगे उसके लिए चाहे हमें कितने भी अनैतिक कृत्य ही क्यों न करने पड़े हम करेंगे। लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम तो बिल्कुल नहीं बन सकते हैं। रही बात श्री राम के मर्यादा पुरुषोत्तम होने की तो वे निर्विवाद रूप से मर्यादा पुरुषोत्तम थे। और नीति शास्त्र की भी अपनी एक सीमा है की कोई व्यक्ति जीवन के सभी मूल्यों को नैतिक हो ही ऐसा बिल्कुल नहीं हो सकता। लेकिन अगर किसी व्यक्ति में मूल्यों पर नैतिकता की प्रधानता हो तो यह अवश्य संभव है। हमे यह भी ज्ञात होना चाहिए कि महान व्यक्तित्वो को तुच्छ तर्कों की तुला में तौलना कोई बौद्धिकता नहीं बल्कि मूर्खता होगी।
                     जय श्री राम
                          जय भारत!
 

टिप्पणियाँ

  1. ये बात सच है की कोई भी व्यक्ति सभी मूल्यों पर नैतिक नही हो सकता और किसी न किसी स्थिति में अनैतिक होना पड़ता है पर सीता जी ने जब एक बार अग्निपरीक्षा दे दी थी तो दोबारा अग्निपरीक्षा की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी इस उनके साथ पति का अनैतिक होने की वजह से सीताजी पाताल लोक में चली जाती है

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