उम्मीदों में निवेश

अगर कोई भी चाहे कि उसे सबकुछ बड़ी आसानी से सर्वसुलभ हो जाए तो यह असंभव है। प्रत्येक वांछित फल या परिणाम के हेतु सही दिशा में परिश्रम पहली आवश्यक शर्त होती है। यूं भी हम चाहे या न चाहे फिर भी जीवन में प्रत्येक व्यक्ति को अपना कुछ ना कुछ निवेश करना ही पड़ता है। हर कोई अपनी जरूरत, प्राथमिकता, पसंद या नापसंद, इच्छा या बिना इच्छा के भी, अच्छाई का बुराई का, समय का, धन का, व्यवहार का, मान-अपमान का, सोच का, सुख-दुख का, अलग-अलग प्रकार का निवेश करता जाता है। जिसके पास जो भी तत्व अधिक होगा वह उसका अधिकतम निवेश करेगा। इसके अलावा जिसकी जैसी सोच या मानसिक स्थिति होती है वह उस हिसाब से उतना निवेश करता है। अच्छी बातों का निवेश अच्छे उज्ज्वल भविष्य की गारंटी है। नकारात्मकता के निवेश से पतन के सिवाय कुछ भी नहीं मिलने वाला। 
               दुनिया में कईयों ऐसे लोग भी हैं जो कुछ भी निवेश नहीं करते है केवल जिंदा है लेकिन फिर भी वे किसी न किसी बहाने समय तो गवां रहे होते है। हमें निवेश और खर्च करने के बीच का स्पष्ट अंतर मालूम होना चाहिए। कई ऐसे लोग हैं जिनका एकमात्र लक्ष्य जीवित रहना है। फालतू समय व्यतीत करना समय का निवेश करना नही होता है और ऐसे लोग इसलिए जिंदा है क्योंकि वे मरे नहीं, जिंदा बने रहना ही उनके जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि होती है। जीवित रहने का मतलब, जीवन केवल खाना पीना, उठने बैठने या नित्य क्रिया, तक ही सीमित होता है। उनके जीवन में किसी प्रकार का मानसिक उत्साह, जोखिम, जोश, लक्ष्य, नवाचार, उन्नत सोच, उद्यमशीलता या कम से कम प्रगतिशील विचार तक भी नहीं होते है लेकिन इन सब के बावजूद भी इनके मन में एक अनूठी शांति होती है, जिस प्रकार से कोई सूअर कीचड़ में बड़े आराम से शांति से पड़ा रहता है। इस प्रकार के अधिकांश लोग दूसरों की कृपा पर ही निर्भर रहते हैं। सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से ये लोग न तो प्रगतिवादी होते है न ही रूढ़िवादी। इनका अपना ही स्वनिर्धारित यथास्थितिवाद होता है।
         पृथ्वी का सबसे लड़ाकू जानवर, जो कपड़े पहन कर स्वयं को इंसान कहता है, अपने ही लोगो को मारने काटने के लिए हमेशा तत्पर रहता है। यह क्रूर जानवर अपनी नकारा विचारधाराओं से लड़ भी नही पा रहा, उन पर विजय प्राप्त करना तो दूर की बात है। आज के इस डिजीटल मानव का सामाजिक निवेश घटता जा रहा है। मानव मस्तिष्क मरता जा रहा है। अधिकांशतः शरीर बाहर से चमकता दिखता है जबकि मस्तिष्क में भूसा भरा होता है। मानव का सामाजिक ढांचा ध्वस्त होने की ओर अग्रसर है। यह सभ्य समाज की कमजोरी का ही नतीजा है कि आज सभ्य समाज का अस्तित्व होने के बावजूद भी व्यक्ति में पशुत्व बड़े आराम से फलफूल रहा है। इन सब बातों का परिणाम कुल मिलाकर कुछ भी नहीं है, जैसे अन्य पशु या जीव जी रहे है उन्ही के समानांतर हम भी जिए जा रहे है। संभवतः बुद्धिजीवियों द्वारा इसे नकारात्मक सोच जरूर कही जा सकती है लेकिन आज समाज में 'उन्नत नाकारापन' अपने चरम की ओर बढ़ता जा रहा है जो कि कड़वी वास्तविकता के काफी करीब भी है।
         आज हम हमारे आसपास देख सकते है कि इंसान जानवरो को इंसानी गुण सीखा रहा है और खुद जानवर बनता जा है। संवाद के संसाधन बढ़े तो समाज से हमारा संवाद खत्म होने लगा। संवाद के नाम पर औपचारिकताएं भी खत्म होती जा रही हैं। परिवहन के संसाधन बढ़े तो अपनो के ही घर आना जाना घटने लगा। हम सारी सुख सुविधाएं चाहते है लेकिन उनकी प्रतिपूर्ति के लिए करना कुछ भी नहीं चाहते। हवा शुद्ध चाहिए लेकिन पेड़ काटना नहीं छोड़ेंगे हालांकि कुछ तथाकथित पर्यावरण संरक्षकों की वृक्षारोपण की नौटंकी तो हर साल चलती है। कुछ तो अपने घर में विदेशी नस्ल का कुत्ता पाल कर स्वयं को वन्यजीव प्रेमी घोषित करने में लगे है। हमें स्वच्छता चाहिए लेकिन कचरा फैलाना नही छोड़ेंगे। आराम के लिए भी काम तो करना ही पड़ेगा, बिना काम के किस बात का आराम? हमारे समाज में ऐसे बुद्धिजीवी बढ़ रहे है जिनकी बुद्धि में छोटे-छोटे जीव पनप रहे है। मेहनत की जगह शरीर में आलस्य, नाकारापन और जलन कुढ़न अपना दरबार सजा रहे है। वास्तविक दुनिया को लात मार के रील में खुश रहने वाली अधिकांश दुनिया का वास्तविकता से कैसे सामना करेगा यह तो वक्त ही बताएगा।
         इस पृथ्वी पर हमें इंसान के रूप में जीवन का वरदान मिला इसे अभिशाप बनने रोकना हमारा सामूहिक दायित्व है। हमारे पतन के पीछे चाहे जितने भी कारण जिम्मेदार होंगे लेकिन लड़खड़ाते वर्तमान की गोद मे सुदृढ़ भविष्य का लालन पालन कैसे होगा? उसका स्वरूप कैसा होगा? उस भविष्य के जीवन का दर्शन क्या होगा? क्या वह जीवन जिएगा भी या सिर्फ जिंदा रहेगा? ऐसे कई प्रश्न वर्तमान के सम्मुख सिर उठा रहे है। एक सवाल यह भी है कि हम भविष्य के लिए चाहते क्या हैं? जवाब है, कुछ भी नहीं। क्योंकि वर्तमान तो तमाम कुंठाओ, रूढ़ियों, और तुच्छ स्वार्थों के दलदल में धंसता जा रहा है। ऐसे में कमजोर सत्य अपने आप को असल सत्य कैसे साबित करेगा? हमें अपनी कामचोरी और मानसिक कमजोरी की पोटली को कांधे से उतार फेंकना होगा। यह तभी संभव होगा जब हम मन और शरीर से कर्मों में अधिकतम निवेश करेंगे। जिससे उम्मीद की बारिश होगी, उमंगों की बाढ़ आएगी और तभी ये दुर्गम दलदल धुलेगा। इस तरह अंधेरी निराशा कि बंजर भूमि में जब भी उजाले का  निवेश होगा तभी समाज को सफलता, संतुष्टि, उन्नति और संपन्नता के फलों का स्वाद चखने को मिलेगा।
                                    जय भारत!

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