कारागार रक्षक
समाज के आपराधिक कचरे को खिला पिलाकर, संड-भूसंड बनाकर और पाल पोसकर सुरक्षित रखे जाने वाले लिबरल एवं सामूहिक स्थान को जेल कहा जाता है। समाज के इसी आपराधिक कचरे को सकुशल संभाले रखने का जिम्मा सरकार का होता है। सरकार जेलों के कुशल प्रशासन हेतु अधिकारियों एवं कर्मचारियों को तैनात करती है। प्रशासनिक अनुक्रम में सबसे निचले पायदान पर ऐसा जीव जो, इंसान और जानवर के बीच कि अदृश्य कड़ी होते हुए भी अपने इस विशेष गुण पर थोड़ा भी जो गर्व न करे, परिवार और समाज से अंशतः आइसोलेट एवं अधिकांशतः बहिष्कृत रहते हुए अपने जेल के घिसेपिटे कर्तव्य के प्रति थोड़ा जागरूक और थोड़े सुस्त, इस जीव को "जेल प्रहरी" कहा जाता है। यह उल्लू और कुत्ते का वंशज न होते हुए भी हरकते एवं व्यवहार उन्ही के जैसी करने वाला विलक्षण प्राणी है। जेल मैनुअल का डर और पूर्व अंग्रेजी शासन कि फितरत ने इस विलक्षण जीव कि अद्भुत पर्सनालिटी डेवलप की है।
धकापेल कॉम्पीटीशन का पहाड़ जो चढ़ चूका, अपने दुर्भाग्य से लड़ चुका, थका हारा, बेरोजगारी और जरूरतों का मारा, समाज के दबाव में दबा, अभ्यर्थी बेचारा लाचार होकर कुछ शारीरिक क्षमताओं के छोटे-मोटे परीक्षण से पास होकर मेरिट लिस्ट में शामिल होकर स्वयं की दावेदारी पेश करता है कि वह प्रहरी बनने के योग्य हैं। अपनी इस ड्रीम जॉब को ज्वॉइन करने बाद छः महीने की बेसिक ट्रेनिंग, जिसमे धूप, धूल, मिट्टी, पसीना, थकान जैसे पंच तत्वों के कठिन सम्मिलन से जवान बनने के पश्चात, जब अपनी ड्यूटी पर तैनात होता है तब वह जेल प्रहरी होने कि दहलीज पार करता है। शुरू शुरूमें जेल का सिस्टम कुछ भी समझ में नहीं आता है, पता ही नहीं चलता के जेल ही जीवन है या जीवन में जेल है। न दिन का पता न रात का कोई ठिकाना, सारे काम छोड़कर बस सोने का बहाना। एक दौर ऐसा भी आता है कि प्रहरी की आंखों में कोई सपना नहीं होता, आंखों में होती है तो केवल नींद। उस बेचारे के आगे शुरुआती दौर में नींद ले या नौकरी करें, दो ही सवाल रहते है।
जीवन में दिल लगाना और जेल प्रहरी की नौकरी करना दोनो ही बेहद रिस्की काम है। दोनो ही स्थिति में आदमी कहीं का नही रह जाता। दिल लगाने पर आदमी उतावला होता है और जेल प्रहरी नींद में बावला होता है। लेकिन जेल प्रहरी कि नींद के प्रचंड बावलेपन से बचे रहने के कुछ उपाय भी है जिसमें अर्दली करना प्रमुख ब्रह्मास्त्र है। इसके अलावा लूप लाइन में सेट होना, अधिकारियों के सारथी(ड्राइवर), ऑफिस ड्यूटी, चीफ कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से सेटिंग या घूसखोरी जैसे प्रभावशाली उपाय भी है जो प्रहरी की अपनी श्रद्धा, हुनर, जरूरत और स्टेमिना के हिसाब से अपनाये जाते है। सच्चे अर्थों में जेल प्रहरी के लिए "पसंद का अधिकार" की इससे अच्छी नजीर और कोई देखने को नहीं मिलती है, यही सच्चे लोकतंत्र की अच्छी निशानी भी है। वैसे जेल में अर्दली होना मदर टेरेसा बनने के जैसा है। इसके लिए नोबेल प्राइज तो नहीं मिलता लेकिन प्रशस्ति पत्र, डीजी डिस्क और राष्ट्रपति पदक जैसे कईयों सम्मानजनक अवार्ड जरूर मिलते है।
जेलों में कैदी की स्थिति अच्छी है या प्रहरी की यह सदियों से चला आ रहा यक्ष प्रश्न रहा है। वैसे तो कुछ समय पहले तक "मैं भी चौकीदार" का नारा सबने लगाया लेकिन किसी एक ने भी थोड़ा सा साहस जुटा के ये नही कहा कि "मैं भी प्रहरी"। हर दिन अलग ड्यूटी शेड्यूल होने के कारण खाने और सोने की समस्या हमेशा से चली आ रही है। ड्यूटी का शेड्यूल अंग्रेज जो बना कर चल दिए वही ज्यों का त्यों चल रहा है। पता नहीं ये ड्यूटी शेड्यूल इंसानों के लिए था या जानवरो के लिए, ना इधर के बचे ना उधर के। ऊपर से नए नए तुगलकी फरमान जो जारी होते रहते है सो अलग समस्या। प्रहरी की भूख का, कभी जेल में, कभी आवास पर पेट भरण कार्यक्रम चलता रहता है लेकिन अनिद्रा से पेट चलता फिरता गैस सिलेंडर बना रहता है, यदाकदा छोटे मोटे बम धमाके भी चलते रहते है। प्रहरी की नींद भी इतनी बदमाश होती है कि घर में तो आती नही और जैसे ही ड्यूटी पर पहुंचे नहीं कि, न चाहते हुए भी आ ही जाती है। इसी जागने-सोने कि खींचतान के बीच कब शादी ब्याह हो जाता हैं। उसके बाद बच्चे भी कैसे छोटे से बड़े हो जाते है, दो चार बीमारी जाने कब शरीर से चिपक जाती है ये सबकुछ पता ही नहीं चलता है। जीवन भर कभी नींद ही पूरी नहीं हो पाती है फिर भी जीवन चलता है। कमबख्त इस नींद ने भी ना जाने कितने ही प्रहरियों को नोटिस, सस्पेंड से लेकर बर्खास्त होने तक के दुखी दिन भी दिखाए है।
दुनिया की लगभग सभी जेलों का माहौल कमोबेश नकारात्मक ही रहता है, यह बात निरपेक्ष सत्य तो नहीं लेकिन सापेक्ष सत्य जरूर है। वैसे भी आपराधिक प्रवृत्तियों के लोगों के बीच में कौन सा माहौल सकारात्मक रहेगा। जेलों में भी सभी गुंडे बदमाशो और छोटे मोटे अपराधियों की अपनी-अपनी सच्ची झूठी कहानियां है। जेल में तो कोई भीखमंगा अपराधी भी स्वयंभू वजनदार है। लेकिन जब जेल के अंदर के माहौल की बात की जाए तो अधिकांशतः नकारात्मक ही मिलता है। किसी के भी मुंह से यह नहीं सुनने को मिलेगा की जेल प्रहरी बन कर बहुत गर्व महसूस हो रहा है। जेल प्रहरी कि नौकरी किसी परिवार पालन केंद्र ज्यादा कुछ नहीं है। प्रहरी कि नौकरी की एक और खासियत यह भी है कि इससे आदमी न तो अमीर बन पाता है न ही गरीब। यहां प्रहरी की उन्नतिशील हसरतों कि अचानक से कब नसबंदी कर दी जाती है पता नहीं चलता है। आदमी कट्टर मिडल क्लास का बनकर रहने को मजबूर हो जाता है। हालांकि अधिकांश प्रहरियों को भी जेल प्रहरी होने में कोई विशेष खुशी भी नहीं है। भूखे पेट और खाली जेब का भय ही प्रहरी को प्रहरी बनाए रखता है। कई अधिकारी और पदाधिकारी भी बढ़ चढ़कर इस नकारात्मकता को बढ़ाने में अपना अमूल्य योगदान देते रहते है। अधिकारी भी अपनी सारी बहादुरी प्रहरी को ही दिखाते है, बाकि बाहर तो उन बेचारों को भी कोई विशेष भाव नहीं मिलता। इसके अलावा प्रहरियों में भी कौनसी एकता है, वे भी हमेशा केकड़ों के जैसे एकदूसरे की टांगे खींचने में लगे रहते है। चुगली, चाटुकारी और अपनी बनाने के चक्कर में कुछ प्रहरी दूसरो को प्रोब्लम में डालते हैं। सपोर्ट न करें तो न सही लेकिन टांग खींचना भी अच्छी बात नहीं है। एकदूसरे को शक की नजरो से देखना तो आम बात है।
दुनिया का सबसे ईमानदार जीव कुत्ते को माना जाता है लेकिन यह तथ्य पूर्णतः सत्य नही है। दुनिया का सबसे ईमानदार जीव अर्दली होता है, चाहे किसी भी विभाग का हो, वह ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, नम्र और मेहनती भी होता है। जहां एक कुत्ता भी दूसरे कुत्ते को अपने साथ में घूमाना पसंद नही करता लेकिन वहीं, कर्तव्यनिष्ठ अर्दली खुशी-खुशी इस कार्य को करता है। कुत्ता अर्दली को घुमाता है या अर्दली कुत्ते को यह भी दूसरा यक्ष प्रश्न है। कुत्ते मामले में कुत्ते की नहलाई धुलाई एवं मालिश जैसे आवश्यक कार्य शामिल है। इन एलीट क्लास कुत्तों के सहारे ही न जाने कितने ही अर्दलीयों का रिटायरमेंट हो जाता है। ये वही एलीट क्लास कुत्ते होते है जिन्हे "कुत्ता" नही बोल सकते, इनका बिछौने की क्वालिटी भी प्रहरी को मिलने वाली सरकारी वर्दी से कई गुना बेहतर होती है। इसके अलावा भी जो व्यक्ति अपने घर पर कचरे का एक तिनका उठाना भी पसंद नही करता वो अपने आका के बंगले पर जा जाकर बर्तन झाड़ू पोछा इत्यादि कार्य बड़ी तल्लीनता से करता है। अर्दली को जी हजूरी, चापलूसी, तेल मालिश, बूट पॉलिश जैसे अतिरिक किंतु अतिआवश्यक कार्यों को संपन्न करना भी आवश्यक होता है।
इन सारी बातों के बाद भी कुछ और ज्यादा करे भी तो क्या करें। जिस विभाग का अपना ही कोई सम्मान न हो तो उस विभाग के प्रहरी को सम्मान क्या खाक मिलेगा? जो कुछ सम्मान है तो वह केवल अधिकारी वर्ग का ही है। दूसरे विभागों की तरह इस विभाग में सबके अपने-अपने हिस्से बने हुए है लेकिन प्रहरी के हिस्से दंड ही आता है। प्रहरी तो झूठी प्रशंसा को ही अपना सम्मान समझ कर खुश हो लेता है। लेकिन फिर भी किसी प्रहरी को अलग से उसका सम्मान होने का थोड़ा अहसास मात्र भी हो तो वह कोई छोटी मोटी गलती कर लें या छुट्टी मांगने के लिए खड़ा हो जाए उसका सारा शक दूर हो जाएगा। प्रहरी का वेतन सीमित मात्रा में केवल परिवार चलाने के लायक ही मिलता है। अगर उसने थोड़ा भी इधर उधर कुछ सेटलमेंट कर के कमाने कि कोशिश की तो अधिकारियों के रडार पर पहले ही आ जाता है। खैर कई प्रहरी उस रडार को चकमा देने कि विद्या सीख चुके हैं। कई प्रहरी भी अंदर और बाहर के सेटलमेंट करने के मामले में मध्यस्थ की भूमिका भी निभा लेते हैं। हालांकि आजकल के आधुनिक ट्रेंड में मध्यस्थता कराने का कार्य कैदियों ने अपने हाथों में ले रखा है, बिचौलियों के अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है। चोरों ने कोतवालो की जाने कौन सी नसें दबा रखी है अबतक पता नहीं चला।
खंडहर के जैसे दो कमरों के सरकारी क्वार्टरों में रहते हुए, आह भरते हुए रिटायरमेंट आते तक प्रहरी बमुश्किल एक छोटा सा मकान बना पाता है। जी हां, जी हां करते हुए बुढ़ापे में 'ना' बोल पाने कि स्थिति में नहीं रह जाता है। अगर उसकी औलादें ठीक काबिल निकल जाए तो बेचारे का जीवन सफल समझो वरना जो प्रहरी जीवन भर दौड़ दौड़कर खैरियत लगाता है, जी हुजूरी करता है, आखिरी के दिनों में कोई उसकी खैरियत पूछने वाला भी नहीं मिलता है। प्रहरी अपने आपमें डर, आशंकाओं और अनिश्चितताओं का छोटा सा बुलबुला है जो, जाने कब फूट जाए। प्रहरी का जीवन तो ढेरों कयासों, आशाओं और निराशाओं कि अंधड़ में दिए सा जलता-बुझता रहता है। इस तरह डर, शंकाओं और उम्मीद की पीठ पर बैठा प्रहरी धरती से मुक्त होकर फिर से जब "स्वर्ग के कारागार" में शाम के लॉकअप की गिनती लगा कर, अष्टकोण में जाकर लॉकअप रजिस्टर में कीड़े मकोड़े वाली साइन करने के बाद, हवलदारी वाला पुराने स्टाईल का लेफ्ट सैल्यूट मारते हुए कहता है सब खैरियत है साहब।
जय भारत!!
क्या लिखूं मेरे पास शब्द ही नहीं बचे
जवाब देंहटाएंBhut mushkil h jailprahri ki job... Sabd nhi he.... Ak v din asa nhi hota ki ghar pr chain se so payyyyy......
जवाब देंहटाएंसही नब्ज़ पकड़े हो ब्रदर
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