लोकतंत्र की मजबूरी
इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारे शुरुआती नेताओ में लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अगाध आस्था थी। उन्होंने देश को उस दौर में संभाला और आगे बढ़ाया जिस समय हमारे देश के अधिकांश नागरिकों को लोकतंत्र का सही से मतलब भी नही पता था। उन दिनों जब देश की आधी से भी कम आबादी साक्षर नही थी तब भी जनता को मूर्ख नहीं बनाया गया। लेकिन जैसे जैसे देश की निरक्षर आबादी घटने लगी नए नेताओ ने जनता को मूर्ख बनाने के नए नए तरीकों का अविष्कार किया। धीरे-धीरे इस अगाध आस्था का ग्राफ गिरने लगा और आज तक आते-आते लोकतांत्रिक आस्था कई बार तो चौखट चूमने तक या गांधी जी की प्रतिमा को हार चढ़ाने के दिखावे तक सीमित रह गई है। लोकतंत्र में जनता को जनार्दन कहा गया है लेकिन साफ आंखों से देखने पर पता चलता है कि जनार्दन तो कोई और बना हुआ है। जनता को कैसे कैसे जुमलों के जाल में फंसाकर रख दिया जाता है, यह सर्वविदित है। बेचारी जनता भी इतनी मूर्ख बन जाती ही कि उन्हें पता ही नहीं चलता की उनने किन्हें वोट देकर अपना सांसद या विधायक बना रखा है। ये जनता के चुने हुए जन प्रतिनिधि पार्टी में एक प्रमुख व्यक्ति विशेष की चमक के नीचे दब कर रह जाते है, सबकुछ एक ही व्यक्ति के नियंत्रण और संचालन में होने लगता है। बाकि के मंत्री संतरी तो नाममात्र के रह जाते है। जनता के मुद्दो पर कुछ भी नही कहा जाता जबकि दूसरे मुद्दों पर लंबी-लंबी फेंकी जाती है। नेताजी अपने वादों और राजनीतिक दायित्वों को पूरा करने के बजाय जोड़ने तोड़ने के कार्य करने लगते है।
भारतीय राजनीति अपने अजीबोगरीब दौर से गुज़र रही है। यहां विधायक सांसद खरीदे और बेचे जाने के लिए बंपर ऑफर की परंपरा चल पड़ी हैं हालांकि यह भी कोई नई परंपरा नहीं है। लेकिन अगर किसी नेता को बिकना ही हो तो वह चुनाव से पहले ही बिक जाए, जनता से वोट लेकर जनता के विश्वास को खरीदा या बेचा जाना तो लोकतंत्र के साथ में साफ साफ गद्दारी करना है। संसद और विधानसभाओं के सत्र दिन प्रतिदिन छोटे होते जा रहे है। संसद में संसदीय कार्य करने की बजाय पूर्व नियोजित हंगामे किए जाते हैं। जब संसद में कार्य ही नही होगा तो फिर किस बात के लिए संसद सत्र बुलाए जाते है? सत्ताधारी पार्टी को भी चाहिए कि वे अपने तय जुमलों के हिसाब से कार्य करें। जनता के सरोकारों का जो होगा सो होगा। कई बार संसद का इस्तेमाल विपक्षी दलों से बदला लेने, उन्हें खत्म करने के हथियार के रूप में किया जाता है और तर्क दिया जाता है कि उन्होंने वैसा किया था इसलिए हम ऐसा कर रहे हैं। किसी भी देश की संसद लोकतंत्र की सर्वोच्च पहचान होती है, लेकिन उस पहचान को नए भवन बनाकर, बनाए रखने की कोशिश की जा रही है। भवन बदल जाने से सरकार की कार्यशैली नहीं बदल सकती। जनता से सरोकार रखने वाले मुद्दो को एकतरफ कचरे के डिब्बे में फेंक कर दूसरे ही मुद्दे हवा में उछाले जा रहे है। जो जनता एक समय तक जनार्दन दिख रही थी, वही बेचारी जनता लोकतांत्रिक लूट और ठगी का शिकार होकर अपना सा मुंह लिए रह जाती है। लोकतांत्रिक ठगी को वैध बताने का आजकल एक और नया प्रचलन बढ़ा है जिसका नाम डबल इंजन की सरकार है। हमारे नेता डबल इंजन का ऐसा भौकाल बनाए हुए हैं मानो डबल इंजन से सारी समस्याएं अचानक से छूमंतर हो जाएगी। अगर इंजन ही खराब हो तो दो नही दस इंजन भी लग जाए तो भी वे कुछ नही कर सकते। डबल इंजन वाली सरकारें पूरी ताकत से माल समेटने में लगी हुई हैं। वैसे भी डबल इंजन ही क्यों? विकास के लिए जनता को तो पूरी ट्रेन की ही जरूरत है जिसमे अपनी-अपनी क्षमता अनुसार सब बैठे और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करें। लेकिन इसी डबल इंजन की सरकार में कई छोटे छोटे राज्यों के सुचारू संचालन की क्षमता भी नही है। इन डबल इंजन की सरकार के ड्राइवर को भी नही मालूम कि उसके ये डबल इंजन कब तक और कितनी दूर तक साथ में चलेंगे। अगर एक ही दमदार, शक्तिशाली इंजन पूरी ईमानदारी से काम करें तो ये चोरी के डबल इंजन की कोई जरूरत ही नहीं पड़ेगी।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुने हुए लोक प्रतिनिधियों की जनता के प्रति जवाबदेहिता लगभग खत्म होते जा रही हैं। जो नेता चुनाव से पहले जनता के सामने वोट मांगने हाथ जोड़ते फिरते है वही नेता चुनाव जीतने के बाद खुदा बन जाते है और जनता को कुचल कर आगे बढ़ जाते है। जिस किसी नेता को जितना अच्छा भावनात्मक झूठ बोलना और अच्छा अभिनय आता है वह उतना ही अधिक लोकप्रियता बटोरता है। बाकि की लोकप्रियता मीडिया प्रबंधन से हासिल हो जाती है। हालांकि ये हथकंडे भी वैश्विक स्तर पर अपनाए जाने लगे है। हमारे देश में किसी भी प्रकार की जागरूकता पैदा करना और स्वयं से जागरूक होना दोनो ही अत्यंत कठिन काम है। राजनीतिक जागरूकता तो हमारे यहां कुछ प्रतिशत लोगो तक ही सीमित है, इसके चलते जनता अपने आपमें कई बार मूर्खों की भीड़ से ज्यादा कुछ नहीं रहती है क्योंकि जनता में नागरिक होने का भाव ही नहीं है। कहीं से अगर जनता में भी नागरिक होने का भाव पैदा हो गया तो नागरिकों के अधिकारों के अलावा उनके मौलिक कर्तव्य भी है, जिनका उन्हें भी पालन करना होगा। लेकिन जनता यह मानकर चलती है कि एक बार वोट दे देने के बाद में पांच वर्षों के लिए उनकी सारी जिम्मेदारियां सरकार की है। जहां कुछ भी फ्री का मिला वे उसी के समर्थन में आंखे बंद किए खड़े हो जाते है। अगर फ्री देने वाला फॉर्मूला सही से काम न करे तो मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुसलमान या दलित-पिछड़े का सिक्का फेंक दो, जनता में चल जायेगा। और नही तो बड़े बड़े वादे करो बाद में जुमला था, कहकर मुकर जाओ। कई सालों से इन्ही दो चार मुद्दो के दम पर सभी पार्टियां चुनाव जीतते आई है। वैसे तो विकास की बातें करने का भी चलन बढ़ा है। जनता की जवाबदारी बनती है कि वह फालतू झांसे में न आए, अपने विवेक का अधिकतम इस्तेमाल करते हुए अपने प्रतिनिधि चुने। लेकिन विवेक तो साक्षर होने से शायद ही आयेगा बल्कि उसके लिए शिक्षित बनना पड़ेगा। शिक्षित होने के लिए अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा चाहिए और अच्छी शिक्षा, सोच और समझ के लिए विश्व गुरु कई सालो से भटक रहा है।
लोकतंत्र में अगर जनता को सच्चे अर्थों में जनार्दन बनाना हो तो जनता का स्थान पहला होना चाहिए। लोकतंत्र का मतलब चुनी हुई तानशाही नही होना चाहिए। लेकिन एक समय बाद वोट देने वाली जनता निम्न हो जाती है और नेताजी श्रेष्ठ हो जाते है। इसी कल्चर के कारण जनता सड़कों पर नेताजी, मंत्रीजी के काफिले के गुजरने के रोके गए ट्रैफिक में धूप और धूल खा रही होती है। अगर ये नेताजी जनता ने चुने है तो वे जनार्दन कैसे बन गए? खुद को गरीब किसान की औलाद बताने वाले नेता हजारों करोड़ों रुपयों कि संपत्ति बना कर बैठे है। महंगाई, बेरोजगारी, अच्छी शिक्षा, सुरक्षा, समरसता, संरचनात्मक विकास जैसे कार्य न कर पाने कि स्थिति में जनता में खैरातें बांटने लग गए। और अगर ये खैरातें जनता के पैसे से ही बांटी जा रही है तो, इसमें नेताओं का खुद का क्या योगदान है? इन सभी बातों को लेकर जनता का स्वयं जागरूक होना चाहिए। जनता को भी चाहिए कि वे खैरात बांटकर फिर से सत्ता में काबिज़ होने कि इच्छा रखने वाले नेताओं को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाएं और ऐसे कर्मठ नेता को चुने जो खैरात की बजाय अपनी जनता के हित में अच्छे कार्य करने का साहस रखता हो। लोकतंत्र की मजबूरी के लिए कहना है कि, तेरे वादे पे हम किस हद तक एतबार करें, अच्छे दिन आने का और कितना इंतजार करें। अंत में जनता को ही यह तय करना है कि चिल्लर खैरातों के चक्कर में कब तक अपने नागरिकत्व की बलि देते रहना है। कम से कम इतना तो हो कि "अबकी बार दूसरी सरकार, पुरानी को करना है दरकिनार"।
जय भारत!
बहुत ही सटीक समालोचना
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