कोना'धारी वर्सेस रोना'धारी

तो ऐसा है कि झूठ के धारा प्रवाह में वाह वाह करना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन 'सच' से इंस्पायर होकर कोई ऐसा सवाल न करे जिसका जवाब आपको खुद भी पता हो लेकिन उसका जवाब किसी दूसरे के मुंह से सुनना हो। ऐसा करना तो बेशक आत्मघाती होने जैसा है। जब भी सामने वाले को लगेगा कि आप उड़ते हुए तीर के शौकीन हो, तब आपको कोई अदृश्य मालदार खिलाड़ी कैसे चुपके से कब खरीद के अपनी जेब में रख लेगा पता नही चलेगा। आजकल तो विश्व गुरु के खुफिया चेले कब अपना खेल कर जाते है पता ही नहीं चलने देते। वो तो सीधे रिजल्ट से ही पता चलता है। हालांकि उक्त सारी बातें पूर्णतः काल्पनिक जैसी है, वास्तविकता से इसका कोई लेना देना नही है। खैर! सवाल-जवाब से ज्यादा मजा तो 'मन की बात' में आता है, मन में भले ही कुछ और रखो, लेकिन मुंह से कुछ और कहो। हम तो "बेमन की बात" में भी जन, गण और वतन की बात का इंतजार करते रहते हैं। मन और बेमन कि इसी दुविधा में आज का समाज दो फटे टुकड़ों में डिवाइड हो गया है। जिसके हाथ में जितना भी फटा टुकड़ा आ रहा है उसी को सील कर अपने पक्ष का तंबू खड़ा करना चाहता है वो भी बिना बम्बू के ताकि उसमे कोई भी कोना का रोना न रहे।
        थोड़ा फ्लैशबैक की बात करे तो हमारे कॉलेज के दिनों में जब किसी भी दोस्त का भव्य बर्थडे मनाया जाता था तो समकालीन ग्रुप के नियमों के अनुसार जो जितने साल का होता था, सारे दोस्त मिलकर उसकी तशरीफ के मांसल हिस्से पर उतनी ही लातें मारते थे। बड़ा मजा आता था, जोर से लातें मारने में। लेकिन अपनी तशरीफ को भी दूसरों की लातों से बचाने के लिए कमरे का कोना पकड़ना जरूरी होता था। कई बार तय प्लानिंग के तहत कमरे की लाइट गुल हो जाती थी जिसके कारण किसपे कितनी लात पड़ जाती थी, हिसाब नहीं रहता था। वो लाटखोरी भी बहुत मजेदार लगती थी। शरीर के थोड़े हिस्से की ही सही लेकिन जोरदार मालिश हो जाती थी। अंधेरे में उजाला साथ दे या न दे लेकिन वैसी स्थिति में 'कोना' सबसे ज्यादा मददगार होता था। उस समय कई दोस्तो ने तो खुद को कट्टर कोना'धारी घोषित कर रखा था, मैने भी। भूकंप आने की स्थिति में अगर किसी बिल्डिंग में फंसे हो तब भी कोना पकड़ने की सलाह दी जाती है। आज मौजूदा दौर में चाहे समाज या देश विदेश या राजनीति में जो भी शांति से कोना पकड़े रखता है उसके कल्याण की अपार संभावनाएं होती है। कोना'धारी को शंकुधारी(उड़ते तीर) का जोखिम कम रहता है वरना आजकल कितने ही शंकुधारी हवा में यत्र तत्र उड़ते रहते है, जिनके घुसने का समय और दिशा निश्चित नहीं है। लेटेस्ट में कोरोना महामारी ने भी हम सबको कोने की अहमियत समझा ही दी है। 
           कोना'धारियों का एक दूसरा सशक्त राष्ट्रभक्त वर्ग गू'टखा गैंग है जो सड़क चलते कहीं भी देखने को मिल ही जाएगा। ये बेचारे भूखे रह सकते है लेकिन गु'टखा बिना नहीं रह सकते। ये गरीबी में जी सकते है लेकिन बिना गू'टखा इस प्यारी गू'टखा गैंग में भारत माता के वे लाल है जो सारे भारत को थूक थूककर लाल करने का आजीवन टेंडर लिए हुए हैं। ये तो वे लाल है जो भारत माता की जय का नारा लगाने से पहले बगल वाले के मुंह के सामने से अपने मुंह से पिचकारी मारेंगे फिर कही जाकर जय बोल पाते हैं। सड़को पर चलते हुए यह डर हमेशा बना रहता है कि ना जाने कौन सी गू'टखा गैंग का मेंबर आपके सामने कब मुंह से पिचकारी मारे और आपके चेहरे पर अखंड भारत का नक्शा बना दे। वैसे तो उनकी (गू'टखा गैंग) हर जगह कोनों की तलाश जारी ही रहती है। कहीं कोना देखे नही की उनको केसरिया उल्टी आ ही जाती है। इन कोना'धारियों ने तो बेचारे इंजीनियर को भी सोचने को मजबूर कर दिया कि बगैर कोने वाली बिल्डिंग कैसे बनाएं या उनके अंदर कोना रहित लिफ्ट कैसे बनाई जाय। लेकिन यह भी एक भ्रांति ही है कि हर जगह कोनों का इस्तेमाल ही होगा। यहां तो सपाट सड़को को भी जगह-जगह लाल करना बदस्तूर पूरी बेशर्मी से जारी है। रेड सिग्नल के पास, सिग्नल से ज्यादा तो सड़क रेड मिलती है। नेतागिरी में गिरगिट से भी बेहतरीन अनुभवशील कोना'धारी देखने को मिलते है। अगर किसी ने कोना छोड़ा और गलती से फ्रंटलाइन में आकर विरोध प्रदर्शन किया तो उसे जेल का कोना कभी भी गिफ्ट मिल सकता है। इससे पहले कि घरों में इनकम टैक्स, सीबीआई, ईडी के छापे पड़ने की खबर न्यूज पेपर वाले छापें उससे पहले ही पार्टी बदलो और सत्ताधारी पार्टी कि वाशिंग मशीन में धुलकर साफ हो जाओ और एक कोना पकड़ के सुरक्षित रहो। ऐसे और भी कई जिंदा उदाहरण देखने को मिल ही जाते है।
        जीवन में अपने से ज्यादा संपन्न और ज्यादा विकसित लोगो को देख देखकर निराश होने या कुंठित होने या जलने कुढ़ने से भी कोई लाभ नहीं होने वाला। अपनी नाकामी को नज़रंदाज़ कर दूसरो की तरक्की देखकर कुढ़ना यह समाज के कई मुफ्तखोर लोगो की अघोषित रोना'धारी विचारधारा है। कई अपनी नाकामी को, नसीब या किस्मत का नाम देकर छिपाने की कोशिशें करते फिरते हैं। कई तो कसम खाए बैठे है कि हमको तो रोना ही था सनम भले ही तुम कुछ भी न करते। कई रोने कि मुद्रा स्टैंडबाय मोड में ही रखते है। कोई अपनी मेहनत से खा पीकर तगड़ा बन गया है और अगर खुश है तो उसे सुख से जीने देना चाहिए। लेकिन ये रोनाधारी लगे रोने, लगे उसकी आलोचना करने। इसने इतना खाया, उसने उतना खाया, किसने कितना खाया? कितना माल खाकर हजम कर लिया? इन सब बातों से जलने की बजाय अपना खाने का स्टेमिना बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। अगर कोसना ही है तो अपने स्टैमिना को कोसो। दूसरे जैसे आप तगड़े नही हो तो सामने वाला क्या करें? वैसे भी समाज में ज्यादा खाने वाला ज्यादा जीता है। जो खायेगा नही वो तो मरेगा ही। इसलिए ज्ञानियों ने कहा है कि दूसरों के फटे में टांग डालने से अच्छा है कि अपने फटे हुए को सीलने पर फोकस करें। ईश्वर ने सबको कुछ ना कुछ विशेष शक्तियां दे रखी है। अपनी शक्ति का सही समय और सही जगह पर इस्तेमाल करें। आप जब भी अपने नकारेपन के चलते कुछ ना कर सको तो कम से कम दूसरो को सुख में देखने का हौसला तो रखो। हम इतनी तो मेहनत कर सकते हैं की मेहनत करने वाले को मेहनत करता हुआ देख सके। वैसे भी दूसरो को सुखी देखना भी दुनिया के कठिनतम कार्यों में से एक है।
        एक दौर था कि हम बहुजन हिताय बहुजन सुखाय में विश्वास रखते थे। लेकिन आज मेरा हित सबसे पहले, मेरा सुख हो सबसे ज्यादा, का प्रचलन बढ़ गया है। दुनियां और समाज 'मैं' के इर्द गिर्द सिमटते जा रहे है जो कि अपने आपमें नकारात्मक असर है। हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि देश के नागरिक होने के नाते हमारे भी कुछ कर्त्तव्य है जिनका हमें पूरी जिम्मेदारी और ईमानदारी से पालन करना चाहिए। क्या हुआ हम व्यक्तिगत रूप से बहुत ज्यादा तरक्की न कर सके हो। क्या हुआ कि हम ज्यादा साधन संपन्न ना हो। न्यूनतम संसाधनों से भी हम उच्च स्तर का जीवन जी सकते हैं। लेकिन यह भी सत्य नही है कि हम हमारे आसपास सबकुछ साफ सुथरा चाहते हैं लेकिन खुद से गंदगी करने से नहीं चूकेंगे। अगर देश के लिए हम कुछ करना ही चाहते हैं तो कम से कम एक अच्छा जिम्मेदार नागरिक तो बन सकते हैं। हम साफ सफाई नहीं कर सकते तो क्या हुआ काम से कम गंदगी भी ना करें। जब हम पर्यावरण और समाज को साफ सुथरा रखेंगे तभी तो देश साफ सुथरा रहेगा।
                        जय भारत!

टिप्पणियाँ

  1. बहुत ही बढ़िया लेख ...👌🏻🙏🏻

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. Maza aa Gaya Bhai... Bahut achha likha hai... Kahin kahin laga ki out of track ja Raha h, but pura padhne ke bad malum hua ki sahi ja Raha tha....

      हटाएं

एक टिप्पणी भेजें

आपके प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मैं भाषण हूं

मैं समर्पित दल बदलू

रूस यूक्रेन युद्ध :- सामरिक एवं मानवीय पक्ष