मैं जनता हूं

बिना दिशा, बिना किसी विचारधारा विशेष के, यत्र-तत्र झुंड से बने मांस के पुतलों की संख्या, जनता का रूप धारण करती है। सामाजिक सुसुप्तता का मैं बेजोड़ नमूना हूं। यह कोई आज से नहीं है बल्कि जबसे हजारों सालों से, जबसे विश्व को प्रशासन करने के लिए राजतंत्र, तानाशाही और प्रजातंत्र नाम के तीन बंदर गिफ्ट मिले है तब से लेकर आजतक मेरा स्वरूप जस का तस है। विश्व के बुद्धिजीवियों ने इन तंत्रों का विकास मेरे लिए ही किया है, ऐसा मेरा अटूट विश्वास है। क्योंकि अगर यह तंत्र ना होते तो मैं जनता ना होती। सामूहिक रूप से मेरा नाम स्त्रीलिंग सा लगता है लेकिन अगर मेरा विराट स्वरूप देखा जाए तो मैं पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और अन्यलिंग से मिलकर बनती हूं। इसलिए शब्दों के आधार पर मेरे स्त्री अथवा पुरुष होने के बारे में ज्यादा विचार न किया जाए। केवल मुझे जनता के रूप में देखने पर फोकस किया जाए।
       राजतंत्र ने मुझे उन्माद से नियंत्रित किया, तानाशाही ने क्रूरता से और लोकतंत्र फर्जी विकास से नियंत्रित कर रहा है। नियंत्रण रखने के इस माहौल में सबको मेरे दुधारूपन का ज्ञान हो गया था, सभी ने अपनी-अपनी जरूरत और भूख के हिसाब से मुझे खूब दूहा(शोषण किया) है। हालांकि मेरा जनता होना ही मेरे पीठ पर डंडे खाने की पहली योग्यता भी निर्धारित करता है। मुझे क्या पता था जिस राजतंत्र और तानाशाही में मेरी स्वतंत्रता और इच्छाओं का क्रूर तरीकों से दमन किया जाता था। प्रजातंत्र के आने के बाद नेता, प्रशासन, मीडिया और पूंजीवाद मिलकर प्रजातांत्रिक तरीके से ही मेरी स्वतंत्रता और संप्रभुता को किडनैप करेंगे, ये मेरे लिए किसी सरप्राईज से कम तो बिल्कुल नहीं था। अगर मेरा शोषण ना हो तो मैं जनता कहलाने के लायक नहीं होती। आजादी के बाद से अबतक मुझे रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार और साक्षरता के मुद्दो में ही उलझाकर रखा है। अगर इन मुद्दो से भी बात न बनती नजर आए तो धर्म की भभूति मेरी आंखों में झोंक कर मुझे अंधा कर दिया जाता है। मेरी गरीबी के आंकड़े भी अमीर लोग जारी करते है। जिनकी पांचों उंगलियां घी में और मुंह कढ़ाई में हो ऐसे लोग मेरी भुखमरी पर ज्ञान देते हैं।
          तंत्र के संस्थापकों ने कालक्रमानुसार मेरे लिए कुछ नए मंत्रों को आसमान से उतारा और चुनावी मौसमों में मेरे कानों में फूंक कर मुझे कई बार अपने-अपने पक्ष में मंत्रमुग्ध किया। वैसे तो प्रजातंत्र में प्रजा, तंत्र के यंत्र को पांच वर्षो में एक बार के लिए दबाती है बाकि समय तंत्र ही प्रजा को दबाए रखता है। मेरी मासूमियत का आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं। मुझे कौन कब अपना परिवार घोषित कर दे भले ही उसका खुद का कोई परिवार ना हो, कब मुझे भाई या बहन बना ले, कब मुझे जाति या धर्म में बांध के रख दे, कब मुझे जनता से जनार्दन बना दे, कब मैं दलित बन जाऊं, कब सवर्ण बन जाऊ पता ही नहीं चलता। कब कौन नेता मेरे सूत्र में अपना सूत्र पिरों दे, मुझे विधवा से कब सुहागन कर दे पता नहीं। चुनावी सीजन में हर कोई मेरी मांग भरने को उतारू रहता है। जैसे ही चुनाव खत्म हुआ मैं फिर से वही अभागन सी रह जाती हूं। फिर न काया काम की ना माया काम की। क्योंकि मैं मासूम हूं, मुझे कोई भी अपना लॉलीपॉप थमा दो मैं उसी को चूस कर अपनी संतुष्टि करती हूं। मेरी मासूमियत ही मेरी सॉफ्ट पावर है, हार्ड पावर तो बची नहीं। मुझे टेलीस्कोप से देखो तो मैं एकजुट और बहुत शक्तिशाली नजर आती हूं और माइक्रोस्कोप से देखो तो विभिन्न धड़ों में बटी हुई पथभ्रष्ट भीड़ के रूप में दिखती हूं। मेरा जनता होना मेरे लिए भी वरदान है और तांत्रिक नेताओं के लिए भी। जो भी नेता चाहे मुझे अपनी बीन की धुन पर नागिन की तरह जैसे चाहे वैसे नचा ले। 
           मैंने जनता बनने के लिए दिन रात कड़ी मेहनत की है। कितने ही झांसेदारो को मैंने अपने नेता बना रखे है। बिना झांसा दिए तो नेता भी नहीं बना जा सकता। जो झांसा ना दे सके वो नेता भी काहे का? जो खुद चोर है वो भी दावा करते फिरते है कि हमारे राज में हम कहीं भी चोरी नहीं होने देंगे। वैसे मेरे सॉफ्टवेयर में एक तकनीकी समस्या यह है कि कोई सच्चा नेता अगर मेरे बीच में आकर सच बोलें तो मैं उसको वोट नहीं देती। जो कोई झांसेदार अपने मायाजाल में मुझे फंसाने का हूनर जानता है, मैं उसी के साथ हूं। वो तो भला हो उन भले लोगो का जिन्होंने मुझे मौलिक अधिकार प्रदान करके मेरा उद्धार कर दिया वरना आज भी मैं पूरी तरह से गुलाम होती। वैसे तो उन मौलिक अधिकारों की भी मेरी हैसियत नहीं है। ये बात और है कि जितने भी अधिकार मुझे मिले है उनके बारे में मुझे कुछ खास ज्ञान नहीं है। इसके पीछे भी मेरी शिक्षा का अहम रोल रहा है। नेताओं ने फॉर्मूला निकाला की जनता को साक्षर किया जाए ना कि शिक्षित। अगर जनता शिक्षित हो जायेगी तो वह इन झोला छाप नेताओ को सत्ता का सुख तो बिल्कुल भी नही लेने देगी।
         मैं "जनता" से सजग "नागरिक" कब बनूंगी मुझे इस बात का कोई आसार नहीं दिख रहे। मैं चिल्लर चोरों की वह भीड़ हूं जो आंख मूंद कर जय श्री राम का नारा तो लगाती हूं लेकिन उन्ही श्रीराम जी के मंदिर में सुरक्षा की व्यवस्था ना हो तो उनकी भी चप्पल कब चुरा लूं पता नहीं चलेगा। मेरा इंटरेस्ट सुधरने ज्यादा बिगड़ने में है। अगर किसी सरकारी स्कूल का मास्टर मेरे बच्चो को सुधारने के लिए कभी एक दो थप्पड़ लगा दे तो इतने में मैं मास्टर को सुधार देती हूं। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि अगर मैं पढ़ लिख कर इंटेलिजेंट बन गई तो मेरे अंदर से जनता होने का अहसास खत्म हो जाएगा। मेरे अंदर अगर बुद्धि का संचार हो गया तो मैं मेरे झांसेबाज नेताओ के झूठ को सच नहीं मान पाऊंगी। नेताओं से सवाल पूछने की इच्छा होने लगेगी और बेचारे नेता मेरे सवालों का जवाब नही दे पाएंगे तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा। मैं तो हमेशा यही दुआ करूंगी कि नेता और प्रशासक मेरे उद्धार के लिए कोई भी योजना बनाएं तो उसमें सबसे पहले उन्हीं का महा उद्धार हो, उन्ही के नामों का परचम हो। मुझे क्या? मैंने अपनी भीखमंगी स्थिति को ही सबसे बेहतरीन स्थिति के रूप में स्वीकार कर लिया है। इससे ज्यादा और क्या कहूं क्योंकि "मैं जनता हूं"।
                              जय भारत!
       

टिप्पणियाँ

  1. Tippani : hamesha ki tarah adbhut vijayatmak shaili me lekhak shri Deshmukh Ji ne , mast likha he 👌
    Dudharupan 👌
    Dharm ki bhabhuti👌 ese gazab shabdo ka prayog lekhak shri Deshmukh ji ko ek atyant dudharu lekhak ka darja dete dikh rahe he👌👍

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    1. बिल्कुल सही कहा आपने मित्र । वो लोलीपॉप वाला हिस्सा भी अजब रहा इतने सारे विचारो में।।।

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  2. जनता के साथ साथ चुनाव को भी फोकस करना था और अंत में अपने वोट का सही विचार के लिए जनता सोचे इसके लिए एक मेसेज देना था।

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