रूढ़ियों से गुजरता जनमानस

"कोई भी समाज विषमताओं से अछूता नहीं रह सकता।" विषमताएं प्रकृति कि अपनी देन है चाहे, वह किसी भी जीव समूह, समाज या पारिस्थितिकी ही क्यों ना हो? एक सामान्य व्यक्ति के सामान्य जीवन में भी ढेरों मित्र और शत्रु या अन्य प्रतिद्वंदी स्वाभाविक रूप से होते है। समाज और समय दोनो मिलकर व्यक्ति का, मित्र और शत्रु से भलीभांति परिचय करा देते है। बहुत से मामलों में व्यक्ति का सबसे क्रूरतम शत्रु उसका अपना समाज ही होता है। समाज और क्रूरतम! ऐसे कैसे हो सकता है? लेकिन हम यह तथ्य माने या न माने परंतु यह भी एक सत्य है। जरा सोचिए की क्या हम अपने ही तौर तरीके से, बिना किसी दबाव के, जीवन का कितना हिस्सा जी पाते है? हमारे कई निजी निर्णय क्या समाज से प्रभावित नहीं होते हैं? क्या समाज व्यक्ति पर अपना प्रभाव नहीं छोड़ता है? व्यक्ति के पैदा होने से लेकर मरने के बाद तक भी समाज उसका पीछा नहीं छोड़ता। हम जैसे ही पैदा हुए नही कि शुभ-अशुभ, राहु-केतु-मंगल, गुण-दोष, कुंडली न जाने क्या-क्या शुरू हो जाता है। समाज किसी भी व्यक्ति के लिए "आवश्यक परेशानी" है। यह व्यक्ति को मुफ्त में शिक्षा और संस्कार देने वाली द्वितीयक संस्था का कार्य करती है।
          यह तो तय है कि किसी भी जीव का जन्म और मृत्यु उसके अपने हाथों में नहीं है। लेकिन समाज बहुत पहले से ही व्यक्ति की दशा और दिशा को लेकर तैयार हो जाता है। हमारे यहां व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरे संस्कारों से होकर गुजरना पड़ता है। सभी धर्म समुदायों के अपने अलग-अलग तौर तरीके जरूर हो सकते है लेकिन इन्ही तौर तरीकों और संस्कारों का डंडा लेकर समाज पहली पंक्ति में खड़ा रहता है। ऐसा भी नहीं है कि ये सभी सामाजिक संस्कार गलत है। इन संस्कारों में से जितने भी संस्कार है उनका लक्ष्य व्यक्ति का समाजीकरण और उसे सुसंस्कृत करना है। एक तथ्य तो यह भी है कि समाज ही वह संस्था है जिसने धर्म, संस्कृति और विभिन्न रिवाजों का सदियों से अबतक पालन पोषण किया है। समाज ने सामान्य जीवन में अनेकों मापदंडों और नियमों को स्थापित किया है। समाज ने व्यक्ति में संस्कारों के साथ-साथ संवेदनाओं को भी पोषित किया। समाज ने संवाद और संवेदनाओं से व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़ा, उसे संगठित किया। समाज के बिना व्यक्ति की अर्थपूर्ण कल्पना नही जा सकती है। समाज ही वह संस्था है जो व्यक्ति के पुरुषार्थ और व्यक्तित्व को विकसित करता है। बिना समाज में प्रवेश किए हम अपने व्यक्तित्व का ना तो विकास कर सकते है और न ही उसका परीक्षण कर सकते है। समाज ने ही आगे चलकर राज्य और देश का निर्माण करते हुए मानव के जंगलीपन का नाश किया है।
          हर समाज का अपना एक अलग ही ढांचा होता है, उसकी एक विशिष्ट सोच या विचारधारा का होना भी काफी हद तक स्वाभाविक है। व्यक्ति के पुरुषार्थ, उसका भविष्य, सोच, व्यवहार, जीवनचर्या इत्यादि का सबसे बड़ा निर्धारक तत्व उसका अपना समाज ही होता है। व्यक्ति जैसे समाज में रहेगा उसका प्रभाव वैसा ही होगा। व्यक्ति को अपने समाज के माहौल के हिसाब से जीना पड़ता है और उस माहौल में वह स्वयं को ढाल चुका होता है। सवाल यह भी हो सकता है कि क्या सभी समाजों का माहौल एकसा होता है अगर नही, तो क्यों? कई समाजों का माहौल ऐसा होता है मानो वह आज तक भी अपने जंगलीपन को अपने साथ लेकर जी रहे हो। किसी समाज का आर्थिक, सामाजिक रूप से पिछड़ा होना उतना बुरा नहीं है लेकिन उसी समाज का मानसिक दिवालियापन हर प्रकार से खतरनाक है। कुछ समाज में शुरू से ही ऐसी शिक्षा दी जाती है कि उसमे व्यक्ति कट्टर, मूर्ख और गवार से अधिक कुछ और नहीं बन सकता है क्योंकि उनके पास उससे अधिक ज्ञान भी नहीं होता है। कुछ प्रगतिशील समाज भी है जिनकी संख्या बढ़ने लगी है, जिसमे व्यक्ति अपना उच्चतम विकास करता है और नाम और ख्याति को प्राप्त होता है। लेकिन सारे समाज इतने अच्छे भी नहीं हो सकते कि उनमें सबकुछ अच्छा और सभी प्रगतिशील लोग हो। इसके उलट समाज इतने बुरे भी नहीं हो सकते कि उनमें अच्छाई का नामोनिशान भी न हो। लेकिन फिर भी अगर अच्छे और बुरे समाजों के बीच में अंतर कि बात करें तो उनमें मुख्यतः उसके उद्देश्य, और उद्देश्य प्राप्ति के तरीकों को लेकर साफ-साफ अंतर देखने को मिल जायेगा। रही बात समाज में असमानता कि तो उसके लिए आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक सभी प्रारूपों से सभी समाजों में समानता का होना लगभग असम्भव है। किसी भी प्रकार कि असमानता को कम करने के प्रयास करना व्यक्ति का सामाजिक दायित्व होना चाहिए।
          प्रत्येक समाज की अपनी ढेरों रूढ़ियों से युक्त जटिल संरचना होती है। यह संरचना स्वयं में कई खूबियां लिए होती है। इसके कई अच्छे तौर तरीके, सामाजिक-सांकृतिक परंपराएं और विभिन्न क्षेत्रों या स्थानों के अनुसार रीति रिवाज भी प्रचलन में होते है। विभिन्न आयोजनों, मेल मिलापों और त्यौहारों में समाज कि सक्रिय सामूहिक सहभागिता भी नजर आती है। समाज कि यही सक्रिय भूमिका लोगो को एकदूसरे से जोड़े रखने का कार्य करती है। समाज ही व्यक्ति से व्यक्ति के बीच में भाईचारा, आपसी जुड़ाव और सौहार्दता को बढ़ाता है। दुनिया के सारे धर्मो में, सामूहिक रूप से सामाजिक कार्यों को बढ़ावा देने हेतु अनेकों तीज त्यौहार या महोत्सवों का आयोजित किए जाते रहे है। त्यौहारों पर एक दूसरे से मेल मिलाप करना, आपस में बधाइयां देना और उपहार देने जैसे कार्य भी किए जाते है। यहां तक भी कुल मिलाकर समाज स्वागत योग्य भूमिका में नजर आता है। छोटे मोटे कार्यक्रमों से लेकर बड़े-बड़े आयोजनों तक में समाज अपनी सक्रिय भूमिका निभाता दिख जायेगा।
          लेकिन यह कैसे हो सकता है कि जहां अच्छाई हो वहां बुराइयां नहीं होगी। जो समाज 'व्यक्ति' को जन्म देता है वही समाज एक समय बाद उसकी नैतिक और अनऐच्छिक हत्या करने का जघन्य कार्य भी करता है। आज भी समाज में कई रूढ़ियां अपने-अपने स्तर से बराबर बनी हुई हैं खासतौर पर विवाह, शिक्षा और जीवन स्तर के मामलों में। समाजीकरण की अवस्था में कम विकसित लोग अधिक विकसित लोगों के पद चिन्हों पर चले इसमें कोई बुराई नहीं है। अगर हमारे किसी रिश्तेदार या पड़ोसी के घर में कार है तो हमारे घर में भी होनी चाहिए, अगर किसी पड़ोसी या रिश्तेदार के बच्चे किसी खास विषय की पढ़ाई कर रहे हो तो हमारे भी बच्चे उसी विषय को लेकर पढ़ना चाहिए भले ही उनकी रुचि किसी और विषय में हो। शादी अपनी-अपनी जात बिरादरी में ही होनी चाहिए नहीं तो लोग क्या कहेंगे। दहेज जैसी बुराई ने कितने ही घर बर्बाद किए। हमेशा लोगो के कुछ ना कुछ कहने के दबाव के चलते जीवन के कई प्रमुख निर्णय एक रूढ़िगत तय मानसिकता के हिसाब से लेने होते हैं। हालांकि जीवन स्तर से संबंधित बहुत से विषय तो बाजार व्यवस्था ने समाज पर बड़ी ही क्रूरता से थोप रखें है जो कि स्वयं में एक नई रूढ़ी बन रही है। एक दौर था मूलभूत जरूरतों जैसे रोटी कपड़ा और मकान की प्राप्ति करना व्यक्ति का सामान्य उद्देश्य हुआ करता था। लेकिन पूंजीवाद और बाजारवाद ने मिलकर सारी व्यवस्था को बदल कर रख दिया है। अब तो दैनिक जीवन में जरूरत की सामान्य वस्तुओ से लेकर विलासिता वाली वस्तुएं, सबकुछ ब्रांडेड ही चाहिए। वस्तुओं का गुणवत्ता युक्त होना ज्यादा जरूरी है ना कि किसी ब्रांड विशेष का होना। पूंजीवाद ने धीरे से हमारे मस्तिष्क में ब्रांड का बीजारोपण ऐसे कर दिया कि सभी को सबकुछ ब्रांडेड ही चाहिए। हम कइयों चीजे ऐसी भी ले आते है जिनकी कोई विशेष उपयोगिता भी नहीं है। अर्थशास्त्र में उनको गिफिन वस्तुएं कहा गया है। एक तरफ बड़े शहरों में लोग घर में कुत्ते पालना ज्यादा पसंद करते हैं, उनकी कितनी ही सेवा करते हैं लेकिन दूसरी तरफ घर में बुजुर्ग माता-पिता की थोड़ी सी सेवा कर लेने से उनका आधुनिकीकरण का महल ध्वस्त हो जाता है। घर में कुत्ते के लिए जगह और समय दोनो है लेकिन बूढ़े माता- पिता क्या केवल वृद्धाश्रम की जिम्मेदारी है? जबकि पुरातन समाज ने इस नवीन समाज को ऐसे संस्कार तो नही दिए होंगे।
          इन सबके अलावा भी कुछ रूढ़ियां जो पूंजीवाद के चलते पैदा हुई है वे आजकल ज्यादा विध्वंशकारी रूप ले रही है। पुरुष प्रधान समाज में भी स्त्री का महत्व पुरुष से कहीं ज्यादा होता है लेकिन फिर भी अगर घर में बच्चा पैदा हो तो वह लड़का ही होना चाहिए। ये सोच कहां से पैदा हुई कि घर में बेटा ही होना चाहिए, बेटी क्यों नहीं चाहिए। जबकि समाज यह भी भूल जाता है की लड़का पैदा करने के लिए भी स्त्री का होना उतना ही जरूरी है जितना कि पुरुष का होना। अगर घर में बेटा बेटी हो तो उसको पढ़ा लिखा कर बड़ा करो और झोंक दो अंधी प्रतिस्पर्धा में जिसका पहला लक्ष्य नौकरी और दूसरा लक्ष्य पैसा नही बल्कि ढेर सारा पैसा कमाना होता है। यहां समाज की मानसिकता को देखो तो पता चलता है कि बेटे बेटियो को माता पिता चाहिए लेकिन माता-पिता को अपने बच्चे किसी न किसी नौकरी में ही चाहिए। इससे होता यह है कि नौकरी के चलते बच्चे माता पिता से दूर होकर रह जाते हैं और माता-पिता अपने अपने बच्चो की नौकरी पर बस गर्व महसूस करते, घरों में अकेले रह जाते हैं। धीरे-धीरे ये होता है कि बच्चे अपनी जिंदगी में व्यस्त हो जाते है और माता पिता से केवल फोन पर बात करने की औपचारिकता मात्र रह जाती है। कई बार तो फोन करने की औपचारिकता भी पूरी नही होती। माता-पिता फिर इस बात की आस लगाए रहते है बच्चे कोई फोन कर दे या हालचाल पूछ ले। फिर यही माता-पिता अपने ही घर में एकाकी हो जाते है, वृद्धावस्था में असहाय हालत में फिर से समाज ही उनको सहारा देता है। हम सबके जीवन में पैसे की अहमियत को किसी भी प्रकार से नकारा नहीं जा सकता लेकिन केवल पैसा ही जीवन हो ऐसा भी तो नहीं है। पैसों से बढ़कर जीवन में खुशियां भी होती है।
            निष्कर्ष स्वरूप कहा जा सकता है कि समाज ने भले ही व्यक्ति को कुछ रूढ़ियों में बांधे रखा हो लेकिन उसी समाज ने मानव को परिष्कृत करके "व्यक्ति" बनाया है। समाज ने ही एक सामान्य से व्यक्ति को भगवान बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है। मानव ने, अतीत से लेकर आज तक जितना भी विकास किया है, समाज की पारिस्थितिकी में रहते हुए, समाज के साथ चल कर, उसकी उंगलियां थामकर ही किया है। जब तक दुनिया है तब तक कोई कितना भी चाह ले व्यक्ति और समाज कभी भी एक दूसरे से छुटकारा पाने की सोच भी नहीं सकते। यह एक ऐसा पूल है जिससे होकर कइयों पीढियां और कई सभ्यताएं गुजर चुकी है। मजे की बात तो यह है कि हमें भी इसी से होकर गुजरना पड़ेगा। समाज की संरचना को लेकर चुनौती दी जा सकती है, इसकी रूढ़ियों को अनेक आवश्यक स्तर तक सुधारने को लेकर कार्य योजना पर विचार किया जा सकता है, लेकिन समाज के अस्तित्व को किसी भी दृष्टि से नकारा नहीं जा सकता।
                                 जय भारत!

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