संदेश

आशा निराशा के बीच नववर्ष का आगमन- स्वागत

आज कैलेंडर के आखिरी पृष्ठ का आखिरी दिन है, जाहिर सी बात है वर्ष का अंतिम दिन। आज हमें यह चिंतन अवश्य करना चाहिए कि, की पिछले एक साल में हमने क्या खोया क्या पाया? उपलब्धियों के कितने  पायदान नीचे हुए या कितने ऊंचे? क्या हम में कुछ बदलाव आया है या वैसे के वैसे ही पुराने जैसे। अगर पुराने जैसे ही है तो कल से फिर एक नया कैलेंडर पुराने जैसा ही तारीखों के हेर फेर के साथ दीवार पर लटक जायेगा। इस प्रकार अगर पुराने कैलेंडर की जगह नया कैलेंडर लटकाना ही नए साल का आगाज़ है तो फिर बेवजह के दिखावे क्यों नए साल को उत्सव जैसे मनाने के? जो भी हो, हो-हल्ला, कूदा फांदी, मौज मस्ती अगर करनी ही है तो नए साल के नाम पर ही क्यूं? बाकि दिनो में भी कर सकते है, किसने रोका है?       वैसे तो इस साल में बहुतों ने अपने करीबियों को खोया है चाहे वें घर परिवार रिश्तेदार या दोस्त यार ही क्यों ना रहे हो, लगभग सभी ने कुछ ना कुछ तो खोया जरूर है। अब जिन्हें खो दिया है उन्हें वापस ला पाना तो नामुमकिन है। इस साल में भी बहुत कुछ सीखने को मिला है। तमाम तरह की पाबंदियों में जीवन को जीने की सीख मिली है। एक तरफ किस...

नाकारा, कामचोरी को निहारता

हम में से कितने ही लोग कर्मठ है जो काम करना चाहते है लेकिन कई सारे लोग ऐसे भी हैं जो कामचोरी को ही अपना काम समझते हैं। कामचोरी करने मे भी मेहनत करने जितनी ही ऊर्जा खर्च करनी पड़ती हैं। क्योंकि काम करने वाला तो काम करके थक हार कर एक तरफ हो जाता है लेकिन नकारा कामचोर काम न करने के लिए तमाम जुगत भिड़ाने में लगा हुआ रहता हैं। अतः काम करने और कामचोरी करने में थकान तो कॉमन बात है। मेहनती व्यक्ति काम करना या काम करते रहना, ज्यादा पसंद करता है। जबकि आलसी व्यक्ति कामचोरी करने में स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है। इस प्रकार के कामचोरों का एक बड़ा समूह समाज में दिन-रात आलस्य के बीज बो रहा है, यह लोग अपनी आने वाली पीढ़ी के रक्त में आलस्य को मिश्रित करने का कार्य कर रहे हैं। उसी का नतीजा है कि आज हम अच्छे दिनों कि आस में, सरकारी खाद-पानी पर परजीवी जैसे जीवित रहने लगे है।               आज वर्तमान परिदृश्य में सरकारी योजनाएं और सरकारी नीतियां कामचोरों कि पोषणकर्ता बन गई हैं। भले हीं ये योजनाएं और नीतियां अच्छे उद्देश्यों को लेकर लायी गई हो लेकिन एक मसला और है कि इन ...

सत्य मीठा होता है

कौन कहता है सत्य कड़वा होता है? सत्य ना तो करेले का हलवा है ना नीम का काढ़ा जो कड़वा लगेगा । अगर सत्य कड़वा होता है तो क्या झूठ मीठा होता है? अगर झूठ मीठा है तो फिर गन्ना, गुड़ और शक्कर का क्या? बेचारी मधुमक्खियों की तो मेहनत ही बेकार गई। और अगर झूठ मीठा होता है तो चाय वाले ने 2014 में चाय में क्या पिलाया जो अबतक किसी को कड़वापन महसूस ही नही हो रहा है? वैसे भी हम बापू थोड़े ही है जो सत्य के प्रयोग करेंगे। भाई हम तो झूठलर हैं, जी भर के झूठ बोलेंगे और झूठ की झूठी मिठास में सबको डूबोएंगे। आज जो जितना झूठ के साथ है उतना दौलत, शोहरत, कुर्सी सब कुछ पा रहा है। सच बोलने वाला तो बेचारा कहीं गुलामी कर रहा होता है या सड़को पर ख़ाक छान रहा होता है। हम तो झूठ का भरपूर उपयोग करते है। सुबह उठते ही झूठ से शुरुआत होती है जो रात में सोने तक बदस्तूर जारी रहता है। झूठ के भी कुछ सिद्धान्त है। पहला, झूठ बोलने का साहस रखना। दूसरा, पूरी सच्चाई से झूठ बोलना। तीसरा, कितना भी झूठ बोलो लेकिन दिखावा सच का ही करना, चाहे कनपटी पर तमंचा ही अड़ा रखा हो। चौथा, बोले हुए सारे झूठ की सूची कंठस्थ रखना, इत्यादि।   ...

बाजारवाद: उन्नति, विकास और विनाश

दुनिया की तमाम मानवीय सभ्यताओं के आतित्व में आने के बाद राज्य, राजनीति, समाजीकरण और आर्थिक विकास में गुणोंत्तर बदलाव आते गए। जब से मनुष्य ने अधिशेष उत्पादन करना आरंभ किया तब से वस्तु विनिमय अथवा क्रय विक्रय की आवश्यकता को पूरा करने हेतु एक स्थान की आवश्यकता पड़ी जहां जहां आर्थिक गतिविधियां पूरी की जा सके, उस स्थान को बाजार कहा गया। धीरे धीरे मानव ने सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी विकास करने की गति को तीव्र किया। तकनीक और प्रौद्योगिकी के विकास से उद्योग-व्यापार, उत्पादन और सेवाओं में प्रसार हुआ, जिसके लिए बाजारों की आवश्यता पड़ी, जिससे नए-नए बाजार भी विकसित हुए।                       उपनिवेशीकरण और साम्राज्यवाद ने जब पैर पसारे तो इन्हीं साम्राज्यवादी देशों को अपने अधिकृत देशों से कच्चा माल प्राप्त हुआ और अपने यहां निर्मित माल को बेचने के लिए बहुत बड़े बाज़ार भी। जरूरत थी तो औद्योगिकरण की, जो सबसे पहले यूरोपीय देशों से आरंभ हुआ। इन देशों ने अपने यहां निर्मित माल को विश्व भर में फैले अपने उपनिवेशों में बेंचा तथा इसी से वैश्वीकरण या वैश्विक ...

लड़खड़ाता नागरिकत्व: एक वर्णन

अरे भाई! मैं नागरिक हूं, थोड़ा बहुत जागरूक, बाकि तो जाति-धर्म की अफीम के नशे में अपने अधिकारो से बेखबर पड़ा हूं। संविधान के दूसरे ही अध्याय में मेरे नागरिक होने का वर्णन मिलता है। मेरी एक ही ताकत है और वो है, मतदाता होना, और यही ताकत मुझे कुछ समय के लिए ही सही लेकिन खुदा बना देती है। बाद में तो मेरी हालत फटे जुतों से ज्यादा अच्छी नहीं रह जाती। मुझे अपना मुखिया चुनने के लिए किसी भी राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय या जनहित से संबंधित विषयों की अवश्यकता नही है, मुझे जाति-धर्म, भाषा, क्षेत्रवाद और तुष्टीकरण से बहलाया फुसलाया जा सकता है, ऐसा ही कई दशकों से चला आ रहा है। चीरकाल से ही मुझे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा गया है, कभी गुलाम, कभी जनता, कभी लोकतंत्र का स्तंभ, कभी भेड़चाल वाली भीड़ भी कहा गया। मेरे तो नाम बदले हैं स्वरूप नही। वैसे भी मुझे इन सभी नामों से कोई ऐतराज भी नहीं है।            मानव सभ्यता कि शुरुआत से लेकर अबतक मनुष्य ने जीवन के सभी क्षेत्रों में तरक्की तो बहुत की लेकिन नागरिक होने के नाते मैने बेलेट पेपर पर ठप्पा लगाना छोड़कर, अब मशीन की बटन दबाकर अपन...

तपस्या: कैसी होती हैं?

थोड़ा ही सही उतर तो आए आंखों में पानी उनका का तमाम पानी उतर जाने के बाद। न जाने किन मजबूरियों में माने है जनाब कई बेकसूर चरागो के, बूझ जाने के बाद। जब इंद्र के सिंहासन तक को हिलाकर रख देने वाली कठोर तपस्या और हठयोग से मुखिया जी को विश्व झूठलर होने का वरदान प्राप्त हुआ। मुरझाए लोकतंत्र कि असहाय जनता में हाहाकार मच गया। जो मुखिया और उनकी सहयोगी मीडिया अब तक जिन काले कानूनों को किसान हितैषी बता रहे थे, घड़ी थी उनको वापस लेने कि घोषणा करने की। सो मुखिया जी ने अपने ही हाथों से अपनी पीठ थपथपाई, अपनी कठोर तपस्या और झूठी मानवता का हवाला दिया, जिसकी सनसनीखेज दबी गर्मी से मुखिया जी के जबड़े की जकड़न दूर हुई, अंदर के घमंड की बर्फ पिघली। फिर बड़े बेआबरू हो कर, बेमन से काले कानूनों को वापस लेने कि घोषणा की, सो मुरझाए मन से मंत्री संत्री ने भी आदतन हां में हां मिला ही दी। अगर आदमी चाह ले तो खुद ही रायता फैला भी सकता है और खुद समेट कर पी भी सकता है, यह महान हुनर कम ही लोगों में पाया जाता है। लेकिन इत्तेफाक तो इत्तेफ़ाक है, हर कोई चौकीदार थोड़े ही बन सकता है। पिछले एक साल से किसानों से दूरी बनाए रखने...

आदर्श की आवश्यकता

किसी भी व्यक्ति के जीवन में आवश्यक आदर्श क्या-क्या हो सकते है? पहला व्यक्ति कि परिस्थिति, दूसरा घर परिवार, तीसरा समाज, जिसमें व्यक्ति रहता है, चौथा, सामाजिक वातावरण, पांचवां समाज में स्थापित आदर्श एवं नैतिक मूल्य इत्यादि। किसी भी व्यक्ति के चरित्र निर्माण में परिवार एवं समाज के संस्कारों का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। अगर व्यक्ति के शुरुआती जीवन में घर परिवार अथवा समाज में उथल-पुथल बनी रहेगी तो ऐसी स्थिति में उसके आदर्श अलग होंगे जबकि सामान्य स्थिति में अलग। व्यक्ति अक्सर अपने आदर्श उन लोगों को या उन तत्वों को बनाता है जिनसे वह आसानी से प्रभावित होता है या जिन आदर्शों को अपनाने में आसानी होती हो।               कोई भी सामान्य व्यक्ति असामान्य आदर्शों को यदा-कदा ही अपनाता है। क्या आज हम बता सकते हैं कितने लोगों ने महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, सुभाष चंद्र बोस, आदि शंकराचार्य, भीमराव अंबेडकर, नेल्सन मंडेला जैसे महान लोगों के कितने आदर्शों को अपनाया है? शायद कुछ ही आदर्शों को अपनाया गया हो। हालांकि किसी भी व्यक्ति के द्वारा आदर्श स्थिति को प्राप्त कर लेन...