आशा निराशा के बीच नववर्ष का आगमन- स्वागत
आज कैलेंडर के आखिरी पृष्ठ का आखिरी दिन है, जाहिर सी बात है वर्ष का अंतिम दिन। आज हमें यह चिंतन अवश्य करना चाहिए कि, की पिछले एक साल में हमने क्या खोया क्या पाया? उपलब्धियों के कितने पायदान नीचे हुए या कितने ऊंचे? क्या हम में कुछ बदलाव आया है या वैसे के वैसे ही पुराने जैसे। अगर पुराने जैसे ही है तो कल से फिर एक नया कैलेंडर पुराने जैसा ही तारीखों के हेर फेर के साथ दीवार पर लटक जायेगा। इस प्रकार अगर पुराने कैलेंडर की जगह नया कैलेंडर लटकाना ही नए साल का आगाज़ है तो फिर बेवजह के दिखावे क्यों नए साल को उत्सव जैसे मनाने के? जो भी हो, हो-हल्ला, कूदा फांदी, मौज मस्ती अगर करनी ही है तो नए साल के नाम पर ही क्यूं? बाकि दिनो में भी कर सकते है, किसने रोका है? वैसे तो इस साल में बहुतों ने अपने करीबियों को खोया है चाहे वें घर परिवार रिश्तेदार या दोस्त यार ही क्यों ना रहे हो, लगभग सभी ने कुछ ना कुछ तो खोया जरूर है। अब जिन्हें खो दिया है उन्हें वापस ला पाना तो नामुमकिन है। इस साल में भी बहुत कुछ सीखने को मिला है। तमाम तरह की पाबंदियों में जीवन को जीने की सीख मिली है। एक तरफ किस...