मैं जनता हूं
बिना दिशा, बिना किसी विचारधारा विशेष के, यत्र-तत्र झुंड से बने मांस के पुतलों की संख्या, जनता का रूप धारण करती है। सामाजिक सुसुप्तता का मैं बेजोड़ नमूना हूं। यह कोई आज से नहीं है बल्कि जबसे हजारों सालों से, जबसे विश्व को प्रशासन करने के लिए राजतंत्र, तानाशाही और प्रजातंत्र नाम के तीन बंदर गिफ्ट मिले है तब से लेकर आजतक मेरा स्वरूप जस का तस है। विश्व के बुद्धिजीवियों ने इन तंत्रों का विकास मेरे लिए ही किया है, ऐसा मेरा अटूट विश्वास है। क्योंकि अगर यह तंत्र ना होते तो मैं जनता ना होती। सामूहिक रूप से मेरा नाम स्त्रीलिंग सा लगता है लेकिन अगर मेरा विराट स्वरूप देखा जाए तो मैं पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और अन्यलिंग से मिलकर बनती हूं। इसलिए शब्दों के आधार पर मेरे स्त्री अथवा पुरुष होने के बारे में ज्यादा विचार न किया जाए। केवल मुझे जनता के रूप में देखने पर फोकस किया जाए। राजतंत्र ने मुझे उन्माद से नियंत्रित किया, तानाशाही ने क्रूरता से और लोकतंत्र फर्जी विकास से नियंत्रित कर रहा है। नियंत्रण रखने के इस माहौल में सबको मेरे दुधारूपन का ज्ञान हो गया था, सभी ने अपन...