संदेश

उम्मीदों में निवेश

अगर कोई भी चाहे कि उसे सबकुछ बड़ी आसानी से सर्वसुलभ हो जाए तो यह असंभव है। प्रत्येक वांछित फल या परिणाम के हेतु सही दिशा में परिश्रम पहली आवश्यक शर्त होती है। यूं भी हम चाहे या न चाहे फिर भी जीवन में प्रत्येक व्यक्ति को अपना कुछ ना कुछ निवेश करना ही पड़ता है। हर कोई अपनी जरूरत, प्राथमिकता, पसंद या नापसंद, इच्छा या बिना इच्छा के भी, अच्छाई का बुराई का, समय का, धन का, व्यवहार का, मान-अपमान का, सोच का, सुख-दुख का, अलग-अलग प्रकार का निवेश करता जाता है। जिसके पास जो भी तत्व अधिक होगा वह उसका अधिकतम निवेश करेगा। इसके अलावा जिसकी जैसी सोच या मानसिक स्थिति होती है वह उस हिसाब से उतना निवेश करता है। अच्छी बातों का निवेश अच्छे उज्ज्वल भविष्य की गारंटी है। नकारात्मकता के निवेश से पतन के सिवाय कुछ भी नहीं मिलने वाला।                 दुनिया में कईयों ऐसे लोग भी हैं जो कुछ भी निवेश नहीं करते है केवल जिंदा है लेकिन फिर भी वे किसी न किसी बहाने समय तो गवां रहे होते है। हमें निवेश और खर्च करने के बीच का स्पष्ट अंतर मालूम होना चाहिए। कई ऐसे लोग हैं ज...

रूढ़ियों से गुजरता जनमानस

"कोई भी समाज विषमताओं से अछूता नहीं रह सकता।" विषमताएं प्रकृति कि अपनी देन है चाहे, वह किसी भी जीव समूह, समाज या पारिस्थितिकी ही क्यों ना हो? एक सामान्य व्यक्ति के सामान्य जीवन में भी ढेरों मित्र और शत्रु या अन्य प्रतिद्वंदी स्वाभाविक रूप से होते है। समाज और समय दोनो मिलकर व्यक्ति का, मित्र और शत्रु से भलीभांति परिचय करा देते है। बहुत से मामलों में व्यक्ति का सबसे क्रूरतम शत्रु उसका अपना समाज ही होता है। समाज और क्रूरतम! ऐसे कैसे हो सकता है? लेकिन हम यह तथ्य माने या न माने परंतु यह भी एक सत्य है। जरा सोचिए की क्या हम अपने ही तौर तरीके से, बिना किसी दबाव के, जीवन का कितना हिस्सा जी पाते है? हमारे कई निजी निर्णय क्या समाज से प्रभावित नहीं होते हैं? क्या समाज व्यक्ति पर अपना प्रभाव नहीं छोड़ता है? व्यक्ति के पैदा होने से लेकर मरने के बाद तक भी समाज उसका पीछा नहीं छोड़ता। हम जैसे ही पैदा हुए नही कि शुभ-अशुभ, राहु-केतु-मंगल, गुण-दोष, कुंडली न जाने क्या-क्या शुरू हो जाता है। समाज किसी भी व्यक्ति के लिए "आवश्यक परेशानी" है। यह व्यक्ति को मुफ्त में शिक्षा और संस्कार देने वा...

मैं जनता हूं

चित्र
बिना दिशा, बिना किसी विचारधारा विशेष के, यत्र-तत्र झुंड से बने मांस के पुतलों की संख्या, जनता का रूप धारण करती है। सामाजिक सुसुप्तता का मैं बेजोड़ नमूना हूं। यह कोई आज से नहीं है बल्कि जबसे हजारों सालों से, जबसे विश्व को प्रशासन करने के लिए राजतंत्र, तानाशाही और प्रजातंत्र नाम के तीन बंदर गिफ्ट मिले है तब से लेकर आजतक मेरा स्वरूप जस का तस है। विश्व के बुद्धिजीवियों ने इन तंत्रों का विकास मेरे लिए ही किया है, ऐसा मेरा अटूट विश्वास है। क्योंकि अगर यह तंत्र ना होते तो मैं जनता ना होती। सामूहिक रूप से मेरा नाम स्त्रीलिंग सा लगता है लेकिन अगर मेरा विराट स्वरूप देखा जाए तो मैं पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और अन्यलिंग से मिलकर बनती हूं। इसलिए शब्दों के आधार पर मेरे स्त्री अथवा पुरुष होने के बारे में ज्यादा विचार न किया जाए। केवल मुझे जनता के रूप में देखने पर फोकस किया जाए।        राजतंत्र ने मुझे उन्माद से नियंत्रित किया, तानाशाही ने क्रूरता से और लोकतंत्र फर्जी विकास से नियंत्रित कर रहा है। नियंत्रण रखने के इस माहौल में सबको मेरे दुधारूपन का ज्ञान हो गया था, सभी ने अपन...

कोना'धारी वर्सेस रोना'धारी

चित्र
तो ऐसा है कि झूठ के धारा प्रवाह में वाह वाह करना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन 'सच' से इंस्पायर होकर कोई ऐसा सवाल न करे जिसका जवाब आपको खुद भी पता हो लेकिन उसका जवाब किसी दूसरे के मुंह से सुनना हो। ऐसा करना तो बेशक आत्मघाती होने जैसा है। जब भी सामने वाले को लगेगा कि आप उड़ते हुए तीर के शौकीन हो, तब आपको कोई अदृश्य मालदार खिलाड़ी कैसे चुपके से कब खरीद के अपनी जेब में रख लेगा पता नही चलेगा। आजकल तो विश्व गुरु के खुफिया चेले कब अपना खेल कर जाते है पता ही नहीं चलने देते। वो तो सीधे रिजल्ट से ही पता चलता है। हालांकि उक्त सारी बातें पूर्णतः काल्पनिक जैसी है, वास्तविकता से इसका कोई लेना देना नही है। खैर! सवाल-जवाब से ज्यादा मजा तो 'मन की बात' में आता है, मन में भले ही कुछ और रखो, लेकिन मुंह से कुछ और कहो। हम तो "बेमन की बात" में भी जन, गण और वतन की बात का इंतजार करते रहते हैं। मन और बेमन कि इसी दुविधा में आज का समाज दो फटे टुकड़ों में डिवाइड हो गया है। जिसके हाथ में जितना भी फटा टुकड़ा आ रहा है उसी को सील कर अपने पक्ष का तंबू खड़ा करना चाहता है वो भी बिना ब...

आस्था बनाम कट्टरता

हमारा आचरण, हमारे समाज, धर्म, आस्था, शिक्षा और संस्कृति से जुड़ा हुआ होता है। हर व्यक्ति या समुदाय की किसी न किसी धर्म विशेष के प्रति आस्था होती है और कई लोगो किसी भी धर्म में आस्था नहीं भी हो सकती है। हालांकि व्यक्ति की आस्तिक और नास्तिक होना दो स्थितियां हैं। यथासंभव हम सब में धर्मपरायणता के तत्व बना रहना चाहिए। कितना अच्छा हो कि हम धर्म के गूढ़ ज्ञान को प्राप्त करके जीवन को श्रेष्ठ बनाने हेतु उसका लाभ लें। लेकिन हम धर्म के बजाय धार्मिक आचरण के नाम पर होने वाले दिखावे या आडंबरों पर अधिक जोर देने लगते है। विभिन्न प्रकार के चिन्हों जैसे दाढ़ी मूंछ बाल या विशेष पहनावे के माध्यम से खुद के धार्मिक होने या किसी धर्म विशेष के होने के प्रमाण को पुख्ता करते है। हालांकि धर्म क्या है? या धर्म का प्रयोजन क्या है? या लोगो को धार्मिक क्यों होना चाहिए? इन सब सवालों  के उत्तर शायद कुछेक लोगो के पास ही होंगे। लेकिन क्या हमारे इस प्रकार के आचरण से हमे किसी भी तरह शारीरिक या मानसिक संतोष मिलता है? क्या हम अपने धार्मिक आचरणों से भौतिक या आध्यात्मिक श्रेष्ठता को प्राप्त हो रहे हैं? या हम खुद पर धार्म...

दल-बदल: नहीं आसान

चित्र
तो भईया ऐसा है कि मौसम बदल चुका है, मानसून जा चूका है लेकिन चुनाव का मौसम फिर से झमाझम बरसने को तैयार बैठा है। सारे राजनीतिक दलों के मेनिफेस्टो भी तैयार हो चुके है। सभी दल अपनी-अपनी डफ़ली, अपना-अपना राग गा चुके है। जनता के लिए सबकी अपनी-अपनी रेवड़ी, जलेबी, मिठाई, हलवा, रसगुल्ला, पूड़ी पकवान सबकुछ देने के लिए घोषणाएं हो चुकी है। जाति-धर्म, अमीर-गरीब, अगले-पिछड़े, मिले-बिछड़े सबका हिसाब लगा लिया है। अब आगे जनता की बारी है कि वो इनमे से क्या-क्या पसंद करती है, किसे स्वीकारती है या किसे नकारती है और किसे सत्ता के सुख तक पहुंचाएगी।                       राजनीतिको के लिए तो 'सत्ता' वह स्वर्ग सुंदरी है जिससे हर कोई लिपटना चाहता है। सत्ता में ही वह शक्ति है जो किसी सड़कछाप को भी भगवान से ऊंचा दर्जा दिला सकती हैं। राजनीति में जब यही सत्ता की शक्ति, पुराने दल से मिलने की उम्मीद कम दिखे, लगने लगे कि टिकिट मिलने की संभावना बिलकुल भी नहीं है। तब एक सबसे प्रिय हथियार का प्रयोग किया जाता है जिसको 'दल बदलना' कहा जाता हैं। दल बदलना, मतलब...

लोकतंत्र की मजबूरी

चित्र
किसी भी राष्ट्र में लोकतंत्र का होना अपने आपमें बहुत गर्व और संतोष का विषय होता है। लोकतंत्र मतलब नागरिकों को पसंद का अधिकार, लोकतंत्र मतलब व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की गारंटी, लोकतंत्र मतलब बोलने की आजादी, सरकार चुनने का अधिकार, लोकतंत्र मतलब सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त होने की गारंटी। कुल मिलाकर कहा जाए तो लोकतंत्र स्वयं में नागरिकों के लिए अनेकों प्रकार कि उदारवादी समाजवादी खूबियां लिए हुए है जो किसी भी कीमत पर सभी नागरिकों मिलना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था को विश्व में सबसे बेहतर व्यवस्था माना गया है। हमारे देश में अंग्रेजो से लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान के साथ-साथ राजनीतिक प्रशासनिक प्रबुद्ध लोगों के अतुलनीय योगदान से स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही लोकतंत्र कि स्थापना की गई। ताकि इस लोकतंत्र के झंडे के नीचे सभी अमीर-गरीब, अगले पिछड़े, शिक्षित-अशिक्षित सबका सामूहिक और समावेशी विकास हो सकें। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, इसी व्यवस्था का हाथ थामें हमने आजादी लेकर अबतक विकास के सभी क्षेत्रों में कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं।     ...