संदेश

क्या मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम जीवन के सभी मूल्यों पर नैतिक थे? अपने विचार रखे।

यह सर्वविदित है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम हिंदुओ के आराध्य भगवान है। उन्होंने अपने युग में उच्चतम मर्यादाओं का पालन करके उच्च जीवन चरित्र और सर्वोच्च आदर्शों का प्रतिमान स्थापित किया। यह भी सत्य है कि श्री राम के बराबर मर्यादाओं का पालन शायद ही किसी ने किया हो, इसीलिए वे बहुत बड़े जन समूह के आराध्य है। मर्यादाओं का पालन करते हुए उन्होंने अपने आचरण को साफ स्वच्छ, आज्ञाकारी और दयालु जन उद्धारक ही बनाए रखा। उन्होंने एक पुत्र, पति, राजकुमार, राजा, मित्र, पिता जैसे दायित्वों का पालन एवं निर्वहन में तमाम उच्च आदर्शों का अनुसरण किया और स्वयं को इन मर्यादाओं में बांधे रखा इसलिए "मर्यादा पुरुषोत्तम" कहलाएं साथ में भगवत्ता को प्राप्त किया।        व्यक्ति के सामाजिक आचरण की वे सीमाएं जो व्यक्ति को झूठा, अनैतिक या गलत आचरण करने से रोकती है, "सकारात्मक मूल्य" कहलाती है। मूल्यों का व्यक्ति के आचरण, व्यक्तित्व तथा कार्यों पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। अब मूल प्रश्न यह है कि क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जीवन के सभी मूल्यों पर नैतिक थे? इस प्रश्न का मूल्यांकन विभिन्न पहलुओं...

हम "कड़े शब्दों में निंदा" करते हैं

आज तक यह समझ नही आया कि लोग कड़े शब्दो में ही निंदा क्यों करते हैं। इसके पीछे के निहित स्वार्थ क्या है? कटु शब्दों में भी निंदा होनी चाहिए। अच्छे कामों की तारीफ हो या ना हो लेकिन गलत कार्यों का विरोध जरूर होना चाहिए। विरोध करने के कुछ पारंपरिक तरीके और कुछ नए तरीके हैं जैसे- नारेबाजी चक्काजाम, धरना प्रदर्शन, ट्वीट, फेसबुक-इंस्टाग्राम पोस्ट या यूट्यूब पर वीडियो संदेशों और समाचार पत्रों के द्वारा या कड़े शब्दो मे निंदा करके। जब भी किसी व्यक्ति या व्यक्ति के समूहों द्वारा कोई भी अनैतिक या घृणित कार्य किया जाता हैं अथवा कोई भी अप्रिय, अमानवीय घटना घटती हैं तब हम उसमे कुछ भी न कर सकने कि स्थिति में हो तो क्या करना चाहिए? इसके अलावा ऐसे मामलो से हम दूर भी रहे और दूर भी न दिखे इसके लिए मध्यम मार्ग क्या होना चाहिए? ऐसे में दो सबसे आसान रास्तें है एक, कड़े शब्दों में निंदा करना, दूसरा सांत्वना देना। आप "कड़े शब्दों में निंदा" कर के अपने व्यक्तिगत और सामाजिक दायित्व से पीछा छुड़ाकर राहत की सांस लेते हुए दोस्तो के साथ बैठ टुन्न पार्टी कर सकते हो।         कड़े शब्दो म...

रूस यूक्रेन युद्ध :- सामरिक एवं मानवीय पक्ष

डर के आगे जीत है या नहीं यह तो कोई नहीं जानता लेकिन किसी ना किसी की हार जरूर है। इसी प्रकार के डर के माहौल में फिलहाल रूस के आगे यूक्रेन की हार लगभग तय है। यूक्रेन भी कभी सोवियत रूस का हिस्सा रहा है वर्ष 1991 में सोवियत रूस के विघटन के बाद रूस के अलावा यूक्रेन सहित 14 देश अस्तित्व में आए। तब से शीत युद्ध की समाप्ति और रूस की सामरिक शाख में गिरावट आई। रूस की आर्थिक स्थिति में भी गिरावट आई लेकिन धीरे-धीरे रूस इससे उबर कर बाहर आ गया। रूस का आज भी पुराने सोवियत रूसी संघ के देशों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दबाव बना रहता है लेकिन इस दबाव को कम करने के लिए यूक्रेन भी नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) में शामिल होना चाहता है जिससे रूस को सख्त आपत्ति रही है। जिसके जवाब में रूस ने यूक्रेन के 2014 में क्रीमिया पर अधिकार कर लिया।     यह सर्वविदित है कि अमेरिका भी येन केन प्रकार से रूस पर दबाव बनाए रखना चाहता है और नाटो के माध्यम से रूस कि सीमा तक अपनी पहुंच बनाना उसका एक उद्देश्य रहा है। नाटो के प्रमुख सदस्य देशों में अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, इटली जैसे शक्तिशाली देश शामिल है। रू...

छह घंटो का मालिक

मैं अक्सर सुबह और शाम के समय जब लोगो को गलियों और सड़को पर अपने अपने कुत्तों को टहलाते हुए जब देखता था। सोचता था कि वे लोग कुत्ते को टहला रहे है या कुत्ते उनको। ख़ैर सवाल भी वाजिब ही था और खुद से ही था तो कुछ खास फर्क भी नही पड़ने वाला था। लेकिन मुझे क्या पता था कि एकदिन मुझे भी कुत्ता संभालना पड़ेगा। हमारे घर में तो देसी कुत्ते पालने का चलन है। बेचारे बिना किसी ज्यादा परवरिस के खुद ही पल जाते है। लेकिन संकर नस्ल के कुत्तों की तो बात ही कुछ और है। एकदम साफ सुथरे आज्ञाकारी, अच्छे प्रशिक्षित, उनके अलग अलग नाम, अलग रौब, उनकी अलग से दिखाई देने वाली अमीरी। गांव में तो एक सीटी बजाओ मुहल्ले के सारे कुत्ते लार टपकाते हुए अगल बगल आकर खड़े हो जाते है। फिर चाहे किसी को भी बुलाया हो। हालांकि मुझे तो बाल्यकाल से ही पालतू पशुओं से लगाव रहा है।          आज अचानक एक निर्देशात्मक फोन कॉल आया कहा गया की भाई तुम्हे आज जबलपुर जाना है, एक बच्चा डॉगी को ले के। मैंने भी जबलपुर में पांच साल से अधिक समय बिताया था और काफी दोस्त बन चुके थे तो उन्हीं से मिलने के लालच और पुरानी यादें ताजा ...

दूर की सोचों, आज तो बर्बाद है......

किसी भी एक वित्तीय वर्ष का सम्पूर्ण लेनदेन "बजट" कहलाता हैं। लेकिन अर्थतंत्री जी का कहना है कि यह तो अमृतकाल का बजट है। हम, आम और खास सभी बजट को उम्मीद की नजरो से ही देखते हैं। और देखे भी क्यों न? यह हमारी जेब और जेब के भविष्य पर असर जो डालने वाला होता है। जेब अगर खाली हो तो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना हुए फिरने के अलावा कर क्या सकता है। जेब में खाने खुजाने और खर्च खैरात लायक पैसा होना बहुत जरूरी है। तभी तो विकास किया जा सकता है वरना खाली पेट और खाली जेब आदमी को कहीं का नही छोड़ती। ख़ैर, जो सरकार आम आदमी का तेल निकालने पर अमादा हो वह बजट के माध्यम से भी तेल निकालने का ही काम करेगी। ऐसा ही कुछ इस साल के बजट में भी देखने को मिलता है।          अगर आप वर्तमान में ज्यादा कुछ करने का दम ना रखते हो या इस प्रकार की कोई इच्छाशक्ति न रखते हो तो लोगो को भविष्य के सपने दिखाओ। वैसे भी हम भारतीय लोगो में आशावाद का ठीकठाक स्तर है। हम सभी ने एक डायलॉग तो कहीं न कहीं जरूर सुना होगा "देख लूंगा" लेकिन कोई देखता नही। वैसे ही इस बजट में भी आगामी 25 वर्षों के विजन की बात कही है।...

ये तोहफ़ा तो कुबूल नही होगा

अगर आप किसी लोकतांत्रिक देश के नागरिक हो, देश के ईमानदार करदाता हो तो आपको तोहफा या मुफ्त का जैसे जुमलो से नाराजगी जरूर होनी चाहिए। आमतौर पर चुनाव का ढोल बजते ही ये तोहफ़ा वो तोहफ़ा, ये भी मुफ्त वो भी मुफ्त का गाना गाते हुए सारे तांत्रिक बाहर आकर अपने मंत्र मारने लगते है। चुनावी आगाज़ से लोकतंत्र में अचानक ही आत्मविश्वास पैदा होने लगता हैं। लोकतंत्र का सीना अचानक ही फूलने लगता है। क्या किसी भी राजनेता या राजनीतिक दल ने अपने पैसों के दम पर जनता को कुछ भी मुफ्त में दिया है? बिना करदाताओं के पैसों से मुफ्त में कुछ दिया हो? जब जनता का पैसा ही जनता के लिए खर्च किया जाए तो वह तोहफा या मुफ्त का कैसे हुआ? अगर सरकारें जनता के हितों को ध्यान में रख कर काम करती हैं तो यह उनकी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है।      क्या आम जनता सरकार को इसीलिए विभिन्न करों या जीएसटी का भुगतान करती हैं कि उन्हें तोहफा, सौगात, मुफ्त में वैक्सीन जैसी बाते सुनने को मिलेगी। यह एक नागरिक का उपहास उड़ाने के अलावा क्या हो सकता है। कोई भी नेता इतना दानवीर कब से हो गया कि वह तोहफे बांटने लग गया? क्या भारत में ...

समझौते और हम

हमें समझौते करना और उन्हें व्यवहार में उतारना आना चाहिए। समझौते हमेशा बुरे भी नहीं होते। इसमें किसी एक पक्ष की ओर आंशिक झुकाव जरूर हो सकता है अथवा दूसरे पक्ष के लिए थोड़ा अधिक लाभ का सौदा हो सकता है। वैसे भी लाभ तो दोनो ही पक्षों को होता है। लेकिन समझौते में सावधानी भी बरतनी चाहिए। समझौते का आदर्श नैतिक मूल्यों और अच्छे आदर्श होने चाहिए।वैसे समझौते का दूसरा तत्व "Give and take" होता है। समझौते हमारे लिए नए विकल्प प्रदान करते हैं, कई नई संभावनाओं को, नए संबंधों, नई शुरुआत, नवीन संवादों, नए राष्ट्र राज्यों, नए वाणिज्य-व्यापार को जन्म देता है और साथ ही एक नए युग के निर्माण में भी मदद करता है।          हम चाहे या ना चाहे, हमें समझौते तो करने ही पड़ते हैं। हमें कभी न कभी अपनी महत्वाकांक्षाओं को एक तरफ रखते हुए समझौतारूपी मध्य मार्ग को अपनाना पड़ता है।समझौते कई प्रकार के होते हैं जैसे समाज का समाज से, भावनाओं का संवेदनाओं से, व्यक्ति का व्यक्ति से, राज्य का राज्य से, देश का देश से। हम लोग अपने दैनिक जीवन में भी न जाने कितने  ही समझौते किए रहते है। समझौते को स्वाभ...