संदेश

कारागार रक्षक

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समाज के आपराधिक कचरे को खिला पिलाकर, संड-भूसंड बनाकर और पाल पोसकर सुरक्षित रखे जाने वाले लिबरल एवं सामूहिक स्थान को जेल कहा जाता है। समाज के इसी आपराधिक कचरे को सकुशल संभाले रखने का जिम्मा सरकार का होता है। सरकार जेलों के कुशल प्रशासन हेतु अधिकारियों एवं कर्मचारियों को तैनात करती है। प्रशासनिक अनुक्रम में सबसे निचले पायदान पर ऐसा जीव जो, इंसान और जानवर के बीच कि अदृश्य कड़ी होते हुए भी अपने इस विशेष गुण पर थोड़ा भी जो गर्व न करे, परिवार और समाज से अंशतः आइसोलेट एवं अधिकांशतः बहिष्कृत रहते हुए अपने जेल के घिसेपिटे कर्तव्य के प्रति थोड़ा जागरूक और थोड़े सुस्त, इस जीव को "जेल प्रहरी" कहा जाता है। यह उल्लू और कुत्ते का वंशज न होते हुए भी हरकते एवं व्यवहार उन्ही के जैसी करने वाला विलक्षण प्राणी है। जेल मैनुअल का डर और पूर्व अंग्रेजी शासन कि फितरत ने इस विलक्षण जीव कि अद्भुत पर्सनालिटी डेवलप की है।         धकापेल कॉम्पीटीशन का पहाड़ जो चढ़ चूका, अपने दुर्भाग्य से लड़ चुका, थका हारा, बेरोजगारी और जरूरतों का मारा, समाज के दबाव में दबा, अभ्यर्थी बेचारा लाचार होकर ...

रिश्तों को सहेजें

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हमारे मानवीय समाज में जुड़ाव का सबसे महत्वपूर्ण और मूलभूत तत्व क्या है? यकीनन हमारे अपने अपनों से रिश्ते ही है। अगर रिश्ते न हो तो समाज महज मकानों का जंगल मात्र ही हो सकता है। लेकिन सुसंगठित समाज बिल्कुल नहीं। समाज कि बुनियाद में रिश्ते ना हो ऐसा बिल्कुल भी संभव नहीं है। भारतीय समाज तो वैसे भी कई रिश्ते नातों के ताने बाने में गूंथा हुआ है। यहां पारिवारिक श्रेणीक्रम के साथ-साथ सामाजिक धार्मिक श्रेणीक्रम भी समाज में व्यापक स्तर पर देखने को मिलते है। आज भी इस भयंकर  आधुनिकता के बावजूद समाज में रिश्तों का प्रभाव स्वयं को जीवित रख रहा है, यह वाकई बहुत अच्छा लगता है। किसी भी समाज या राष्ट्र की स्वस्थ परंपराएं, उस समाज या राष्ट्र के एकजुट बने रहने में ऊर्जा प्रदान करते हैं। यह भी एक प्रकार का विकासशील रूढ़िवाद है।               किसी भी व्यक्ति को सुख और दुख दोनो ही परिस्थितियों में अपने-अपनो की जरूरत पड़ती है। अगर आप बहुत ज्यादा खुश हो तो आप खुशी किनसे जाहिर करोगे? अगर आप बहुत दुखी हो या दुख के पर्याप्त कारण भी हो तो वैसी स्थिति में भी किसके ...

मैं समर्पित दल बदलू

जी हां, मैं हूं एकदम कट्टर बिना भरोसे का दल बदलू। न मेरी जाति देखो ना मेरा धर्म देखो क्योंकि इन दोनो से भी मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता है। और विचारधारा तो मेरी कुछ विशेष बची नही है। अपना तो है बस यही सपना साम दाम जपना, पराया दल अपना। अरे भाई हम दल बदलू चुनाव लड़ते ही किस लिए है? कई का लालच `जन सेवा` करना होता है मेरा लालच "जेब सेवा" करना है। मेरा ईमान धरम मुझे खरीदने वाले दल के ऑफर पर निर्भर रहता है क्योंकि वैसे भी मुझे जनता(भीड़) वोट देती है जिनमे नागरिक तो शायद कोई भी नही होता है। अगर जनता में नागरिक होते तो मुझ जैसे दल बदलू को भला कौन वोट देता?            आज के सुसुप्त होते जा रहे लोकतंत्र के जमाने में नागरिक और नागरिकत्व दोनो ही वेंटीलेटर पर अंतिम सांसे ले रहे हैं। बेचारा लोकतंत्र भी भीडतंत्र का पर्यायवाची बनता जा रहा है। आज लोकतंत्र में बेचारे नागरिक के लिए वैसे भी अच्छे विकल्प बचे ही नही है, मेरे जैसे दल बदलूओं को ही थक हार कर वोट देना पड़ता है। नागरिक की भी अपनी-अपनी ढेरों मूलभूत समस्याएं है। बेचारा भ्रष्टाचार, घटती आमदनी, बीमारी, बढ़ती महंगाई-बेरोजगारी...

ज़िंदगी आ रहा हूं मैं

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अगर व्यक्ति के जीवन में उत्साह या उमंग ना हो तो समझ लिया जाना चाहिए की ऐसे व्यक्तियों से बना समाज एक अदृश्य खतरे की ओर बढ़ता जा रहा है। निरुत्साहित जीवन का कोई जीवन मूल्य या सारतत्व नही होता है। समाज ने आज के समय में "उत्साह" के घोड़े को लंगड़ा कर दिया है, और "निरुत्साह" के गधे की पीठ पर जा बैठा है। व्यक्ति के मन में कुंठाओं और कुढ़न ने घर बना लिया है और स्वयं को नाकारा बनाकर रख दिया। एक सीमित सोच के दायरे में समाज, स्वयं ही बंधता चला जा रहा है क्योंकि व्यक्ति का दिमाग मारता जा रहा है। व्यक्ति का भौतिक या तकनीकी विकास हो रहा है, संसाधनों का विकास हो रहा है लेकिन सामाजिक मानसिक विकास अवरूद्ध होता जा रहा है। व्यक्ति के जीवन में चेतना का अभाव और चिंता से उत्पन्न निराशा की बढ़ोत्तरी होती जा रही है।           "उत्साह व्यक्ति के मन की वह वृत्ति या स्थिति है जिसके फलस्वरूप मनुष्य प्रसन्न होकर और तत्परतापूर्वक सकारात्मक ऊर्जा और विचारों से युक्त कोई कार्य संपन्न करने या कोई उद्देश्य सिद्ध करने लिए अग्रसर होता है।" उत्साह व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा के ...

क्या मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम जीवन के सभी मूल्यों पर नैतिक थे? अपने विचार रखे।

यह सर्वविदित है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम हिंदुओ के आराध्य भगवान है। उन्होंने अपने युग में उच्चतम मर्यादाओं का पालन करके उच्च जीवन चरित्र और सर्वोच्च आदर्शों का प्रतिमान स्थापित किया। यह भी सत्य है कि श्री राम के बराबर मर्यादाओं का पालन शायद ही किसी ने किया हो, इसीलिए वे बहुत बड़े जन समूह के आराध्य है। मर्यादाओं का पालन करते हुए उन्होंने अपने आचरण को साफ स्वच्छ, आज्ञाकारी और दयालु जन उद्धारक ही बनाए रखा। उन्होंने एक पुत्र, पति, राजकुमार, राजा, मित्र, पिता जैसे दायित्वों का पालन एवं निर्वहन में तमाम उच्च आदर्शों का अनुसरण किया और स्वयं को इन मर्यादाओं में बांधे रखा इसलिए "मर्यादा पुरुषोत्तम" कहलाएं साथ में भगवत्ता को प्राप्त किया।        व्यक्ति के सामाजिक आचरण की वे सीमाएं जो व्यक्ति को झूठा, अनैतिक या गलत आचरण करने से रोकती है, "सकारात्मक मूल्य" कहलाती है। मूल्यों का व्यक्ति के आचरण, व्यक्तित्व तथा कार्यों पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। अब मूल प्रश्न यह है कि क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जीवन के सभी मूल्यों पर नैतिक थे? इस प्रश्न का मूल्यांकन विभिन्न पहलुओं...

हम "कड़े शब्दों में निंदा" करते हैं

आज तक यह समझ नही आया कि लोग कड़े शब्दो में ही निंदा क्यों करते हैं। इसके पीछे के निहित स्वार्थ क्या है? कटु शब्दों में भी निंदा होनी चाहिए। अच्छे कामों की तारीफ हो या ना हो लेकिन गलत कार्यों का विरोध जरूर होना चाहिए। विरोध करने के कुछ पारंपरिक तरीके और कुछ नए तरीके हैं जैसे- नारेबाजी चक्काजाम, धरना प्रदर्शन, ट्वीट, फेसबुक-इंस्टाग्राम पोस्ट या यूट्यूब पर वीडियो संदेशों और समाचार पत्रों के द्वारा या कड़े शब्दो मे निंदा करके। जब भी किसी व्यक्ति या व्यक्ति के समूहों द्वारा कोई भी अनैतिक या घृणित कार्य किया जाता हैं अथवा कोई भी अप्रिय, अमानवीय घटना घटती हैं तब हम उसमे कुछ भी न कर सकने कि स्थिति में हो तो क्या करना चाहिए? इसके अलावा ऐसे मामलो से हम दूर भी रहे और दूर भी न दिखे इसके लिए मध्यम मार्ग क्या होना चाहिए? ऐसे में दो सबसे आसान रास्तें है एक, कड़े शब्दों में निंदा करना, दूसरा सांत्वना देना। आप "कड़े शब्दों में निंदा" कर के अपने व्यक्तिगत और सामाजिक दायित्व से पीछा छुड़ाकर राहत की सांस लेते हुए दोस्तो के साथ बैठ टुन्न पार्टी कर सकते हो।         कड़े शब्दो म...

रूस यूक्रेन युद्ध :- सामरिक एवं मानवीय पक्ष

डर के आगे जीत है या नहीं यह तो कोई नहीं जानता लेकिन किसी ना किसी की हार जरूर है। इसी प्रकार के डर के माहौल में फिलहाल रूस के आगे यूक्रेन की हार लगभग तय है। यूक्रेन भी कभी सोवियत रूस का हिस्सा रहा है वर्ष 1991 में सोवियत रूस के विघटन के बाद रूस के अलावा यूक्रेन सहित 14 देश अस्तित्व में आए। तब से शीत युद्ध की समाप्ति और रूस की सामरिक शाख में गिरावट आई। रूस की आर्थिक स्थिति में भी गिरावट आई लेकिन धीरे-धीरे रूस इससे उबर कर बाहर आ गया। रूस का आज भी पुराने सोवियत रूसी संघ के देशों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दबाव बना रहता है लेकिन इस दबाव को कम करने के लिए यूक्रेन भी नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) में शामिल होना चाहता है जिससे रूस को सख्त आपत्ति रही है। जिसके जवाब में रूस ने यूक्रेन के 2014 में क्रीमिया पर अधिकार कर लिया।     यह सर्वविदित है कि अमेरिका भी येन केन प्रकार से रूस पर दबाव बनाए रखना चाहता है और नाटो के माध्यम से रूस कि सीमा तक अपनी पहुंच बनाना उसका एक उद्देश्य रहा है। नाटो के प्रमुख सदस्य देशों में अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, इटली जैसे शक्तिशाली देश शामिल है। रू...