संदेश

मैं भाषण हूं

 मैं वो हूं जो घर से लेकर सारे विश्व में सार्वजनिक संवाद का चहेता यंत्र हूं। ना ना, मै लाउडस्पीकर नहीं हूं। अदृश्य हूं लेकिन जीवित हूं। मै कहने वाले, और सुनने वाले के बीच की अति आवश्यक कड़ी हूं। उपयोगिता की दृष्टि से देखें तो कहने को उपदेश, सलाह या मुंह से चलने वाला औजार हूं। मैं किसी भी ब्रेकिंग न्यूज़ से कम सनसनीखेज नहीं हूँ। मेरे लिए हर श्रोता अपनी दीवानगी जाहिर करता है। चाहे न चाहे हर कोई गाहे-बगाहे मेरा इस्तेमाल करता रहता है। मैं किसी को कुछ दूं या ना दूं लेकिन, मुझसे ले लेकर हर कोई किसी न किसी को बहुत कुछ देता रहता है। इस तरह विचारों का भाषा के माध्यम से संप्रेषण के दौरान मेरी उत्पत्ति होती है और मैं "भाषण" के शुभनाम से जाना जाता हूं।         वैसे तो मैं अपने आपमें कुछ भी नहीं हूं लेकिन जहां बोलने और सुनने वाले दो तत्व होंगे वहां मेरा अस्तित्व स्वयं ही दिखाई पड़ता है। इस विश्व में कइयों लोग मुझे अपने बोलने या कहने के बेहतरीन हुनर के तौर पर पेश करते है। जहां कहीं, किसी भी भाषा में संबोधन होगा मतलब मेरा इस्तेमाल होगा। मेरे इस्तेमाल से कितने ही लोग सड़क से सं...

उम्मीदों में निवेश

अगर कोई भी चाहे कि उसे सबकुछ बड़ी आसानी से सर्वसुलभ हो जाए तो यह असंभव है। प्रत्येक वांछित फल या परिणाम के हेतु सही दिशा में परिश्रम पहली आवश्यक शर्त होती है। यूं भी हम चाहे या न चाहे फिर भी जीवन में प्रत्येक व्यक्ति को अपना कुछ ना कुछ निवेश करना ही पड़ता है। हर कोई अपनी जरूरत, प्राथमिकता, पसंद या नापसंद, इच्छा या बिना इच्छा के भी, अच्छाई का बुराई का, समय का, धन का, व्यवहार का, मान-अपमान का, सोच का, सुख-दुख का, अलग-अलग प्रकार का निवेश करता जाता है। जिसके पास जो भी तत्व अधिक होगा वह उसका अधिकतम निवेश करेगा। इसके अलावा जिसकी जैसी सोच या मानसिक स्थिति होती है वह उस हिसाब से उतना निवेश करता है। अच्छी बातों का निवेश अच्छे उज्ज्वल भविष्य की गारंटी है। नकारात्मकता के निवेश से पतन के सिवाय कुछ भी नहीं मिलने वाला।                 दुनिया में कईयों ऐसे लोग भी हैं जो कुछ भी निवेश नहीं करते है केवल जिंदा है लेकिन फिर भी वे किसी न किसी बहाने समय तो गवां रहे होते है। हमें निवेश और खर्च करने के बीच का स्पष्ट अंतर मालूम होना चाहिए। कई ऐसे लोग हैं ज...

रूढ़ियों से गुजरता जनमानस

"कोई भी समाज विषमताओं से अछूता नहीं रह सकता।" विषमताएं प्रकृति कि अपनी देन है चाहे, वह किसी भी जीव समूह, समाज या पारिस्थितिकी ही क्यों ना हो? एक सामान्य व्यक्ति के सामान्य जीवन में भी ढेरों मित्र और शत्रु या अन्य प्रतिद्वंदी स्वाभाविक रूप से होते है। समाज और समय दोनो मिलकर व्यक्ति का, मित्र और शत्रु से भलीभांति परिचय करा देते है। बहुत से मामलों में व्यक्ति का सबसे क्रूरतम शत्रु उसका अपना समाज ही होता है। समाज और क्रूरतम! ऐसे कैसे हो सकता है? लेकिन हम यह तथ्य माने या न माने परंतु यह भी एक सत्य है। जरा सोचिए की क्या हम अपने ही तौर तरीके से, बिना किसी दबाव के, जीवन का कितना हिस्सा जी पाते है? हमारे कई निजी निर्णय क्या समाज से प्रभावित नहीं होते हैं? क्या समाज व्यक्ति पर अपना प्रभाव नहीं छोड़ता है? व्यक्ति के पैदा होने से लेकर मरने के बाद तक भी समाज उसका पीछा नहीं छोड़ता। हम जैसे ही पैदा हुए नही कि शुभ-अशुभ, राहु-केतु-मंगल, गुण-दोष, कुंडली न जाने क्या-क्या शुरू हो जाता है। समाज किसी भी व्यक्ति के लिए "आवश्यक परेशानी" है। यह व्यक्ति को मुफ्त में शिक्षा और संस्कार देने वा...

मैं जनता हूं

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बिना दिशा, बिना किसी विचारधारा विशेष के, यत्र-तत्र झुंड से बने मांस के पुतलों की संख्या, जनता का रूप धारण करती है। सामाजिक सुसुप्तता का मैं बेजोड़ नमूना हूं। यह कोई आज से नहीं है बल्कि जबसे हजारों सालों से, जबसे विश्व को प्रशासन करने के लिए राजतंत्र, तानाशाही और प्रजातंत्र नाम के तीन बंदर गिफ्ट मिले है तब से लेकर आजतक मेरा स्वरूप जस का तस है। विश्व के बुद्धिजीवियों ने इन तंत्रों का विकास मेरे लिए ही किया है, ऐसा मेरा अटूट विश्वास है। क्योंकि अगर यह तंत्र ना होते तो मैं जनता ना होती। सामूहिक रूप से मेरा नाम स्त्रीलिंग सा लगता है लेकिन अगर मेरा विराट स्वरूप देखा जाए तो मैं पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और अन्यलिंग से मिलकर बनती हूं। इसलिए शब्दों के आधार पर मेरे स्त्री अथवा पुरुष होने के बारे में ज्यादा विचार न किया जाए। केवल मुझे जनता के रूप में देखने पर फोकस किया जाए।        राजतंत्र ने मुझे उन्माद से नियंत्रित किया, तानाशाही ने क्रूरता से और लोकतंत्र फर्जी विकास से नियंत्रित कर रहा है। नियंत्रण रखने के इस माहौल में सबको मेरे दुधारूपन का ज्ञान हो गया था, सभी ने अपन...

कोना'धारी वर्सेस रोना'धारी

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तो ऐसा है कि झूठ के धारा प्रवाह में वाह वाह करना कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन 'सच' से इंस्पायर होकर कोई ऐसा सवाल न करे जिसका जवाब आपको खुद भी पता हो लेकिन उसका जवाब किसी दूसरे के मुंह से सुनना हो। ऐसा करना तो बेशक आत्मघाती होने जैसा है। जब भी सामने वाले को लगेगा कि आप उड़ते हुए तीर के शौकीन हो, तब आपको कोई अदृश्य मालदार खिलाड़ी कैसे चुपके से कब खरीद के अपनी जेब में रख लेगा पता नही चलेगा। आजकल तो विश्व गुरु के खुफिया चेले कब अपना खेल कर जाते है पता ही नहीं चलने देते। वो तो सीधे रिजल्ट से ही पता चलता है। हालांकि उक्त सारी बातें पूर्णतः काल्पनिक जैसी है, वास्तविकता से इसका कोई लेना देना नही है। खैर! सवाल-जवाब से ज्यादा मजा तो 'मन की बात' में आता है, मन में भले ही कुछ और रखो, लेकिन मुंह से कुछ और कहो। हम तो "बेमन की बात" में भी जन, गण और वतन की बात का इंतजार करते रहते हैं। मन और बेमन कि इसी दुविधा में आज का समाज दो फटे टुकड़ों में डिवाइड हो गया है। जिसके हाथ में जितना भी फटा टुकड़ा आ रहा है उसी को सील कर अपने पक्ष का तंबू खड़ा करना चाहता है वो भी बिना ब...

आस्था बनाम कट्टरता

हमारा आचरण, हमारे समाज, धर्म, आस्था, शिक्षा और संस्कृति से जुड़ा हुआ होता है। हर व्यक्ति या समुदाय की किसी न किसी धर्म विशेष के प्रति आस्था होती है और कई लोगो किसी भी धर्म में आस्था नहीं भी हो सकती है। हालांकि व्यक्ति की आस्तिक और नास्तिक होना दो स्थितियां हैं। यथासंभव हम सब में धर्मपरायणता के तत्व बना रहना चाहिए। कितना अच्छा हो कि हम धर्म के गूढ़ ज्ञान को प्राप्त करके जीवन को श्रेष्ठ बनाने हेतु उसका लाभ लें। लेकिन हम धर्म के बजाय धार्मिक आचरण के नाम पर होने वाले दिखावे या आडंबरों पर अधिक जोर देने लगते है। विभिन्न प्रकार के चिन्हों जैसे दाढ़ी मूंछ बाल या विशेष पहनावे के माध्यम से खुद के धार्मिक होने या किसी धर्म विशेष के होने के प्रमाण को पुख्ता करते है। हालांकि धर्म क्या है? या धर्म का प्रयोजन क्या है? या लोगो को धार्मिक क्यों होना चाहिए? इन सब सवालों  के उत्तर शायद कुछेक लोगो के पास ही होंगे। लेकिन क्या हमारे इस प्रकार के आचरण से हमे किसी भी तरह शारीरिक या मानसिक संतोष मिलता है? क्या हम अपने धार्मिक आचरणों से भौतिक या आध्यात्मिक श्रेष्ठता को प्राप्त हो रहे हैं? या हम खुद पर धार्म...

दल-बदल: नहीं आसान

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तो भईया ऐसा है कि मौसम बदल चुका है, मानसून जा चूका है लेकिन चुनाव का मौसम फिर से झमाझम बरसने को तैयार बैठा है। सारे राजनीतिक दलों के मेनिफेस्टो भी तैयार हो चुके है। सभी दल अपनी-अपनी डफ़ली, अपना-अपना राग गा चुके है। जनता के लिए सबकी अपनी-अपनी रेवड़ी, जलेबी, मिठाई, हलवा, रसगुल्ला, पूड़ी पकवान सबकुछ देने के लिए घोषणाएं हो चुकी है। जाति-धर्म, अमीर-गरीब, अगले-पिछड़े, मिले-बिछड़े सबका हिसाब लगा लिया है। अब आगे जनता की बारी है कि वो इनमे से क्या-क्या पसंद करती है, किसे स्वीकारती है या किसे नकारती है और किसे सत्ता के सुख तक पहुंचाएगी।                       राजनीतिको के लिए तो 'सत्ता' वह स्वर्ग सुंदरी है जिससे हर कोई लिपटना चाहता है। सत्ता में ही वह शक्ति है जो किसी सड़कछाप को भी भगवान से ऊंचा दर्जा दिला सकती हैं। राजनीति में जब यही सत्ता की शक्ति, पुराने दल से मिलने की उम्मीद कम दिखे, लगने लगे कि टिकिट मिलने की संभावना बिलकुल भी नहीं है। तब एक सबसे प्रिय हथियार का प्रयोग किया जाता है जिसको 'दल बदलना' कहा जाता हैं। दल बदलना, मतलब...

लोकतंत्र की मजबूरी

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किसी भी राष्ट्र में लोकतंत्र का होना अपने आपमें बहुत गर्व और संतोष का विषय होता है। लोकतंत्र मतलब नागरिकों को पसंद का अधिकार, लोकतंत्र मतलब व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की गारंटी, लोकतंत्र मतलब बोलने की आजादी, सरकार चुनने का अधिकार, लोकतंत्र मतलब सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त होने की गारंटी। कुल मिलाकर कहा जाए तो लोकतंत्र स्वयं में नागरिकों के लिए अनेकों प्रकार कि उदारवादी समाजवादी खूबियां लिए हुए है जो किसी भी कीमत पर सभी नागरिकों मिलना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था को विश्व में सबसे बेहतर व्यवस्था माना गया है। हमारे देश में अंग्रेजो से लड़ने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान के साथ-साथ राजनीतिक प्रशासनिक प्रबुद्ध लोगों के अतुलनीय योगदान से स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही लोकतंत्र कि स्थापना की गई। ताकि इस लोकतंत्र के झंडे के नीचे सभी अमीर-गरीब, अगले पिछड़े, शिक्षित-अशिक्षित सबका सामूहिक और समावेशी विकास हो सकें। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, इसी व्यवस्था का हाथ थामें हमने आजादी लेकर अबतक विकास के सभी क्षेत्रों में कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं।     ...

कारागार रक्षक

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समाज के आपराधिक कचरे को खिला पिलाकर, संड-भूसंड बनाकर और पाल पोसकर सुरक्षित रखे जाने वाले लिबरल एवं सामूहिक स्थान को जेल कहा जाता है। समाज के इसी आपराधिक कचरे को सकुशल संभाले रखने का जिम्मा सरकार का होता है। सरकार जेलों के कुशल प्रशासन हेतु अधिकारियों एवं कर्मचारियों को तैनात करती है। प्रशासनिक अनुक्रम में सबसे निचले पायदान पर ऐसा जीव जो, इंसान और जानवर के बीच कि अदृश्य कड़ी होते हुए भी अपने इस विशेष गुण पर थोड़ा भी जो गर्व न करे, परिवार और समाज से अंशतः आइसोलेट एवं अधिकांशतः बहिष्कृत रहते हुए अपने जेल के घिसेपिटे कर्तव्य के प्रति थोड़ा जागरूक और थोड़े सुस्त, इस जीव को "जेल प्रहरी" कहा जाता है। यह उल्लू और कुत्ते का वंशज न होते हुए भी हरकते एवं व्यवहार उन्ही के जैसी करने वाला विलक्षण प्राणी है। जेल मैनुअल का डर और पूर्व अंग्रेजी शासन कि फितरत ने इस विलक्षण जीव कि अद्भुत पर्सनालिटी डेवलप की है।         धकापेल कॉम्पीटीशन का पहाड़ जो चढ़ चूका, अपने दुर्भाग्य से लड़ चुका, थका हारा, बेरोजगारी और जरूरतों का मारा, समाज के दबाव में दबा, अभ्यर्थी बेचारा लाचार होकर ...

रिश्तों को सहेजें

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हमारे मानवीय समाज में जुड़ाव का सबसे महत्वपूर्ण और मूलभूत तत्व क्या है? यकीनन हमारे अपने अपनों से रिश्ते ही है। अगर रिश्ते न हो तो समाज महज मकानों का जंगल मात्र ही हो सकता है। लेकिन सुसंगठित समाज बिल्कुल नहीं। समाज कि बुनियाद में रिश्ते ना हो ऐसा बिल्कुल भी संभव नहीं है। भारतीय समाज तो वैसे भी कई रिश्ते नातों के ताने बाने में गूंथा हुआ है। यहां पारिवारिक श्रेणीक्रम के साथ-साथ सामाजिक धार्मिक श्रेणीक्रम भी समाज में व्यापक स्तर पर देखने को मिलते है। आज भी इस भयंकर  आधुनिकता के बावजूद समाज में रिश्तों का प्रभाव स्वयं को जीवित रख रहा है, यह वाकई बहुत अच्छा लगता है। किसी भी समाज या राष्ट्र की स्वस्थ परंपराएं, उस समाज या राष्ट्र के एकजुट बने रहने में ऊर्जा प्रदान करते हैं। यह भी एक प्रकार का विकासशील रूढ़िवाद है।               किसी भी व्यक्ति को सुख और दुख दोनो ही परिस्थितियों में अपने-अपनो की जरूरत पड़ती है। अगर आप बहुत ज्यादा खुश हो तो आप खुशी किनसे जाहिर करोगे? अगर आप बहुत दुखी हो या दुख के पर्याप्त कारण भी हो तो वैसी स्थिति में भी किसके ...

मैं समर्पित दल बदलू

जी हां, मैं हूं एकदम कट्टर बिना भरोसे का दल बदलू। न मेरी जाति देखो ना मेरा धर्म देखो क्योंकि इन दोनो से भी मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता है। और विचारधारा तो मेरी कुछ विशेष बची नही है। अपना तो है बस यही सपना साम दाम जपना, पराया दल अपना। अरे भाई हम दल बदलू चुनाव लड़ते ही किस लिए है? कई का लालच `जन सेवा` करना होता है मेरा लालच "जेब सेवा" करना है। मेरा ईमान धरम मुझे खरीदने वाले दल के ऑफर पर निर्भर रहता है क्योंकि वैसे भी मुझे जनता(भीड़) वोट देती है जिनमे नागरिक तो शायद कोई भी नही होता है। अगर जनता में नागरिक होते तो मुझ जैसे दल बदलू को भला कौन वोट देता?            आज के सुसुप्त होते जा रहे लोकतंत्र के जमाने में नागरिक और नागरिकत्व दोनो ही वेंटीलेटर पर अंतिम सांसे ले रहे हैं। बेचारा लोकतंत्र भी भीडतंत्र का पर्यायवाची बनता जा रहा है। आज लोकतंत्र में बेचारे नागरिक के लिए वैसे भी अच्छे विकल्प बचे ही नही है, मेरे जैसे दल बदलूओं को ही थक हार कर वोट देना पड़ता है। नागरिक की भी अपनी-अपनी ढेरों मूलभूत समस्याएं है। बेचारा भ्रष्टाचार, घटती आमदनी, बीमारी, बढ़ती महंगाई-बेरोजगारी...

ज़िंदगी आ रहा हूं मैं

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अगर व्यक्ति के जीवन में उत्साह या उमंग ना हो तो समझ लिया जाना चाहिए की ऐसे व्यक्तियों से बना समाज एक अदृश्य खतरे की ओर बढ़ता जा रहा है। निरुत्साहित जीवन का कोई जीवन मूल्य या सारतत्व नही होता है। समाज ने आज के समय में "उत्साह" के घोड़े को लंगड़ा कर दिया है, और "निरुत्साह" के गधे की पीठ पर जा बैठा है। व्यक्ति के मन में कुंठाओं और कुढ़न ने घर बना लिया है और स्वयं को नाकारा बनाकर रख दिया। एक सीमित सोच के दायरे में समाज, स्वयं ही बंधता चला जा रहा है क्योंकि व्यक्ति का दिमाग मारता जा रहा है। व्यक्ति का भौतिक या तकनीकी विकास हो रहा है, संसाधनों का विकास हो रहा है लेकिन सामाजिक मानसिक विकास अवरूद्ध होता जा रहा है। व्यक्ति के जीवन में चेतना का अभाव और चिंता से उत्पन्न निराशा की बढ़ोत्तरी होती जा रही है।           "उत्साह व्यक्ति के मन की वह वृत्ति या स्थिति है जिसके फलस्वरूप मनुष्य प्रसन्न होकर और तत्परतापूर्वक सकारात्मक ऊर्जा और विचारों से युक्त कोई कार्य संपन्न करने या कोई उद्देश्य सिद्ध करने लिए अग्रसर होता है।" उत्साह व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा के ...

क्या मर्यादा पुरषोत्तम श्रीराम जीवन के सभी मूल्यों पर नैतिक थे? अपने विचार रखे।

यह सर्वविदित है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम हिंदुओ के आराध्य भगवान है। उन्होंने अपने युग में उच्चतम मर्यादाओं का पालन करके उच्च जीवन चरित्र और सर्वोच्च आदर्शों का प्रतिमान स्थापित किया। यह भी सत्य है कि श्री राम के बराबर मर्यादाओं का पालन शायद ही किसी ने किया हो, इसीलिए वे बहुत बड़े जन समूह के आराध्य है। मर्यादाओं का पालन करते हुए उन्होंने अपने आचरण को साफ स्वच्छ, आज्ञाकारी और दयालु जन उद्धारक ही बनाए रखा। उन्होंने एक पुत्र, पति, राजकुमार, राजा, मित्र, पिता जैसे दायित्वों का पालन एवं निर्वहन में तमाम उच्च आदर्शों का अनुसरण किया और स्वयं को इन मर्यादाओं में बांधे रखा इसलिए "मर्यादा पुरुषोत्तम" कहलाएं साथ में भगवत्ता को प्राप्त किया।        व्यक्ति के सामाजिक आचरण की वे सीमाएं जो व्यक्ति को झूठा, अनैतिक या गलत आचरण करने से रोकती है, "सकारात्मक मूल्य" कहलाती है। मूल्यों का व्यक्ति के आचरण, व्यक्तित्व तथा कार्यों पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। अब मूल प्रश्न यह है कि क्या मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जीवन के सभी मूल्यों पर नैतिक थे? इस प्रश्न का मूल्यांकन विभिन्न पहलुओं...

हम "कड़े शब्दों में निंदा" करते हैं

आज तक यह समझ नही आया कि लोग कड़े शब्दो में ही निंदा क्यों करते हैं। इसके पीछे के निहित स्वार्थ क्या है? कटु शब्दों में भी निंदा होनी चाहिए। अच्छे कामों की तारीफ हो या ना हो लेकिन गलत कार्यों का विरोध जरूर होना चाहिए। विरोध करने के कुछ पारंपरिक तरीके और कुछ नए तरीके हैं जैसे- नारेबाजी चक्काजाम, धरना प्रदर्शन, ट्वीट, फेसबुक-इंस्टाग्राम पोस्ट या यूट्यूब पर वीडियो संदेशों और समाचार पत्रों के द्वारा या कड़े शब्दो मे निंदा करके। जब भी किसी व्यक्ति या व्यक्ति के समूहों द्वारा कोई भी अनैतिक या घृणित कार्य किया जाता हैं अथवा कोई भी अप्रिय, अमानवीय घटना घटती हैं तब हम उसमे कुछ भी न कर सकने कि स्थिति में हो तो क्या करना चाहिए? इसके अलावा ऐसे मामलो से हम दूर भी रहे और दूर भी न दिखे इसके लिए मध्यम मार्ग क्या होना चाहिए? ऐसे में दो सबसे आसान रास्तें है एक, कड़े शब्दों में निंदा करना, दूसरा सांत्वना देना। आप "कड़े शब्दों में निंदा" कर के अपने व्यक्तिगत और सामाजिक दायित्व से पीछा छुड़ाकर राहत की सांस लेते हुए दोस्तो के साथ बैठ टुन्न पार्टी कर सकते हो।         कड़े शब्दो म...

रूस यूक्रेन युद्ध :- सामरिक एवं मानवीय पक्ष

डर के आगे जीत है या नहीं यह तो कोई नहीं जानता लेकिन किसी ना किसी की हार जरूर है। इसी प्रकार के डर के माहौल में फिलहाल रूस के आगे यूक्रेन की हार लगभग तय है। यूक्रेन भी कभी सोवियत रूस का हिस्सा रहा है वर्ष 1991 में सोवियत रूस के विघटन के बाद रूस के अलावा यूक्रेन सहित 14 देश अस्तित्व में आए। तब से शीत युद्ध की समाप्ति और रूस की सामरिक शाख में गिरावट आई। रूस की आर्थिक स्थिति में भी गिरावट आई लेकिन धीरे-धीरे रूस इससे उबर कर बाहर आ गया। रूस का आज भी पुराने सोवियत रूसी संघ के देशों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दबाव बना रहता है लेकिन इस दबाव को कम करने के लिए यूक्रेन भी नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) में शामिल होना चाहता है जिससे रूस को सख्त आपत्ति रही है। जिसके जवाब में रूस ने यूक्रेन के 2014 में क्रीमिया पर अधिकार कर लिया।     यह सर्वविदित है कि अमेरिका भी येन केन प्रकार से रूस पर दबाव बनाए रखना चाहता है और नाटो के माध्यम से रूस कि सीमा तक अपनी पहुंच बनाना उसका एक उद्देश्य रहा है। नाटो के प्रमुख सदस्य देशों में अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, इटली जैसे शक्तिशाली देश शामिल है। रू...

छह घंटो का मालिक

मैं अक्सर सुबह और शाम के समय जब लोगो को गलियों और सड़को पर अपने अपने कुत्तों को टहलाते हुए जब देखता था। सोचता था कि वे लोग कुत्ते को टहला रहे है या कुत्ते उनको। ख़ैर सवाल भी वाजिब ही था और खुद से ही था तो कुछ खास फर्क भी नही पड़ने वाला था। लेकिन मुझे क्या पता था कि एकदिन मुझे भी कुत्ता संभालना पड़ेगा। हमारे घर में तो देसी कुत्ते पालने का चलन है। बेचारे बिना किसी ज्यादा परवरिस के खुद ही पल जाते है। लेकिन संकर नस्ल के कुत्तों की तो बात ही कुछ और है। एकदम साफ सुथरे आज्ञाकारी, अच्छे प्रशिक्षित, उनके अलग अलग नाम, अलग रौब, उनकी अलग से दिखाई देने वाली अमीरी। गांव में तो एक सीटी बजाओ मुहल्ले के सारे कुत्ते लार टपकाते हुए अगल बगल आकर खड़े हो जाते है। फिर चाहे किसी को भी बुलाया हो। हालांकि मुझे तो बाल्यकाल से ही पालतू पशुओं से लगाव रहा है।          आज अचानक एक निर्देशात्मक फोन कॉल आया कहा गया की भाई तुम्हे आज जबलपुर जाना है, एक बच्चा डॉगी को ले के। मैंने भी जबलपुर में पांच साल से अधिक समय बिताया था और काफी दोस्त बन चुके थे तो उन्हीं से मिलने के लालच और पुरानी यादें ताजा ...

दूर की सोचों, आज तो बर्बाद है......

किसी भी एक वित्तीय वर्ष का सम्पूर्ण लेनदेन "बजट" कहलाता हैं। लेकिन अर्थतंत्री जी का कहना है कि यह तो अमृतकाल का बजट है। हम, आम और खास सभी बजट को उम्मीद की नजरो से ही देखते हैं। और देखे भी क्यों न? यह हमारी जेब और जेब के भविष्य पर असर जो डालने वाला होता है। जेब अगर खाली हो तो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना हुए फिरने के अलावा कर क्या सकता है। जेब में खाने खुजाने और खर्च खैरात लायक पैसा होना बहुत जरूरी है। तभी तो विकास किया जा सकता है वरना खाली पेट और खाली जेब आदमी को कहीं का नही छोड़ती। ख़ैर, जो सरकार आम आदमी का तेल निकालने पर अमादा हो वह बजट के माध्यम से भी तेल निकालने का ही काम करेगी। ऐसा ही कुछ इस साल के बजट में भी देखने को मिलता है।          अगर आप वर्तमान में ज्यादा कुछ करने का दम ना रखते हो या इस प्रकार की कोई इच्छाशक्ति न रखते हो तो लोगो को भविष्य के सपने दिखाओ। वैसे भी हम भारतीय लोगो में आशावाद का ठीकठाक स्तर है। हम सभी ने एक डायलॉग तो कहीं न कहीं जरूर सुना होगा "देख लूंगा" लेकिन कोई देखता नही। वैसे ही इस बजट में भी आगामी 25 वर्षों के विजन की बात कही है।...